Posted by: Bagewafa | نومبر 26, 2011

परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं — दुष्यंत कुमार پرِنْدے اب بھی پر تولے ہوءے ہَیں—- دُشْینت کُمار

 

پرِنْدے اب بھی پر تولے ہوءے ہَیں—- دُشْینت کُمار

  

پرِنْدے اب بھی پر تولے ہوۓ ہَیں

 ہوا میں سنسنی گھولے ہوۓ ہَیں

 

 تُمھِیں کمزور پڑتے جا رہے ہو

تُمہارے خْواب تو شولے ہوۓ ہَیں

 

  غضب ہَے سچ کو سچ کہتے نہِیں وہ

 قُرانو—ُا‌‍‌پنِشدْ کھولےہوۓ ہَیں

 

  مزاروں سے دُُعائین مانگتے ہو

عقِیدے کِس قدر پولے ہوۓ ہَیں

  

ہمارے ہاتھ تو کاٹے گۓ تھے

 ہمارے پاؤں بھی چھولےہوۓ ہَیں

 

کبھی کِشْتی، کبھی بتخ، کبھی جل

 سِیاست کے کءی چولےہوۓ ہَیں

 

 ہمارا قد سِمٹ کر مِٹ گیا ہَے

ہمارے پَیرہن جھولےہوۓ ہَیں

  

چڑھاتا پھِر رہا ہُوں جو چڑھاوے

 تُمہارے نام پر بولے ہوۓ ہَیں

  

परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं — दुष्यंत कुमार

परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं
हवा में सनसनी घोले हुए हैं

तुम्हीं कमज़ोर पड़ते जा रहे हो
तुम्हारे ख़्वाब तो शोले हुए हैं

ग़ज़ब है सच को सच कहते नहीं वो
क़ुरान—ओ—उपनिषद् खोले हुए हैं

मज़ारों से दुआएँ माँगते हो
अक़ीदे किस क़दर पोले हुए हैं

हमारे हाथ तो काटे गए थे
हमारे पाँव भी छोले हुए हैं

कभी किश्ती, कभी बतख़, कभी जल
सियासत के कई चोले हुए हैं

हमारा क़द सिमट कर मिट गया है
हमारे पैरहन झोले हुए हैं

चढ़ाता फिर रहा हूँ जो चढ़ावे
तुम्हारे नाम पर बोले हुए हैं

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Responses

  1. بہت خوب صورت بلاگ ہے جی آپ کا


زمرے

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