Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | July 25, 2008

खरीदार हो गया ____ अमीर मीनाईخریدار ہو گیا۔۔۔۔ امِیر مینائ

 

 

खरीदार हो गया ____  अमीर मीनाई

 

कैदी जो था दिल से खरीदर हो गया.

युसुफ को कैद खाना भी बाज़ार हो गया.

 

उल्टा वो मेरी रुहसे बेझार हो गया.

में नामे हूर लेके गुनहगार हो गया.

 

ख्वाहिश जो रोशनीकी हुइ मुझको हिज्रमें,

जुगनु चमकके शम्ए शबे तार हो गया.

 

एहसान किसीका एस तने लागिर से क्या उठे

सो मन का बोझ सायए दिवार हो गया.

 

बे हिला इस मसीह तलक था गुज़र महाल,

कासिद समज़े कि राहमें बीमार हो गया.

 

जिसमें राहरव ने राहमें देखा तेरा जमाल

आयना दार पूश्ते बदिवार हो गया.

 

क्यों करें तरके उल्फत मझ्गां करुं अमीर

मंसूर चढके दार पे सरदार हो गया.

 

خریدار ہو گیا۔۔۔۔ امِیر مینائ

 

قیدی جو تھا دل سے خریدار  ہو گیا

یوسف کو قید خانہ بھی بازار   ہو گیا

 

اُلٹا وہ میری رُح سے بےزار  ہو گیا

میں نام حور لے کے گنہگار  ہو گیا

 

خواہش جو روشنی کی ہوئ مجھ کو ہجر میں

جگنو چمک کے شمع شبِ تار  ہو گیا

 

احساس کسی کا اس تنِ لاغر سے کیا اُٹھے

سو من کا بوجھ سایہ دوار  ہو گیا

 

بے حیلے اس مسیح تلک تھا گجر محال

قاصد سمجہ کے راہ میں بمارا  ہو گیا

 

جس راہرو نے راہ میں دیکھا تیرا جمال

آینہ دار  پشت  بدیوار   ہو گیا

 

کیوں  کریں ترک الفت مثگاں کروں امیر

منصور چرھ کے دار پہ سردار ہو گیا

 

Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | July 25, 2008

गम मोअतबर नहीं_ जिगर मुरादाबादी غم معتبر نہئں ۔۔۔۔جِگَر مُرادآبادی

 

وہ یوں دل سے گزرتے ہیں کہ آہٹ نہیں ہوتی

وہ یوں آواز دیتے ہیں کہ پہچانی نہیں جاتی

 

                                   غم معتبر نہئں ۔۔۔۔جِگَر مُرادآبادی

 

غم معتبر نہئں مکمل خوشی نہئں

کیا وقت ہے کہ لطف محبت میں بھی نہئں

 

یہ تو نہئں کہ مجھکو سرِ مے کشی نہئں

لیکن ابھی نہئں مرے ساقی ابھی نہئں

 

تسخیر مہر و ماہ مبارک تجھے مگر

دل میں نہئں روشنی تو کہیں نہئں

 

طااعظ میں اب کیا کہوں ، لیکن خطا معاف

جو تیرے سامنے ہے حقیقت وہی نہئں

 

کیا جانےء یہ کونسا عالم ہے اے جگر

دل مضترب ہے اور کوئ بات بھی نہئں

 

 

वो युं दिलसे गुझरते हैं कि आहत नहीं होती

वो युं आवाज़ देते हैं कि पहचानीए नहीं जाती

 

गम मोअतबर नहीं_ जिगर मुरादाबादी

 

गम मोअतबर नहीं , मुकम्मिल खूशी नहीं,

क्या वक्त है कि लुत्फ महोब्बतमें भी नहीं

 

 

ये तो नहीं कि मुझ्को सरे मै कशी नहीं,

लेकिन अबी नहीं ,मेरे साकी अभी नहीं.

 

 

तस्खीर मह्रो माह मुबारक तुझे मगर,

दिलमी नही गर तो कहीं रोशनी नहीं.

 

 

 वाइज अब और क्या कहुं लेकिन खता मुआफ,

 जो तेर सामने है हक़ीकत वही नहीं.

