Posted by: Bagewafa | اکتوبر 21, 2011

कहानी:दुआ–यासीन अहमद

दुआ–यासीन अहमद

 

आज की रात सामूहिक दुआ का आयोजन किया गया था
जैसे ही शाम का हलका अंधेरा रात के अंधेरे में खो गया हुआ, विभिन्न औरतें एक के बाद एक इस हॉल में जमा होने लगफ़े थीं को आसपास और ाकनाफ के घरों में रहती थीं. बहुत ही चुप्पी से अपने अपने घरों से निकलकर छिपती छिपाती वहां पहुंच रही थीं. बहुत सहमी सहमी सी किसी भी आत्मा शरीर बगैर-, हालांकि वे जीवित थीं. लेकिन हयात की ताज़गी और ऊर्ज़ा से वंचित हो चुकी थीं. अपनी सिसकती रुहों पर ग़मों का अंबार लिए भीगी भीगी पलकों और थके थके क़दमों से इमारत एक छोटे से हॉल में प्रवेश कर रही थीं जो शायद बम बारी के कारण तबाह व ताराज हो चुकी थी. लेकिन खाल का दम खुम अब पूरी तरह टूटा नहीं था. अलबत्ता बारूद और धुएं की गंध किसी ख़बीस आत्मा की तरह चारों ओर मंडरा रही थी.
कभी वह इमारत किसी ज़ी रूप आदमी स्वामित्व थी. लेकिन अब इस दुनिया में नहीं रहा था. हफ्तों पहले अच्छा खाडा घर से निकला था लेकिन ासटरैचर पर रख कर कुछ आदमी उसे घर लाए तो उसकी पहचान मुश्किल हो गई थी. इस पत्नी जीवित दर गोर हो गई थी. उसने मुश्किल से जीवन की पच्चीस छब्बीस मंज़िलें तय की थी लेकिन दिलदोज़ दुर्घटना ने उस पर समयपूर्व बुढ़ापे तारी कर दिया था और वह अपनी वास्तविक उम्र से पंद्ररह बीस साल बड़ी मालूम होने लगी थी . लेकिन पहाड़ जैसा दिल लाई थी इसलिये अपने सीने पर सब्र की सिल रखकर दूसरों के ग़मों में शरीक होती फिर रही थी. शायद इस तरह भी घाव मनदमल किये जाते हैं.
इसी विधवा ने सामूहिक दुआ का आयोजन किया था, वह खुद सबसे पहले हाल में प्रवेश हुई थी. उसका कद दराज था और शरीर भरा भरा, चेहरा किताबी और बाल काले घने. लेकिन उस समय इतने सुंदर बाल उलझे उलझे और बेतरतीब थे . वह जवान ज़ुल्फ़ों की छाउं में दफ़िना ढूँढा करता था, उनके जीवित नहीं रहा तो किसके लिए बनाओ सिंगार करती!!
दरअसल क़यामत केवल पर नहीं टूटी थी. सारा शहर जल रहा था. बस्तियां जल रही थीं. हर दिन औरतें विधवा हो रही थीं. माउं की गोद उजड़ रही थी., बूढ़े बाप और जवान बहनें बे यार व मददगार हो रही थीं. यूँ भी वह शहर बड़ा बदनसीब था कि पहले दिन से ही यहाँ की ज़मीन खून में नहाते रही थी. और आज भी वही हो रहा था. मानव लहू पानी की तरह बह रहा था हालाँ कि यहां की ज़मीन तरल सोना उगलता थी. और किसी घर में भी धन की कमी नहीं थी. लेकिन बद नसीब उनका पीछा नहीं छोड़ती थी. हर चेहरा आपके परेशान और हर घर में आंसुओं की बरखा जारी थी.
यह सब कुछ इस शैतान के कारण हो रहा था जो बुराई की धुरी था. जो ज़बरदस्ती उनके घरों में घुस आया था. आतंकवाद के नाम पर हर रोज मासूम इंसान कट रहे थे. जुल्मो बलात्कार का सिलसिला महीनों से जारी था और उसके खत्म होने के कोई आचार नज़र नहीं आ रहे थे.
लेकिन आज एक हल्की सी उम्मीद की किरण उभर आई थी. क्योंकि इन लोगों ने सुना था कि वह अपने जीवन की अंतिम साँसें ले रहा है. वह चाहते थे कि ज़ुल्म व सितम का अध्याय हमेशा के लिए खत्म हो जाए और उसका फिर जन्म न हो.
इस सामूहिक दुआ का उद्देश्य यही था कि सब मिलकरअल्ल्लह तआला की बारगाह में गिड़गड़ाएँ और उसके समाप्त के लिए दुआएं करें. अब उनके लिए दुआ ही सबसे बड़ा हथियार था. प्रत्येक महिला साये की तरह चलकर हॉल में प्रवेश हो रही थी. रात प्राथमिक सातें थीं. बाहर गहरी अंधकार चारों ओर छाने लगी थी. और अंदर हॉल में रोशनी थी. लेकिन कम कम इतनी कि एक दूसरे के चेहरे को पहचान सकें.
इस विधवा के बाद जो दूसरी महिला हॉल में प्रवेश किया वह बहुत कम उम्र थी. इसके मुरझाएٔ हुए चेहरे से शादाबी गायब हो चुकी थी. बड़े काला आँखों में ाज्यत ने स्थायी डेरा जमा लिया था. उसने अपने पति ही नहीं सात आठ साल के एक दुधपीता बच्चा भी हमेशा के लिए खो दिया था. हालांकि इस दुधपीते को जमीनके हवाले किये तीन सप्ताह हो चुके थे लेकिन इसके अस्तित्व से ममता की लक्षण अलग होने न पाए थे. अब भी एक चादर में छिपे हुए उसके शरीर का ऊपरी हिस्सा गीला हो रहा था.
हाल में दाखिल होते ही इमारत की मालकिन को देखकर वह बेसाखतह सिसक पड़ी. इमारत की मालकिन ने उसके स्नेह से उसके कंधे पर हाथ रखा. "मैं तुम्हारा दुख समझती हूँ. ख़ुदा तुम्हें सब्र जमील प्रदान करे.

