Posted by: Bagewafa | اپریل 24, 2009

अच्छा लगता है__क़ैसरुल जाफरी__ رونا اچھا لگتا ہے۔۔۔۔قیصر الجعفری

رونا اچھا لگتا ہے۔۔۔۔قیصر الجعفری 

 

 

دِیواروں سے مِلکر رونا اچھّا لگتا ہَے، 

 

ہم بھی پاگل ہو جاینگے اَیسا لگْتا ہَے۔ 

 

 

دُنِیا بھر کی یادیں  ہم سے مِلنے آتی ہَے، 

 

شام ڈھلے اِس سُنے گھر میں میلا لگتا ہَے۔ 

 

 

کِتنے دِنوں کے پْیاسے ہونگے، یارو سوچو تو، 

 

شبنم کا اِک قَطتْرہ جِن کو درِیا لگتا ہَے۔ 

 

  

کِس کو قَیصر پتھر مارُں، کَون پرایا ہَے؟ 

 

شِیش محل میں ہر ایک چہرا اپنا لگتا ہَے۔ 

अच्छा लगता है__क़ैसरुल जाफरी

दीवारो से मिलकर रोना अच्छा लगता है,
हम भी पागल हो जायेंगे ऐसा लगता है.

दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती है,
शाम ढले इस सुने घर में मेला लगता है.

कित ने दिनो के प्यासे होंगे, यारो सोचो तो,
शबनम का इक कत्रा जिनको दरिया लगता है.

किस को कैसर पथर मारु, कौन पराया है?
शीशमहल में हर एक चेहरा अपना लगता
है.

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