Posted by: Mohammedali’wafa’मोहम्म्दअली’वफा’મોહમ્મદઅલી’વફા’ مُحمَّد علی،وَفا، | November 16, 2009

ज़ंगलोमें आदमी मिलते नहीं__आदिल मन्सूरी

ज़ंगलोमें आदमी मिलते नहीं__आदिल मन्सूरी

 

नींद के दीमक –ज़दा गत्ते के पीछे

ख्वाब के सूखे हुए तालाब में

चांदनी की किश्तियों में

खून में लिथडी हुई यादोंकी लाशें

बन्द होंटों से हवाके कानमें कुछ कह रही है

पत्थरोंमें मुंह छिपाते फिर रहें है देवता

जंगलोमें आदमी मिलते नहीं

फूल मुरझाये हुए खिलतें नहीं

काली सडकें

मेरे घर तक आते आते

सुर्ख हो जाती है क्यों

टूट क्यों जाता है खवाहिशों का फुसुं

 


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  1. thanks


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