Posted by: मोहम्म्दअली’वफा’Mohammedali’wafa’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | April 22, 2008

अपने अनफास की_रियाज़ लतीफ

अपने अनफास की_रियाज़ लतीफ

 

 

सब खलाओंको खलाओंसे भीगो सकताहै
आदमी रुह के अंदरभी तो रो सकता हौ.

 

ये सियाहीका सिरा जाने कहां हाथ आए
मेरा साया तेरा बातीन भे तो हो सकता ऐ.

 

दस्तरस तेरे समंदरकी है तुझसे भी परे
तु मुझे आंख से बाहर भी डुबो सकता है.

 

ले तो अया है मुझे मौतकी गर्दीशसे अलग
तुं मुझे सांसके महवर पे भी खो सकता है.

 

अपने अनफास की तेहरीक पे बिखरा है मगर,
तु मेरे लम्समें यकजा भी तो हो सकता है.

 

तेरी मिट्टीने समोया नहीं तो कया है रियाझ,
तु तो ईस जिस्मके बाहर कहीं सो सकता है.

 

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