Posted by: Bagewafa | مئی 29, 2008

دردِ دل۔۔۔محمد علی وفا दर्दे दिल_ मोहम्मदअली वफा

دردِ دل۔۔۔محمد علی وفا 

دل بھرا ہے درد سے  ِکسکو دکھایں چر کر

ماملہ اپنے غمکا کیوں سناءے چینکھ کر

 

سب  ہُےء  مشروڑ جب سنا قصّہ  غم

ایک چھوتی سی کہانی کیوں بڑہا یے کھینچ کر

 

جب سنبھل نا تھا ہمیں مانے نہیں اے دوستو

اب فسلتی راہ پرکیسےچلے ہم دیکھ کر

 

چار دیواری بنی  قمت چکا کے بڑی

مل گیا گھرتو  نیا گر زنگی کو بیچ کر

 

آنکھ کی قسمت کا تارا اب وفا چمکا سہی

مل گیا سرمہ کا پتّھر اب لگانا پیس کر

 

 

दर्दे दिल_ मोहम्मदअली वफा

दर्दे दिल है मगर किसको दिखायें चीर कर.
अपने गमका मामला है क्युं सुनाए चींख कर.

सब हुए मशरूर, जब कि सुना किस्सए गम.
एक छोटी सी कहानी क्युं बढ़ाये खींच कर.

जब संभलनाथा हमे संभ्ले नहीं ए दोस्तो
अब फिसलती राह पर क्यों चले हम देख कर.

चार दीवारी बनी है ,गर चुकाके किमत बड़ी,
मिल गया है घर हमें जिन्दगीको बेच कर.

आंखकी किस्मतका चमका है तारा अब वफा,
सुरमे का पत्थर है, ये उस्को लगाना पीस कर.

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