Posted by: Bagewafa | نومبر 29, 2011

नज़्में जिन्होंने जंग-ए-आज़ादी का जज़्बा जगाया— शकील अख़्तर

नज़्में जिन्होंने जंग-ए-आज़ादी का जज़्बा जगाया— शकील अख़्तर

आज़ादी के संघर्ष में हिन्दुस्तानी ज़बान में लिखी गई नज़्मों, ग़ज़लों के योगदान की चर्चा कर रहे हैं शकील अख़्तर। नवप्रभात ग्वालियर से पत्रकारिता की शुरूआत करने वाले शकील ने इंदौर में नई दुनिया, चौथा संसार, फ्रीप्रेस जनरल, दैनिक भास्कर में विभिन्न पदों पर ज़िम्मेदारियों का निर्वहन किया है.

ज़ाद हिन्दुस्तान में ज़ुबान को लेकर होने वाली सियासत पर बड़ा अफ़सोस होता है। ख़ासकर उस ज़ुबान को लेकर जिसने जंग-ए-आज़ादी में अहम रोल अदा किया और बिखरे हुए हिन्दुस्तान को एक प्लेटफ़ॉर्म पर लाने, उसे एकसूत्र में पिरोने में बड़ी मदद की। हां, ये बात उर्दू की है, जिसके बारे में तमाम ग़लतफ़हमियां हैं, शिकायत हैं, यहां तक कि झगड़ा हिन्दी बनाम उर्दू का खड़ा कर दिया गया है। परतंत्र भारत में कई उर्दू अख़बार, रिसाले थे जो देश की आज़ादी के लिए सर पर कफ़न बांधकर काम कर रहे थे। हिन्दी की अन्य भाषाओं की तरह यहां भी एक जज़्बा था- आज़ादी, सरफ़रोशी की तमन्ना। 

उस दौर में क़लम से जेहाद करने वाले कितने शायर थे जिन्हें जेल जाना पड़ा, जिन पर अत्याचार हुए और जिनके इंक़लाबी तराने और नज़्में तक ज़प्त कर ली गईं। ये क़ौमी खिदमत का ज़खीरा आज़ादी के बाद भी नेपथ्य में रहा और इक्का-दुक्का प्रयासों के अलावा आम जनता के सामने न के बराबर आ सका। अब सिमटती तहज़ीब, भाषा, सियासत और आज़ाद नई पीढ़ी के बीच तो यह और भी मुश्किल है। मगर तब जज़्ब-ए-हुर्रियत यानी आज़ादी, स्वतंत्रता के लिए इन ग़ज़लों, गीतों और नज़्मों ने लोगों में ज़बर्दस्त जज़्बा पैदा किया था, क्रांति की नई लहर पैदा की थी। लोग फिरंगियों के ख़िलाफ़ मरने-मिटने को तैयार हो गए थे। इस बात की तस्दीक के लिए चलिए हम शुरूआत करते हैं रामप्रसाद बिस्मिल के उस तराने से जिसे मादर-ए-वतन के लिए हम आज भी उसी भावना से गुनगुनाते हैं। 

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना ज़ोर कितना बाज़ुए क़ातिल में है

