Posted by: Mohammedali’wafa’मोहम्म्दअली’वफा’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | February 6, 2008

बरसोके बाद भी- ‘क़ालु’ कव्वाल

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बरसोके बाद भी 

जालिम रहा है आसमां बरसोके बाद भी.
अदावत भरा है ये झमां बरसोके बाद भी.

मोहिद बने रहना यहां होता गूनाह कया?
जारी अभी तक ईमतेहां बरसोके बाद भी.

हमतो बने बारिश कदे जंगल जरा देखो,
कटते रहे हमतो यहां बरसोके बाद भी.

मांगा पसीना तो हमारा खूने जिगर दिया,
फिरभी बने हम ही निशां बरसोके बाद भी.

घर भी गये लूटे यहां असमत भी लूट गइ,
मिलता नहीं कोइ पासबां बरसोके बाद भी.

आई कभी खद्दर कभी तो रंगे जाफरां ,
 दुश्मन रहे बूढे जवां बरसोके बाद भी.

खंजर रहे कातिल दरिंदो के हम पर घूमते
बन कर रहे मझलुम यहां , बरसोके बाद भी.

ये चमन महरुम था बहारों की वो फसल से
छाई रही हमपर खिझां बरसोके बाद भी.

दिलके फफोले ‘कालु’ खोलुं अब जा कर कहां,
 हसते रहे सब सुन बयां बरसोके बाद भी.


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