Posted by: Mohammedali’wafa’मोहम्म्दअली’वफा’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | June 30, 2009

ख्वाबों के परिन्दे__मुहम्मदअली वफा

ख्वाबों के परिन्दे__मुहम्मदअली वफा

 

तन्हाईकी गारों में है यादों के परिन्दे

और यारके हाथोमें है वादों के परिन्दे

 

 शगूफे फूल के उठाके ले गया गुलचीं

 रहे बागबाके हाथमें  काटों के परिन्दे

 

  ये अल्विदाकी   रस्मभी अजीब है यारो

उडते है चारों औरसे   हाथों के परिन्दे

 

 मुद्दत हुई  कोई  गिला सुन नहीं पाया

क्या सर्दहो गयें है अब सांसों के परिन्दे

  

वाके ही उसको कोइ भी  पाया नहीं पकड

आंखो में  बसे रहतें हैं  ख्वाबों के परिन्दे


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