वक़्त आने पर बता देंगे तुझे ए आसमां

हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है

ऐ शहीदे मुल्क़ों मिल्लत तेरे जज़्बे के निसार

तेरी कुरबानी का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है

अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है 

रामप्रसाद बिस्मिल के इस तराने ने तब वतन परस्ती की ज़ोर-आज़माइश में नई जान पैदा कर दी थी। तूफ़ान इतना उठा था कि अंग्रेज़ सरकार ने आख़िरकार इस गीत पर प्रतिबंध लगा दिया था। पर क़ौमी तराने की यह बुलंद आवाज़ दबी नहीं बल्कि करोड़ो वलवले इसमें आ मिले और आज़ादी की जुस्तजू बढ़ती चली गई। दरअसल, 1921 से 1935 तक का यह दौर हिन्दुस्तानी सियासी तारीख़ का बड़ा विप्लवग्रस्त दौर था। माले गांव नासिक में सुलेमान शाह, मधु फरीदन, मुहम्मद शाबान और असरील अल्लाहरखा को यरवदा जेल में फांसी की सज़ा दे दी गई। जिस पर पूरे देश में तूफ़ान खड़ा हुआ था। फिर 1925 में काकोरी केस चला। आठ अगस्त 1925 को शाहजहांपुर में क्रांतिकारियों का एक जलसा हुआ जिसकी अध्यक्षता रामप्रसाद बिस्मिल ने की। इसमें इंकलाब के लिए पैसा हासिल करने के लिए खज़ाना ले जाने वाली ट्रेन को लूटने का फ़ैसला किया गया था। यह काम अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां के ज़िम्मे आया और काकोरी मेल को लूट लिया गया। अशफ़ाक उल्लाह ख़ां और रामप्रसाद बिस्मिल को ग़िरफ़्तार कर लिया गया और फांसी दे दी गई। अशफ़ाक़ एक अच्छे शायर भी थे, उन्हें फ़ैज़ाबाद की जेल में फांसी दी गई थी। उन्होंने लिखा है- 

वह गुलशान जो की आबाद था गुज़रे ज़माने में

मैं शाखे खुश्क हूं हां उजड़े गुलिस्तां का 

इसी नज़्म की अगली पंक्तियों में उन्होंने बड़ी दूरंदेशी से लिखा है-

 यह झगड़े ये बखेड़े मेटकर आपस में मिल जाओ

आपसकी तफ़रीक है तुममें यह हिंदू और मुसलमां का 

पर तोप के मुहानों से बांधती ज़ालिम फिरंगी सरकार कहां मानती थी, वे आज़ादी तक फूट डालों और राज करो की नीति पर चलती रही और आख़िरकार वो दिन भी आया जब हिन्दी है हम वतन है वाला इक़बाल का हिन्दुस्तान दो टुकड़ो में बंट गया। दरार ऐसी पड़ी कि सदियां सिहर गईं। लेकिन ढाई सौ साल से ज़्यादा पैरों में में पड़ी ग़ुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ने के लिए मरते-मरते अशफ़ाक़ ने यही कहा- 

वतन है हमारा है शादकाम और आज़ाद

हमारा क्या है अगर हम रहें न रहें 

हिन्दुस्तान की रवायत में मिली-जुली संस्कृति का सिलसिला सैकड़ों सालों से चलता आया था। ख़ासकर सूफ़ियों के ज़माने में यह हिन्दुस्तानी तहज़ीब तुर्की, अरबी और फ़ारसी शब्दों की मिलावट से जन्मी। खुसरो ज़माने में इस मिलावटी बोली को रेख्ता कहा गया। धीरे-धीरे एक नई हिन्दुस्तानी ज़ुबान हिंदवी बनी जो बाद में उर्दू कहलाई। सांस्कृतिक मेल-जोल गहरा हुआ तो उर्दू अदब में भी हिन्दुस्तानीयत हर स्तर पर झलकने लगी। सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक चित्र उजागर होने लगे, मशहूर शायर मीर तकी मीर ने लिखा है- 

दिल की बरबादी का क्या मज़्कूर है

यह नगर सौ मरतबा लूटा गया 

यहां दिल लफ़्ज़ दिल्ली का पर्यायवाची बना जो कितनी बार उजड़ी, टूटी और बनी। यह सिलसिला ज़्यादा से ज़्यादा सियासी आंदोलनों से जुड़ा रहा। यहां तक कि जंग-ए-आज़ादी का तराना बन गई डॉक्टर अल्लामा इक़बाल की नज़्म ‘सारे जहां से अच्छा..’ आज़ादी की घोषणा के समारोह में ‘जन-गण-मन’ के साथ गाई गई। उनका शेर आज भी मौजूं है- 