 

 

कया जानिये ये कौनसा आलम है ये जिगर,

दिल मुजतरिब है और कोइ बात भी नहीं

 

 

 

 

Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | July 22, 2008

रात की झूल्फें _मुहम्मदअली ‘वफा’

 

रात की झूल्फें _मुहम्मदअली वफा

 

 

खूब रिश्तोंकी निशानी हो गइ

आपसे मिलना कहानी हो गइ

 

रुकना कहां था? मगर रुक गए

दोसतों की महेरबानी हो गइ

 

बद दिल बूढापा छा गया राह मे

मज़बूर ये कैसी जवानी हो गइ

 

देहलीज पे यारी के कांटे खिले

दुश्मनी  अपनी तवानी हो गइ

 

कैस ज़ंगलमें रहा कुछ चेन से

लयला तो घरमें दीवानी हो गइ

 

याद के खंडहरमें जो झांका जरा

चश्मे गम से तो रवानी हो गइ

 

गम के सूरजने जरा करवट जो ली

रात की झूल्फें  सुहानी हो गइ

 

Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | July 16, 2008

وفا کر چکے ہے ہم۔۔۔۔فیض احمد فیض कया गम है__फैज़ अहमद फैज़

 

  

 

کیا  غم  ہے۔۔۔۔فیض احمد فیض

 

 

 

متاع لوح قلم چھِن گئ تو کیا غم ہے

کہ خون دِل میں دُبولی ہے اُنگلیاں میں نے

 

زباں پہ مُہر لگی ہے تو کیا کے رکھ دی ہے

ہر ایک حلقہ زنجیر میں زباں میں نے

 

 

وفا کر  چکے ہے ہم۔۔۔۔فیض احمد فیض

 

قرض نگاہ یار ادا کر چکے ہیں ہم

سب کچھ نثار راہِ وفا کر چکے ہیں ہم

 

کچھ امتحان دستِ جفا کر چکے ہیں ہم

کچھ دستِ رس کا  پتا کر چکے ہیں ہم

 

اب احتیاط کی کوئ صورت نپیں رپی

قاتل سے رسم و راہ سوا کر چکے ہیں ہم

 

دیکھیں ہے کون کون، ضرورت نہیں رہی

کوءے ستم میں سب کو خفا  کر چکے ہیں ہم

 

اب اپنا اختیار ہے چاہیں جہاں چلے

رہبرسے اپنی راہ جدا کر چکے ہیں ہم

 

ان کی نظرمیں ، کیا کریں، پھیکا ہے اب بھی رنگ

جتنا لہو تھا صرف قبا  کر چکے  ہیں  ہم

 

کچھ اپنے دل کی خوُ کا بھی شکرانہ چاہئے

سو بار اُن کی خُو کا گِلا کر چکے  ہیں  ہم

 

 

 

 

कया गम है__फैज़ अहमद फैज़

 

मताए लोहो क़लम छीन गई तो क्या गम है

कि खूने दिलमें डूबो ली है उंगलिया मेंने

ज़बां पे मुहर लगी है तो क्या के रख दी है

हर एक हलकए जंजीर में जबां मेंने

 

 

वफा कर चुके है हम__ फैज़ अहमद फैज़

 

कर्ज निगाहे यार अदा कर चुके हैं हम

सब कुछ निसार राहे वफा कर चुके हैं हम

 

कुछ इम्तेहान दस्ते जफा कर चुके हैं हम

कुछ दस्ते रस का पता कर चुके हैं हम

 

अब एहतीयात की कोइ सुरत नहीं रही

कातिलसे रस्मो राह कर चुके हैं हम

 

देखें है कौन कौन जरूरत नहीं रही

कुए सितममें सब को खफा कर चुके हैं हम

 

अब अपना इखतियार है चाहे जहां चले

रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम

 

उनकी नज़रमें क्या करें फीका है अबभी रंग

जितना लहूथा सर्फे क़बा कर चुके हैं हम

 

कुछ अपनी दिलकी खू का भी शुक्राना चाहिये

सो बार उनकी खू का गिला कर चुके हैं हम

 

Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | July 16, 2008

اٰپ کے اٰ جانےسے-۔۔۔مخدوم مُحی الدّین आप के आजाने से__ मखदूम मोह्युद्दीन

 

 

ساتھ اٰوُ ۔۔۔مخدوم مُحی الدّین

 

اُسی اداسے اُسی بانکپن کے ساتھ اٰوُ

پھر ایک بار اُسی انجمن کے ساتھ اٰوُ

 

ہم ایک اپنے دِل بے خطا کے ساتھ اٰیں

تماپنے مھشرے دارو رسن کے ساتھ اٰوُ

 

*************************

 

اٰپ کے اٰ جانےسے-۔۔۔مخدوم مُحی الدّین

 

پھر بُلا بھیجا ہے پھُلوں نے گُلستانوں سے

تم بھی اٰ جاو کہ باتیں کریں پپیمانوں سے

 

