नींद के गाढे जंगलमे
नींद के गाढे जंगलमे
आंखोकी पलकों को
मीलनाथा
पर ये तो खुली ही रह गई
अब खुली आंखोसे
तेरे
सोये हुए ख्वाब देखती है
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तल्खीयों के नाखुन
कीतने लंबे हो गये
सूरजकी गरदन कुरेदकर
दिन भर लहु निकाला
लोग उसे रोशनी समझे
धोका खा गये
जबये खून सुखकर
काला हुआ
तारिक्यों के सांप
जमींको निगल गये.
(6सप्टे.2007)
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