Posted by: Bagewafa | اپریل 21, 2011

फ़ैज़: तु्म्हारे नाम पर आएंगे सोगवार चले_मिर्ज़ा एबी बेग

(1911-1984)

फ़ैज़: तु्म्हारे नाम पर आएंगे सोगवार चले_मिर्ज़ा एबी बेग

(बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, दिल्ली से)

 

बीसवीं शताब्दी के उर्दू के सबसे रूमानी और क्रांतिकारी शायरों में से एक फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को उनकी जन्म शताब्दी पर हाल में दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में याद किया गया.

इस कार्यक्रम को नाम दिया गया था "गुलों में रगं भरे बादे-नौबहार चले.” वैसे भी फ़ैज़ ने कहा था:

बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल ग़रीब सही—तुम्हारे नाम पर आएंगे सोगवार चले

वैसे तो वर्ष 2011 उर्दू की कई मश्हूर हस्तियों की जन्म शताब्दी है लेकिन फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को जितना याद किया जा रहा है शायद किसी और को नहीं. शायद इसलिए कि फ़ैज़ ने ही कहा था, "हम जहां पहुंचे कामियाब आए.”

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ क्रांतिकारी विचारधार के साथ प्रगतिशील आंदोलन के प्रमुख शायर के तौर पर भी काफ़ी चर्चित रहे हैं.

इंसान-दोस्ती और उदारता.

फ़ैज़ की शायरी दिलों को छूने वाली है, उनमें गहराई भी है और तासीर भी. फ़ैज़ के कलाम में कई आयम और नवीनता है۔

प्रोफ़ेसर गोपीचंद नारंग

भारत में उन्हें याद करने का सिलसिला वैसे तो जनवरी से ही शुरु हो गया था लेकिन उनकी वर्षगांठ 13 फ़रवरी से एक दिन पहले ही से इंडिया हैबिटैट सेंटर में उन्हें याद करते हुए पांच दिन का एक कार्यक्रम आयोजित हुआ और फ़िल्म दिखाई गई.

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर सदीक़ुर रहमान क़िदवई ने कुछ "इश्क़ किया कुछ काम किया” के तहत फ़ैज़ को याद करते हुए मानव प्रेम के पहलू पर नज़र डाली.

उन्होंने कहा, "उर्दू शायरी में रक़ीब (प्रेम में प्रतिद्वंवी) एक ऐसा पात्र है जिससे नफ़रत की जानी एक परंपरा है और उसे निशाना बनाने और बुरा भला कहने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा जाता है. लेकिन फ़ैज़ ने अपने रक़ीब का एक अलग ही चित्रण किया है जो उनकी इंसान-दोस्ती और उदारता को दिखाता है.”

फ़ैज़ की यह नज़्म काफ़ी लोकप्रिय हुई जिसकी चंद पंक्तियां इस तरह हैं:

आ कि वाबिस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझसे
जिसने इस दिल को परीख़ाना बना रखा था
जिसकी चाहत में भुला रखी थी दुनिया हमने
दहर को दहर का अफ़साना बना रखा था.

 

फ़ैज़ पर उर्दू के मश्हूर लोगों ने विचार व्यक्त किए.

इसी प्रकार जेल से फ़ैज़ ने अपनी पत्नी एलिस फ़ैज को जो पत्र लिखा था और फ़ैज़ की पत्नी ने जो पत्र लिखे थे, उनको नाटकीय ढंग से रेडियो आर्टिस्ट सलीमा रज़ा और दानिश इक़बाल ने पेश किया.

प्रदर्शनी:

फ़ैज़ की याद में "गड़ती हैं कितनी सलीबें मेरे दरीचे में” शीर्षक के तहत यादगार चीज़ों की प्रदर्शनी भी लगाई गई.