رُت پلٹ اٰءے گی اک اٰپ کے اٰ جانےسے

کتنے افسانے ہیں ،سننے ہیں دیوانوں سے

 

تحفہ برگِ گُل و بادِ بہاراں لے کر

قافلے عشق کے نکلے ہیں بیاں بانوسے

 

بدلا بدلا سا نظر اٰتا ہے دُنیا کا چلن

اٰپ کے ملنے سے ھم جیسے  پریشانوں سے

 

ہم تو کھلتے ہوئے غنچوں کا تبسُم ہیں ندیم

مُسکراتے ہُوءے ٹکراتے ہیں طُفانوں سے

 

साथ आओ_मखदूम मोह्युद्दीन

 

उसी अदासे उसी बांकपनके साथ आओ

फिर एक बार उसी अंजुमनके साथ आओ

 

हमा एक अपने दिले बे खताके साथ आएं

तुम अपने महशरे दारो रसन के साथ आओ

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आप के आजाने से__ मखदूम मोह्युद्दीन

 

फिर बुला भेजा है फूलोंने गुलिस्तांनो से

तुम भी आजाओ के बातें करें पयमानों से

 

रुत पलट आएगी एक आपके आजाने से

कितने अफसाने हैं, सुनने हैं दीवानों से

 

तोहफए बर्गे गुल व बादे बहारां ले कर

काफले ईश्क के निकले हैं बयाबानों से

 

बदला बदला सा नज़र आता है दुनियाका चलन

आपके मिलनेसे हम जैसे परिशानों से

 

हमतो खुलते हुए गुंचोंका तबस्सुम है नदीम

मुस्कराते हुए टकरातें है तुफानों से

 

 

 

Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | July 12, 2008

ईन्तेझार_मोहम्मदअली वफा,हैदराबादी

 

ईन्तेझार_मोहम्मदअली वफा,हैदराबादी

ईश्क ए हुज्जत बना ईंन्तेज़ार

जाने उलफत बना ईंन्तेज़ार

 

किस कयामतका वादा किया

क्या कियामत बना ईंन्तेज़ार

                                      जब नूरके दो टूकडे

 

दोनोंकी निगाहोंमें फुरकत के गिले होंगे

होटोंपे तबस्सुम के कुछ फूल खिले होंगे

 

काबे से कोइ पूछे उस वस्लके मंझर को

जब नूरके दो टूकडे आपसमें मिले होंगे

 

 

क्या जाने क्या दुशमने हैदरको हुआ है

गुंगोंसे रहे हक़का पता पूछ रहा है

 

 

ए गर्दिशए दौरां तुझे इसका पता है

हम राह मेरे फातिमा झोहराकी दुआ है

 

INTEZAR _Mohammedali Wafa -Hyderabadi‘

ISHQE HUJJAT BANA INTEZAR
JAAN-E-ULFAT BANA INTEZAAR
KIS QAYAMAT KA WADA KIYA
KYA QAYAMAT BANA INTEZAAR …

Dono ki nighaon mein furkhat ke giley honge
Hotoan pe tabassum ke kuchh phool khiley honge
Kaabe se koi puuche us wasl ke manzar ko
Jab noor ke do tukde aapas mein miley honge

Kya jaani kya dushmane Hyder ko hua hai
Guungon se raahe haq ka pata puuch raha hai
Aye gardish-e-dauraan tujhe kuch is ka pata hai
Hamraha mere Fatima Zahra ki dua hai

 

 

 

 

Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | July 12, 2008

یے زندگی کا قافلہ ۔۔۔۔محمد علی ’وفا’’ ये जिंदगी का काफला _मुहम्मदअली वफा

ये जिंदगी का काफला _मुहम्मदअली वफा

 

साया हमारी रातका पिघला हुआसा है
अपना मुकद्दर भी यहां  बिगड़ा हुआसा है.

तूटी हुई दीवारका साया गनीमत  है
अपनां मकां अर्सा हुआ उजड़ा हुआसा है

शायद उसे  भी मिल गया कोई महेरबां
पलकों उपर पानी जरा ठहरा हुआसा है.

हर जाई मंझीलों  तले ठहरें न हम कभी,
ये जिंदगी का काफला उखड़ा हुआसा है.

चलदो वफा ईस मयकदे से दूर ही कहीं
शीशों भरा किर्दार भी तूटा हुआसा है.

