Posted by: Bagewafa | January 26, 2012
मुसीबत पड़ गई है—अब्दुल हमीद ‘अदम’
शिकन न डाल जबीं पर शराब देते हुए
ये मुस्कराती हुई चीज़ मुस्करा के पिला
सरूर चीज़ की मिक़दार पर नहीं मौकू़फ़
शराब कम है तो साकी नज़र मिला के पिला
मुसीबत पड़ गई है—अब्दुल हमीद ‘अदम’
गिरह हालात में क्या पड़ गई है
नज़र इक महज़बीं से लड़ गई है
निकालें दिल से कैसे उस नज़र को
जो दिल में तीर बनकर गड़ गई है
मुहव्बत की चुभन है क़्ल्बो-जाँ* में
कहाँ तक इस मरज़ की जड़ गई है
ज़रा आवाज़ दो दारो-रसन* को
जवानी अपनी ज़िद्द पे अड़ गई है
हमें क्या इल्म था ये हाल होगा
“अदम” साहब मुसीबत पड़ गई है
0.000000
0.000000
Like this:
Be the first to like this post.
Posted in उर्दु गझल, उर्दू, गझल, नजम, ग़ज़ल, ગઝલ, Gazhal, Nazm, Urdu Gazhal, اردو غزل, غزل | Tags: Abdul Hamid Adam, उर्दु गझल, गझल, नजम, ग़ज़ल, Urdu Gazhal, Urdu shero shayri, اردو غزل, غزل
Recent Comments