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जहां हमारा 

लेकिन जो नग़में और तराने आज आसान लगते हैं, जंग-ए-आज़ादी के दौर में उनका लिखना, छपना और बुलंदी से गाया जाना हंसी-मज़ाक का खेल नहीं था। हैरत होती है ये जानकर कि सारी पाबंदियों के बावजूद देशधर्म की खातिर रचनाकार कैसे न कैसे अपनी बात जनता तक पहुंचा देते थे। कितनी ऐसी ग़ज़लें, नज़्में और शेर हैं जो तब गुप्त रूप से छपते थे और बांटे जाते थे। उनके लिखने वालों का नाम पता तक आज नामालूम है। मगर उन दिनों वे हंगामा बरपा जाते थे। 

बांध ले बिस्तर फिरंगी, राज अब जाने को है

जुल्म काफ़ी कर चुके, पब्लिक बिगड़ जाने को है 

ऐसे मौक़े भी आए जब रचनाकारों को मगर के मुंह में रहकर भी अपनी बात लोगों तक पहुंचानी पड़ी। शायर अकबर इलाहाबादी का एक क़िस्सा काफ़ी मशहूर है। वे अंग्रेज़ हुक़ूमत के मुलाज़िम थे, पर उन्हीं की ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ हुए। उनकी तीन नज़्में जलवा-ए-देहली दरबार में कही गईं। यह 1901 ई. में एडवर्ड सप्तम के जश्ने ताजपोशी का वक़्त था जिसमें ड्यूक ऑफ़ कनाट भी शामिल थे। एक नज़्म में अकबर ने तंज किया– 

महफ़िल उनकी, साक़ी उनका आंखे मेरी, बाक़ी उनका

आज़ादी के आंदोलन को गति देने में कॉग्रेसियों का नेतृत्व अहम था। दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, अरविंद गोखले और बदरूद्दीन तैयबजी नरम दल का तो गरम दल का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्रपाल और अरविंद घोष कर रहे थे। 1906 में कोलकाता अधिवेशन में स्वराज की मांग की गई। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित हुआ था। इस दौर में अनेक राष्ट्रीय नज़्में रची गईं। लिखने वालों को अंग्रेज़ी सरकार की प्रताड़ना और अत्याचारों से गुज़रना पड़ा। लेकिन क़लम के जेहाद का सिलसिला जारी रहा। गरम दल से ताल्लुक रखने वाले हसरत मोहानी ने लिखा है- 

अय हिन्दी-ए-सादा दिल ख़बरदारहरगिज़ न चले तुझपे यह जादू

इसी दौर में ब्रजनारायण चकबस्त, जफ़र अली ख़ां, त्रिलोक चंद महरूम, बर्क़ दहेलवी की शायरी हमारे संग्राम की बहुमूल्य संपत्ति है। उदाहरण के लिए ब्रजनारायण चकबस्त की ये रचना काबिले-ग़ौर है- 

हम खाके हिन्द से पैदा जोश के आसार

हिमालिया से उठे जैसे अब्रे-दरियावार

लहू रग़ों में दिखाता है बर्क़ की रफ़्तार

हुई है खाक के परदे में हडिड्या

बेदारज़मीं से अर्श तलक शोर होमरूल का है

शबाब क़ौम का है ज़ोर होमरूल का है

यहां राष्ट्रीय भावना और धार्मिक मामलों में सुधार के समर्थक सर सैयद अहमद ख़ां के एक कथन का ज़िक्र ज़रूरी है। 26 जनवरी 1882 को अमृतसर की अंजुमने इस्लामिया में तकरीर करते हुए उन्होंने कहा था- क़ौम से मेरा मतलब सिर्फ़ मुसलमानों से नहीं है बल्कि़ हिन्दू और मुसलमानों दोनों से है.. हिन्दुओं के अपमान से मुसलमानों का और मुसलमानों के अपमान से हिन्दुओं का अपमान है। इन हालात में जब तक दोनों भाई एक साथ परवरिश ना पा सकें, एक साथ शिक्षा ना पा सकें, एक ही प्रकार के उन्नति के साथ दोनों को उपलब्ध ना हो तो हमारी इज़्ज़त नहीं हो सकती। 