फ़ैज़ पर शाहिद माहुली की किताब फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ शख़्सियत और जेहतें का विमोचन करते हुए उर्दू के प्रसिद्ध आलोचक प्रोफ़ेसर गोपीचंद नारंग ने कहा, "फ़ैज़ की शायरी दिलों को छूने वाली है, उनमें गहराई भी है और तासीर भी. फ़ैज़ के कलाम में कई आयम और नवीनता है.”

"कब ठहरेगा दर्दे-दिल कब रात बसर होगी” शीर्षक के तहत उर्दू-हिंदी में प्रगतिशील लेखन पर एक गोष्ठी का भी आयजन किया गया.

"यूं सजा चांद कि झलका तेरे अंदाज़ का रंग” के तेहत समीना डे ने फ़ैज़ की ग़ज़लें प्रस्तुत कीं.

वैसे फ़ैज़ की ग़ज़लों और नज़्मों को फ़िल्मों में भी जगह मिल चुकी है और सुरैया समेत बड़े गायकों ने उनकी शायरी को अपनी आवाज़ दी है.

 

फ़ैज़ को कारावास भी हुई और निर्वासन भी मिला

फ़िल्म निर्माता और कार्यक्रता गौहर रज़ा और सुहैल हाशमी ने फ़ैज़ की ग़ज़लें और नज़में सुनाईं.

संगातीकार और गायक सुदीप ने "गुलों में रंग भरे बादे-नौबहार चले” के तहत फ़ैज़ के कलाम को पेश किए.

अलग अंदाज़ में:

इसके अलावा जामिया मिलिया इस्लामिया में 17 फ़रवरी को फ़ैज़ के जीवन और उनकी कृतियों पर आधारित एक प्रोग्राम का आयोजन हुआ और दास्तानगोई के अंदाज़ में महमूद फ़ारूक़ी और दानिश हुसैन ने फ़ैज़ की रचनाओं को पेश किया.

इससे पहले 25 जनवरी को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में फ़ैज़ की याद में एक बड़ा प्रोग्राम आयोजित हो चुका है जिसमें उनकी बेटी सलीमा हाशमी ने भी शिरकत की थी.

उस मौक़े पर उन्होंने कहा था कि जनरल ज़िया-उल-हक़ की तानाशाही के ज़माने में भी फ़ैज़ का कलाम लोगों के लिए उत्साहवर्धक था और "हम देखेंगे” एक प्रकार से ज़ुल्म से मुक्ति का नारा था और क्रांतिकारियों के लिए मुक्ति गान था.

उन्होंने कहा कि आज भी उनका कलाम ताज़ा और प्रासंगिक है. जब ट्यूनिशिया और मिस्र में शांतिपूर्ण क्रांति के नतीजे में सत्ता में बदलाव आया तो लोगों ने फ़ैज़ के इस शेर को याद किया "सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख़्त गिराए जाएंगे.”

फ़ैज़ का जन्म 1911 में हुआ और 1984 में उनका देहांत हुआ. उनकी कृतियों में नक़शे-फ़र्यादी, दस्ते-सबा, ज़िंदाँ-नामा, दस्ते-तहे-संग शामिल हैं जिन्हें एक जगह नुस्ख़ाहाए वफ़ा के नाम से प्रकाशित किया गया है. शायर और क्रांतिकारी के अलावा फ़ैज़ पत्रकार और अध्यापक के रूप में भी जाने जाते हैं.

 

h4>Read and listen one Gazhl of Faiz Ahmed Faiz

 

गुलशन का करोबार चले—फैज़ अहमद फैज़

 

गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का करोबार चले

 

क़फ़स उदास है यारो, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

 

कभी तो सुब्ह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-ए-बार चले

 

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़मगुसार चले

 

जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब -ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तेरी आक़बत सँवार चले

 

हुज़ोओर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब
गिरह में लेके गरेबाँ का तार तार चले

 

मक़ाम ‘फैज़’ कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

Click the following URL to listen the Gazhal Sung by Mehdi Hasan

http://www.youtube.com/watch?v=4C03gLRHn6s

Advertisements

زمرے

%d bloggers like this: