अपने अनफास की_रियाज़ लतीफ

सब खलाओंको खलाओंसे भीगो सकताहै
आदमी रुह के अंदरभी तो रो सकता हौ.
ये सियाहीका सिरा जाने कहां हाथ आए
मेरा साया तेरा बातीन भे तो हो सकता ऐ.
दस्तरस तेरे समंदरकी है तुझसे भी परे
तु मुझे आंख से बाहर भी डुबो सकता है.
ले तो अया है मुझे मौतकी गर्दीशसे अलग
तुं मुझे सांसके महवर पे भी खो सकता है.
अपने अनफास की तेहरीक पे बिखरा है मगर,
तु मेरे लम्समें यकजा भी तो हो सकता है.
तेरी मिट्टीने समोया नहीं तो कया है रियाझ,
तु तो ईस जिस्मके बाहर कहीं सो सकता है.