 

یے زندگی کا قافلہ  ۔۔۔۔محمد علی ’وفا’’

 

سایہ ہماری رات کا پگھلا ہوا سا ہے

اپنا مقدّر بھی یہیاں بگڑا  ہوا سا ہے

 

ٹُوٹی ہٰئ دوارکا سایہ غنیمت ہے

اپنا مکاں عرصہ ہوا اُجڑا ہوا سا ہے

 

شاید اُسے بھی مل گیا کوئ مہرباں

پلکوں اوپر پانی ذرا تھہرا ہوا سا ہے

 

ہر جائ منزلوں تلے تھہرے نہ کبھی ھم

یہ زندگی کا قافلہ  اکھرا ہوا سا ہے

 

چلدو ’وفا’اس میقدہ سے دور ہی کہیں

شیشوں بھرا کردار بھی ٹوٹا ہوا سا ہے

Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | July 5, 2008

गिला ए दिल_ मौलान मुहम्मदअली’जौहर’ گلہ اے دل ۔۔۔۔مولانا محمدعلی ’جوہر’

 

گلہ اے دل ۔۔۔۔مولانا محمدعلی ’جوہر

 

گلہ اے دل ابھی سے کرتا ہے

عشق کا دم اسی پہ بھرتا ہے

 

جان دےتا ہے   عیشِ فانی پر

بس  اسی زندگی پہ مرتا ہے

 

راحت جاوداں کو بھول گیا

کوئ دنیا میں یہ بھی کرتا ہے

 

عشق بن کر جےَ تو خاک جئے

جندہ وہ ہے جو ان پر مرتا ہے

 

نام پر اس کے سب جو دے بیٹھا

وہی اک ہے جو نام کرتا ہے

 

गिला ए दिल_ मौलान मुहम्मदअलीजौहर

 

गिला ए दिल अभी करता हैं

इश्क का दम इसी पे भरता है

 

जान देता है एशे फानी पर

बस इस जिन्दगी पे मरता है

 

राहते जावेदांको भूल गया

कोइ दुनियामें ये भी करता है

 

इशक बन कर जिये तो खाक जिये

जिन्दह वह है जो इन पर मरता है

 

नाम पर उसके सब जो दे बैठा

वही एक हे जो नाम करता है

 

 

Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | July 4, 2008

کبھی اے حقیقت۔۔۔۔علّامہ محمد اِقبال कभी ऐ हक़ीक़ते मुंतजर_- अल्लामा मुहम्मद इक़बाल

कभी ऐ हक़ीक़ते मुंतजर_- अल्लामा मुहम्मद इक़बाल

 

कभी ऐ हक़ीक़ते मुंतजर नज़र आ लिबासे-मजाज़ में ।

कि हजारों सज़दे तड़प रहे हैं मरी जबीने-नयाज़ में ।।

तर्ब आशनाए खरोश हो,तु नवाए महरुमे गोश हो

वह सरूर क्या कि छुपा हुआ हो सकुते पर्दए साजमें

तू बचा बचा के न रख इसे तेरा आईना है वो आईना,

जो शकस्ता हो तो अज़ीज़तर है निगाहे-आईनासाज़ में ।

दमे तूफ करमके शमाने कहा कि वह असरे कुहन!

न तेरी हिकायते सोझमें न मेरी हदीसे गुदाझ में

न कहीं जहाँ में अमाँ मिजी जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली,

मेरे जुर्म-हाय-सियाह को मेरे अफ़वे-बंदानवाज़ में ।

न वो इश्क में रही गर्मियाँ न वो हुस्न में रहीं शोखियाँ,

न वो ग़जनवी में तड़प रही न वो ख़म है जुल्फ़े-अयाज में ।

जो में सर बसजदह हुआ कभी तो,जमींसे आने लगी सदा!

तेरा दिल तो है सनम आशनां तुज्हे क्या मिलेगा नमाज में.

کبھی اے حقیقت۔۔۔۔علّامہ محمد اِقبال

दिल्ही में उर्दू के मुम्ताज जदीद शायर आदिल मन्सूरी के एजाज में नशीश्त_ध इन्किलाबमुम्बइ

 

उर्दू की नइ बस्तीयोंमें भी नइ नसल उर्दूसे बेगाना हैः डोकटर शेहपर रसूल

 

उर्दू के माअरूफ शायर और मुसव्वीर  आदिल मन्सूरी के एजाज में जमिआ नगर,नइ दिल्ही के मुजीब बागमें एक नशीश्त का एनएकाद किया गया.

आदिल मन्सूरी एक तवील अर्से से अमरीकामें मुकीम है.गुजिश्ता दिनों गुजरातकी हकुमतने उन्हें वली गुजराती एवॉर्ड से सरफरज किया था.इसी सिसिलेमें वो हिन्दोस्तां के दौरे पर हैं.