1914 में इंग्लैंड और जर्मनी में जंग छिड़ गई। उस वक़्त हिन्दुस्तान ने अंग्रेज़ों का साथ दिया। लेकिन शिबली नोमानी ने तब भी फिरंगियों पर वार किया था। उनकी नज़्म ‘जंगे यूरोप और हिन्दुस्तानी’ पर वारंट जारी कर दिया गया था। बरतानवी हुक़ूमत उनकी दुश्मन बन गई। शिबली ने लिखा था- 

इक जर्मनी ने मुझसे कहा अजरहे गुरूर

आसां नहीं है फ़तह तो दुश्वार भी नहीं

बरतानिया की फ़ौज है दस लाख से भी कम

और इस पे लुत्फ़ यह कि तैयार भी नहीं

बाक़ी रहा फ़्रांस तो वह रिन्दे लमयजलहम

लोग अहले-हिन्द हैं जर्मन से दस गुने

तुझको तमीज़े अन्दरक-ओ-बिसियार भी नहीं

सुनता रहा वो ग़ौर से मेरा कलाम और

फिर कहा जो लायके-इज़हार भी नहीं

इस सादगी पे कौन न मर जाए अय ख़ुदा

लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं 

(अजरहे गुरूर: घमंड से, रिन्दे लमयजल: अनश्वर, शराबी, अहलेहिन्द: भारतवासी, अन्दरबिसियार: कम और ज़्यादा, लायकेइज़हार: बताने योग्य) 

ख़ुद इख़्तियारी का ऐलान (1915), होमरूल आंदोलन (1916), मांटेग्यू सुधार (1917), रोलेट एक्ट (1918) जैसे मुद्दों पर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ देशभर में आवाज़ उठी। इससे शायर भी अछूते नहीं रहे। महात्मा गांधी की लीडरशिप में आंदोलन आगे बढ़ा और हिन्दू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर आज़ादी की जंग लड़ते रहे। 1919 में जालियां वाला बाग की दुखद घटने ने देशवासियों को झकझोर दिया। सैकड़ों लोग निहत्थे शहीद हो गए। फिरंगियों की इस क्रूरता के ख़िलाफ़ उर्दू में कई नज़्में लिखी गईं। उर्दू के मशहूर शायर त्रिलोकचंद महरूम ने लिखा है-

बदले तूने यह लिए भला किस दिन के

ज़िबह कर डाले हैं मुर्ग़ाने चमन गिन गिन के

(मुर्ग़ाने चमन- उपवन के पक्षी)

इसका गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं

नज़्में जिन्होंने जंगआज़ादी का जज़्बा जगाया

समें शक नहीं जालियांवाला बाग की दर्दनाक घटना ने आग में घी का काम किया और शायरों के ख़ून को खौला दिया। अब शायरों की आतिशनवाइयों ने जनता को उद्वेलित करने का काम शुरू किया। यही वह दौर भी था जब ख़िलावत और असहयोग आंदोलन ज़ोर पकड़ चुका था। गांधी देश के दौरे पर थे। इसी दौर में 1920 में मौलाना मुहम्मद अली ने लाहौर में तकरीर दी। इन्हीं दिनों मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के विचार, सुबेदारी, आख़री मंज़िल और हमारा फ़र्ज़ में प्रकाशित हुए। इन्हीं दिनों शायर जफ़र अली ख़ां ने लिखा एलान-ए-जंग-

गांधी जी जंग का एलान कर दिया

बातिल से हक़ को दस्त-ओ-गरीबान कर दिया

हिन्दुस्तान में इक नयी रूह फूंककर

आज़ादी-ए-हयात का सामान कर दिया

शेख और बिरहमन में बढ़ाया इत्तिहाद

गोया उन्हें दो कालिब-ओ-यकजान कर दिया

जुल्मो-सितम की नाव डुबोने के वास्ते

कतरे को आंखों-आंखों में तूफ़ान कर दिया

(बातिलःझूठ, दस्त-ओ-गिरेबानः लड़ा देना, इत्तिहादः एकता)

