Posted by: Bagewafa | ستمبر 12, 2009

दीवारें न देख।- दुष्यंत कुमार

दीवारें न देख।- दुष्यंत कुमार

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,

पर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख।

  

एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ,

आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख।

  

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह,

यह हक़ीक़त देख लेकिन खौफ़ के मारे न देख।

 

  वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,

कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख।

  

ये धुंधलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,

रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख।

  

राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई,

राख में चिनगारियां ही देख अंगारे न देख।

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Responses

  1. वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,

    कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख।
    आभार ।


زمرے

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