Posted by: Bagewafa | ستمبر 11, 2011

खूश्बू ठहर गई.—मुहम्मदअली वफा

खूश्बू ठहर गई.—मुहम्मदअली वफा

 

देखो खिजां कीभी यहां किस्मत संवर गई

वो तो चले गये मगर खूश्बू ठहर गई

 

यादोंके झरोंखेसे तो गुम हो गई मता

अभी अभी यहांथी- अब वो किधर गई

 

बरसोंकी अब ये बात -माजीकी दास्तां

काफला गुजर गया- धूल भी बिखर गई

 

 बुलन्दियों पर अब कोई फख्र न करे

नदीआं वहां गई ढलाने जिधर गई

 

अब उसका कोई पता है न ठिकाना

मजनूकी सदाथी आई गुजर गई

 

पाएगा वो कया वफा बहते गुबार में

रेत के दरियामें जिसकी सहर हुई

11सप्टे.2011


زمرے

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