लाला लालचंद, हसरत मोहानी, मीर ग़ुलाम नैरंग, मुहम्मद अली जौहर, आगा हश्र कश्मीरी, अहमद सुहैल, सागर निज़ामी, अहसान दानिश जैसे कई शायरों ने इस दौर में फिरंगी शासन के अत्याचारों के ख़िलाफ़ अनेक नज़्में कहीं। इस दौर की चंद नज़्मों पर ग़ौर करें-

तेरी बरबादियां देखी नहीं जाती है अब हमसे

ख़ुदा के वास्ते उठ और हो आज़ाद इस ग़म से

ग़ुलामी मुस्तकिल लानत है और तौहीने-इंसा हैं

ग़ुलामी से रिहा हो और आज़ादी में शिरकत है

1928 में सायमन कमीशन पर हंगामा उठा। यही वह समय भी था जब गांधीजी से लेकर पंडित जवाहर लाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस संपूर्ण आज़ादी की मांग करना शुरू कर चुके थे। उधर सायमन कमीशन पर नज़्मों में ग़ुस्सा बरसने लगा था।

सायमन साहब के इस्तकबाल का वक़्त आ गया

जाग अय लाहौर अपने फ़र्ज़ को पहचान कर

रेल से उतरें तो काली झंडिया हों सामने

जिनके अंदर तुम खड़े हो सीना तानकर

संपूर्ण आज़ादी की मांग ने ज़ोर पकड़ा और 1930 में कॉग्रेस ने इसका एलान कर दिया। फिर सिविल नाफ़रमानी का जेल भरो आंदोलन शुरू हुआ। कई शहीद हुए और गोली से उड़ा दिए गए। आंदोलन चलता रहा। तीसरी गोलमेज कॉफ़्रेंस के बाद निकले श्वेत पत्र के बाद गांधी जी असंतुष्ट थे। इस दौर में भी जोश मलीहाबादी, आनंद नारायण, अली जव्वाद ज़ैदी, हफ़ीज़ जालंधरी जैसे कई शायर सियासी मुद्दों से मुतास्सिर होकर क़लम को ज़ुबान देते रहे। 1942 के विद्रोह के बाद महादेव देसाई की मौत से दुखी होकर ‘क़ैदी की लाश’ जैसी मशहूर नज़्म लिखने वाले अली जव्वाद ज़ैदी की एक और नज़्म ‘मन की भूल’ ज़प्त कर ली गई। यह एक लंबी नज़्म थी जिसमें देश के सुखद अतीत को याद करते हुए परतंत्र भारत की पीढ़ी को बयां किया गया था-

मुल्क़ में इक तूफ़ान बरपा था

जयकारों का शोर मचा था

जेल में हिन्दुस्तान भरा था

था इक वो भी ज़माना प्यारे

जेल में घर तक याद नहीं था

फिर भी दिल कुछ शाद नहीं था

हिन्दुस्तान आज़ाद नहीं था

1935 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। इससे पहले सम्मेलन की 1936 में अध्यक्षता ख़्यात साहित्यकार प्रेमचंद ने की। इस संस्था को आगे बढ़ाने में पण्डित नेहरू से लेकर रवींद्रनाथ ठाकुर, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, युसूफ़ मेहर अली, सज्जाद ज़हीर, डॉक्टर अली, अब्दुल हक़ जैसे दिग्गजों का सहयोग और समर्थन था। इसी दौर में उर्दू साहित्य में फ़ैज अहमद फ़ैज़, अली सरदार ज़ाफ़री, असरारुलहक़ मजाज़, जांनिसार अख़्तर, फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे मशहूर शायर भी देशभक्ति की नज़्में लिख रहे थे। सरदार जाफ़री की नज़्म पर नज़र डालें-

सुलग उठी है इंतिक़ाम की आग

बर्फ़ की चोटियां दहकती हैं

जुल्म और जब्र के अंधेरे में

सैकड़ों बिजलियां चमकती हैं

इंतिक़ाम की धधकी हुई इस आग से पहले और बाद में बार-बार आज़ादी का सुंदर सपना देखा गया। यहां तक कि शायरों ने धक्के खाए, फ़ाकाकशी की फिर भी आग उगलने वाली नज़्में लिखकर बरतानवियों के हत्थे चढ़ते रहे। मुज़फ़्फ़र की ज‍प्तशुदा नज़्मों में एक-

