Posted by: Bagewafa | جنوری 10, 2010

बहुत दिनो के बाद–बाबा नागार्जुन

बहुत दिनो के बाद–बाबा नागार्जुन

 

बहुत दिनोंके बाद

अब की मैंने जी भर देखी

पक्की सुनहली फसलोंकी मुस्कान

बहुत दिनों के बाद

 

 

बहुत दिनोंके बाद

अब की में जी भर सुन पाया

धान फूतती किशोरियोंकी

कोकिल कंठी तान

 

बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों के बाद

अब की में जी भर छू पाया

अपनी गंवई पगदंडी की

चंदन वर्णी धूल

बहुत दिनों के बाद

 

 

बहुत दिनों के बाद

अब की में जी भर भोगे

रूप गंध शब्द स्पर्श

सब साथ साथ

ईस भू पर

बहुत दिनों के बाद

 

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Responses

  1. a very touching poem! Nice to be with those familiar things which we seem to have lost forever.


زمرے

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