Posted by: Bagewafa | اگست 30, 2008

دشمن بھی بدل دوں۔۔۔محمد علی وفاदुश्मन भी बदलदुं.__ मुहम्मदअली’वफा’

دشمن بھی بدل دوں۔۔۔محمد علی وفا

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چہرا بھی بدل دوں ، چلمن بھی بدل دوں

کیا کَہ رہے ہو آج تم دشمن بھی بدل دوں 

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  ہم تو کھلینگے سدا جنگل ہو یا صحرا 

فطرت نہیں میری کہ گلشن بھی بدل دوں 

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بہتا رہا میں تو کبھی جنگل بیاباں میں 

 ممکن نہیں اے  کہ پیرہن  بھی بدل دوں 

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معصومیت کے برگ سے جسکا نکھار ہے 

 کس طرح ممکن ہے کہ  بچپن    بھی بدل دوں 

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میری وفا کا ساتھ رہیگا عدم میں بھی 

 میں وہ نہیں کے در کر مسکن بھی بدل دوں

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दुश्मन भी बदलदुं.__ मुहम्मदअलीवफा

 

चेहरा भी बदलदुं और चिलमन भी बदल दुं,

क्या कह रहे हो आज तुम, दुश्मन भी बदल दुं.

 हम तो खिलेंगे वहां बंझर हो या सहरा,

मुमकीन नहीं है दोस्त में गुलशन भी बदल दुं.

 चलता रहा में तो कभी जंगल बयांबां में,

 फितरत नहीं मेरी कि पहरन भी बदलदुं.

 मासुमियत के बर्ग से जीसका निखार है,

 मुमकिन है कैसे कि बचपन भी बदलदुं.

 मेरी वफा का साथ रहे गा अदम में भी,

में वो नहीं जो डरके मसक्न भी बदलदुं

 

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