Posted by: Bagewafa | ستمبر 14, 2011

तकसीम-सआदत हसन मन्टो

तकसीम-सआदत हसन मन्टो


एक आदमी ने अपने लिए लकड़ी का एक बड़ा संदूक मुंतखब किया, जब उसे उठाने लगा तो संदूक अपनी जगह से एक इंच भी न हिला। एक शख्स ने जिसे शायद अपने मतलब की कोई चीज मिल ही नहीं रही थी, संदूक उठाने की कोशिश करने वाले से कहा :‘‘मैं तुम्हारी मदद करूँ।’’

संदूक उठाने की कोशिश करने वाला इम्दाद लेने पर राजी हो गया। उस शख्स ने जिसे अपने मतलब की कोई चीज मिल नहीं रही थी, अपने मजबूत हाथों से संदूक को जुंबिश दी ओर संदूक उठाकर अपनी पीठ पर धर लिया – दूसरे ने सहारा दिया, और दोनों बाहर निकले।

संदूक बहुत बोझिल था। उसके वजन के नीचे उठानेवाले की पीठ चटख रही थी और टाँगे दोहरी होती जा रही थीं, मगर इनाम की तवक्को ने उस जिस्मानी मशक्कत का एहसास नीम मुर्दा कर दिया था।
संदूक उठाने वाले के मुकाबले में संदूक को मुंतखब करने वाला बहुत कमजोर था—सारा रास्ता वह सिर्फ एक हाथ से संदूक को सहारा देकर अपना हक कायम रखता रहा।

जब दोनों महफूज मुकाम पर पहुँच गए तो संदूक को एक तरफ रख कर सारी मशक्कत बर्दाश्त करने वाले ने कहा : ‘‘बोलो, इस संदूक के माल में से मुझे कितना मिलेगा?’’
संदूक पर पहली नजर डालने वाले ने जवाब दिया : ‘‘एक चौथाई।’’
‘‘यह तो बहुत कम है।’’ 
‘‘कम बिलकुल नहीं, ज्यादा है.. इसलिए कि सबसे पहले मैंने ही इस माल पर हाथ डाला था।’’ 
‘‘ठीक है, लेकिन यहां तक इस कमरतोड़ बोझ को उठा के लाया कौन है?’’  
‘‘अच्छा, आधे-आधे पर राजी होते हो?’’  
‘‘ठीक है .. खोलो संदूक।’’

संदूक खोला गया तो उसमें से एक आदमी बाहर निकला। उसके हाथ में तलवार थी -उसने दोनों हिस्सेदारों को चार हिस्सों में तकसीम कर दिया।  
(तकसीम : बंटवारा)

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