‘मेरा बच्चा तो दूध पीता था. वह सिसकियों के बीच बोली. उसकी किस्मत का दूध …’ वह खामोश हो गई और उसने अपने शरीर से चादर हटा दी. जो दृश्य इमारत की मालकिन ने देखा वह ना योग्य बयान था. उसके सारे शरीर में झरझरी सी दौड़ गई. उसने तुरन्त जवान विधवा की चादर बराबर कर दी.
हाल में प्रवेश करने वाली तीसरी महिला बहुत वृद्ध थी. वह बहुत मुश्किल से वहां तक ​​चलती हुई आई थी कि इस सामूहिक दुआ में शामिल हो सके. इसके लिए जीवन एक बोझ के सिवा कुछ न थी. क्योंकि उसका एकमात्र सहारा छीना जा चुका था. और अब बाकी जीवन का एक एक पल गुजारना मुश्किल था. जितनी महिलाएं वहां आ रही थीं, वे सब के सब हालात का शिकार थगें. उनकी त्रासद कहानियाँ कलेजा चीर कर रख देती थीं.
आधे घंटे के भीतर निर्माण छोटा सा हाल खुचा खिच्च भर गया. सबसे खामोश थी, ग़म पड़ थीं और डर भी कि पता नहीं कब किस क्षण में कोई क़यामत उन पर टूट पड़े.
एक औरत मने कहा. रात गहरी होने से पहले हमें अपनी दुआ पूरा कर लेनी चाहिए ताकि जल्द सेजलद अपने घरों को लौट जाएं.
इमारत की मालकिन उठ खड़ी हुई.
"हां मैं भी यही चाहती हूँ. अब किसी और का इंतज़ार नहीं करना चाहिए ‘
और फिर कुछ समय वह रिकी और बोली. यह हमारी बद नसीबी है कि शैतान हमारे देश में, हमारे शहर में और हमारे घरों में दाख़िल होकर हम पर सितम धा रहा है. हर दिन हमारा सुहाग और हमारी औलाद मौत के घाट उतारा जा रहा है. हमारे घर जल रहे हैं, आइए हम सब मिलकर दुआ करें कि इसका दूसरा जन्म न हो और वह हमेशा के लिए नट जाए. प्रार्थना में बड़ी तासीर होती है. दुआओं से तकदीरें बदल जाती हैं. सम्भव है कि हमारी भी तक़दीर बदल जाए.
‘बेशक बेशक ….’ सब महिलाओं ने धीमी आवाज़ में एक जबान होकर कहा और अपनी अपनी जगह से उठने लगीं. उन्होंने अपने सरों पर चादरों को फैलाया और दुआ के लिए हाथ बुलंद किये.
ए खुदा..!’
अचानक उनकी आवाज़ गले में फंस गई. आगे वह कुछ न कह सकें क्योंकि ठीक उसी क्षण एक जोरदार आवाज के साथ हाल का दरवाजा खुला था और एक युवा महिला बदहवास सी हालत में अंदर आई. उसकी सांस फूल रही थी लगता था कि वह बहुत दूर से दौड़ती हुई आई है. हॉल में खड़ी महिलाओं की उसकी ओर घूम गई. इस महिला ने वहीं खड़े खड़े हांफता हुई आवाज़ में कहा. गजब हो गया …. अभी अभी मैंने टीवी पर देखा है कि वह शैतान और जन्म लेने में सफल हो गया है ….’
इस हाँफती हुई औरत की आवाज़ इन सब पर बमों की तरह फटी और दुआ के लिए उठे हुए हाथ अचानक यूँ गिर गये जैसे अपंग हो गये हों …

 Courtesy:

 http://samt.ifastnet.com/July06/Special/Index.html

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