Posted by: Bagewafa | جنوری 3, 2011

वक़्त के ग़ुबारों में।– प्रोफ़ेसर देवेन्द्र मिश्र

वक़्त के ग़ुबारों में।– प्रोफ़ेसर देवेन्द्र मिश्र

 

  सुना जब जायेगा मिलने को खुदा से क़ाफ़िर,

तहलका मच गया मज़हब के ठेकेदारों में।

 

ठहरता देर तक कभी भी नहीं वक़्त अच्छा,

ग़ुम हो जाता है क्यों वक़्त के ग़ुबारों में।

 

जब तड़प दिल में थी तो शौक न  था लिखने का,

अब जो लिखता हूं तो है  दम नहीं  अश्आरों में।

 

रिश्ते नाते सभी इस दुनिया का दिखावा हैं,

ये बदल जाते हैं बस चंद ही इशारों में।

 

हमने धीरे से कहा तुमसे प्यार करते हैं,

तुमने हंगामा किया गांव के गलियारों  में।

 

ग़ैर की बात करूं इसका नहीं हक़ मुझको,

मेरी हर बात आम हो गयी बाज़ारों में।

 

फिक्र किस की करूं कब तलक मर के जियूं,

अता होगा वही लिखा है जो सितारों में।


زمرے

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