Posted by: Bagewafa | ستمبر 29, 2011

धज्जियां ऊडवाई गई –मुहम्मदअली वफा دَھجّیاں اُڈوائ گئی — محمدعلي وفا

دَھجّیاں اُڑوائ گئی — محمدعلي وفا

 

داستان غم جو تھی، پھرسے دہرائی گئی

پھر ہماری ہی گلی میں آگ لگوائ گئی

 

گھیرا گیا بے دردي سے پھر ہمارے گاؤں کو

ایک ایک پتُھر اينٹ كي دَھجّیاں اُڑوائ گئی

  

كون کہتا؟ کیا وہ کہتا؟ سب تھے سكتے میں وہاں

کیا بتائیں؟ ہرطرف اُنکی روسوائ ہوئی

 

 خوب چيكھا، خوب چلاّیا غریب مظلوم تو

 واولہ تھا ایک عجیب، نا کوئی سنوائ ہوئی

  

 جلتے ہوئے گھرسے نکالا، اور ڈالا جیل میں

مظلوم كي اس ملك میں خوب پذيرائ ہوئی

धज्जियां ऊडवाई गई –मुहम्मदअली वफा

दास्ताने गम जो थी, वो फिरसेदोहराई गई
फिर हमारी ही गली में ये आग लगवाई गई

घेरा गया बे दर्दीसेफिरसे हमारे गांव को
एक एक पत्थर ईंटकी धज्जियां ऊडवाई गई

कोन कहता?क्या वो कहता? सब थे सकतेमे यहां
क्या बताएं? हर तरफसे उनकी रूस्वाई हुई

खूब चींखा,खूब चिल्लाया गरीब मज़लूम तो
वावला था एक अजीब, ना कोई सुनवाईहुई

जलते हुए घरसे निकाला , और डाला जेलमें
मज्लूमकी इस मुल्कमें खूब पझीराई हुई

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