Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | March 25, 2008

नींद के गाढे जंगलमे_मोहंमदअली वफा

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नींद के गाढे जंगलमे

नींद के गाढे जंगलमे
आंखोकी पलकों को
मीलनाथा
 पर ये तो खुली ही रह गई
अब खुली आंखोसे
तेरे
सोये हुए ख्वाब देखती है
***************
तल्खीयों के नाखुन
कीतने लंबे हो गये
सूरजकी गरदन कुरेदकर
दिन भर लहु निकाला
लोग उसे रोशनी समझे
 धोका खा गये
जबये खून सुखकर
 काला हुआ
तारिक्यों के सांप
जमींको निगल गये.
(6सप्टे.2007)

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