उन्होंने दिल्ही में भी एक दिन कयाम किया.इस नशीश्तमें हिन्दुस्तानी शायरी के अमुमी मैलानात  और मोजुदा रुहजान पर गुफ्तगु हुइ.

आदिल मन्सूरी चुं कि उर्दू के अलावा गुजराती जबान के भी शायर है,इस लिये न्होने गुजराती अदब के मौजुदा मन्झरनामे पर भी गुफ्तगु की.और कहा कि गुजराती में जो गझ्लें कही जा रही है उनमें नए मजामीनकी तलाश पर ज्यादा जोर है.गुजराती जबानके मुशायरों में शायरी की वही हैयत मकबूल है, जीसे हम उर्दू वाले गझ्ल कहेते हैं.

जुबेर रजवीने कहा कि आज कल मरुजा सारफी कल्चर एक तरह से जबानो तेहजीब की नफी करने वाला है.

डोकटर शहीर रसुल ने कहा कि इन दिनों उर्दूकी नई बस्तियों का बहुत शोर है,लेकिन हमें ये भी ध्यान रखना चाहिये वहां परवान चढने वाली नई नसल उर्दूसे बेगाना है.

नशिश्त के मेजबान डॉकटर अहमद महफूजने कहा कि ये बात बहर हाल खूश आइन्द है कि हमने इस मोके को गनीमत जान कर न सिर्फ ये कि आदिल मन्सूरीसे उनका कलाम सुना,बल्कि उर्दू के अलावा बाज दीगर जबानों की शायरी पर गुफ्तगु भी हुइ.उन्होने कहा कि गुजिस्ता चार दहाइओंसे आदिल मन्सूरि जदिदयतके निहायत मोअतबर और नुमाइन्दह शायर और फनकार के तौर पर दुनियामें मअरुफ और मकबूल है.

जनाब खालिद बीन सुहैलने कहा कि आदिल मन्सूरी की शायरीकी दुनियामे जो हेसियत है,वो तो मुसल्लम है ही, मगर मे उन्हें एक बहुत अच्छे आर्टीस्ट के तौर पर भी जानताहुं.हेरतकी बात है कि दोनो काम एक साथ निहायत उमदगीसे साथ आदिल साहब केसे अन्जाम देते हैं.

नशीश्तमें दिल्ही के मुमताज अहले अदब और दीगर मोअज्जजीननें भी शिर्कत की.

(रीपोर्टः उमैर मन्जुर   ,दिल्ही)

ऊर्दू अखबार ध इन्किलाबमुम्बइ के सौजनयसे)

  With Courtesy of ‘The Inquilab’ Urdu Mumbai 1st July2008

 

 

 

 

Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | June 30, 2008

खूश्बूओं का साया ह॑ - बशीर बद्र خُوشبُواں کا سایا ہے۔۔۔بشیر بدر

خُوشبُواں کا سایا ہے۔۔۔بشیر بدر

खूश्बूओं का साया ह॑ - बशीर बद्र

 

वह चांदनी का बदन खूश्बूओं का साया ह॑

बहुत अजीज है हमें मगर पराया है

 

उतर भी आओ कभी आस्मां के झीने से

तुम्हे खुदाने हमारे लीये बनाया है.

 

कहांसे आई ये खूश्बू ये घरकी खूश्बू है

इस अजनबीके अंधेरेमें कौन आया है

 

उसे किसीकी महोब्बत का एतेबार नहीं

उसे जमानेने शायद बहुत सताया है.

 

तमाम उम्र मेरा दम इसी धूएंमें घुटा

वो  एक चिराग थां मेंने उसे बुझाया है.

Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | June 27, 2008

आबाद शहरको छोड कर__ आदिल मन्सूरीآباد شہر چھوڑ کے۔۔۔عادل منصوری

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आबाद शहरको छोड कर

आबाद शहरको छोड कर सुनसान रास्ते
जंगल के सिम्त जाने किसे ढुंढने लगे

क्या पूछ्ते हो कैसे रहे दिन बहार के
गर फूल, बेशुमार थे कांटे भी कम न थे

घरसे गलीकी सिम्त मेरे पांव जब बढे
दरवाजे पूछ्ने लगे साहब किधर चले

हद्दे_ नजर तलक मेरे दीवारए बामो दर
हसरत भरी नजरसे मुझे देखते रहे

पानी पिलाने वाला वहां कोइ भी नथा
पनघट के पास जा के भी हम तिशन लब रहे

शोले उगलते गुजरी है सड्कोंसे दो पहर
आदिल तमाम पेडोंके साये वो जल गये

_ आदिल मन्सूरी

(हश्रकी सुबह दरखशां हो_154)

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