ख्वाबों के परिन्दे__मुहम्मदअली वफा
तन्हाईकी गारों में है यादों के परिन्दे
और यारके हाथोमें है वादों के परिन्दे
शगूफे फूल के उठाके ले गया गुलचीं
रहे बागबाके हाथमें काटों के परिन्दे
ये अल्विदाकी रस्मभी अजीब है यारो
उडते है चारों औरसे हाथों के परिन्दे
मुद्दत हुई कोई गिला सुन नहीं पाया
क्या सर्दहो गयें है अब सांसों के परिन्दे
वाके ही उसको कोइ भी पाया नहीं पकड
आंखो में बसे रहतें हैं ख्वाबों के परिन्दे