Posted by: Bagewafa | مارچ 6, 2011

फागुन में बागन में रागिनि कोई गाय – गोपाल बघेल ‘मधु’

फागुन में बागन में रागिनि कोई गाय – गोपाल बघेल ‘मधु’

(मधु गीति सं. १७०१, दि. २ मार्च, २०११)

 

फागुन में बागन में रागिनि कोई गाय, अगिनी हिया मेरे उमगति चली जाय;

कोयल कबहु आय, मन प्राण भरि जाय, कायल करत मोरे जिय में बसत जाय.

 

मैं गाऊँ मधु – गीति प्राणन में भरि श्रीति, प्रीतिन की मृदु रीति नैनन बिफरि जाति;

रंग में बिखरि जाति टेशुन में खिलि जात, उर रंगि कें गोरिन के होटन पै नित आत.

मैं नाचूँ औ याचूँ मोहन कौ मधु गान, वंशी की सुर तान पपिहन कौ मृदु गान;

वृन्दावन मम मन में कुँजन है मन खग में, जमुना की कल कल में जल की हर सिहरन में.

 

उमग्यौ हर अंकुर है त्रण त्रण उर फागुन है, सरिता सुर संवित है सविता त्वर संचर है;

प्रतिसंचर प्रति चर है सात्विक उर उत्सुक है, सृष्टि सुर मोहित है छन्दायित हर कवि है.

वरसाने रस वरसत ब्रज में आनन्द रसत, हर उर की सांसन में राधा कौ फाग बसत;

मधुकूँ खग मग जोहत कान्हां कौ सुर गाय, कोयल की कूकन ते मधुवन मन फुरि जाय.

 

रचयिता: गोपाल बघेल मधु

टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा


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