विजय के हार होंगे

नेहरू-गांधी की गरदन में

मुक़द्दस मादरे वतन के सर पर

ताज देखेंगे

मनाएंगे ज़मीने हिन्द पर

हम जश्ने आज़ादी

फ़लक पर से हमें

ख़ुश-ख़ुश तिलक महाराज देखेंगे

सीमाब अकबराबादी, साहिर लुधयानवी, शोरिश कश्मीरी, जोश मलीहाबादी, नदीम कासमी, मसूद अख़्तर जैसे कुछ शायर थे जो आज़ादी के आंदोलन की तर्जुमानी के साथ अपनी क़लम में सामाजिक और आर्थिक हालात को दर्शा रहे थे। इनमें प्रगतिशील और मार्क्सवादी विचारों की नज़्में भी शामिल रहीं। इस दौर में जोश मलीहाबाद की एक नज़्म- ”वफ़ादाराने अजली का पयाम, शहंशाहे हिन्दुस्तान के नाम” बड़ी चर्चित हुई जिसमें उन्होंने जॉर्ज की ताजपोशी पर जमकर प्रहार किया। तंज करती ये नज़्म दरअसली भारत की बदहाली के लिए गहरा आक्रोश थी। 32 बंदों में लिखी गई इस नज़्म में भारत की त्रासद तस्वीर थी। इसके चंद बंद काबिले-ग़ौर हैं-

आपके हिन्दोस्तां के जिस्म पर बोटी नहीं

तन पे इक धज्जी नहीं, पेट में रोटी नहीं

किश्वरे-हिन्दोस्तां में रात को हंगामे-ख़्वाब

करवटें रह रह के लेता है फ़ंज़ा में इंक़िलाब

जोश की यह नज़्म तो ठीक है मगर उनकी नज़्म ”ईस्ट इंडिया कंपनी के फ़रजंदों के नाम” ने तो जैसे अंग्रेज़ी हुक़ूमत की नींद ही उड़ा दी। जोश ने यह नज़्म 1939 मे दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वायसराय की हिन्दुस्तान के जंग में शामिल होने की घोषणा के बाद लिखी गई थी। यह नज़्म हर भारतीय की भावना का प्रतिबिंब थी। इस पर भी फिरंगी हुक़ूमत का कहर बरपा और इस नज़्म को ज़प्त कर लिया गया-

जुल्म भूले, रागिनी इंसाफ़ की गाने लगे

लग गई है आग क्या घर में कि चिल्लाने लगे

इक कहानी वक़्त लिखेगा नये मज़मून की

जिसकी सुखी को ज़रूरत है तुम्हारे ख़ून की

इंक़लाबी गीतों के बढ़ते हुए ख़तरों के मद्देनज़र आखिरकार अंग्रेज़ हुक़ूमत ने इस वक़्त तहरीर (लेखन) और तकरीर (संभाषण) दोनों पर कड़ी पाबंदी लगा दी थी। एक बार फिर आंदोलन उग्र हुआ, बड़े नेता ग़िरफ़्तार हुए, जेलें भरती चली गईं लेकिन नज़्में छपती चली गईं। मजाज़ ने अपनी नज़्म ”अंधेरी रात के मुसाफ़िर” में लिखा-

उफ़क पर जंगा का ख़ूनी सितारा जगमगाता है

हर इक झोंका हवा का, मौत का पैग़ाम लाता है

मजाज़ की नज़्म ”आवारा” की इन पंक्तियों पर ग़ौर फ़रमाएं –

मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने

सैकडों चंगेज़ो नादिर हैं नज़र के सामने

सैकडों सुलतानो जाबिर हैं नज़र के सामने

ऐ ग़म ए दिल क्या करूं,

ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

बढ के इस इन्द्रसभा का साज़ ओ सामां फूंक दूं

इसका गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं

तखते सुलतान क्या मैं सारा क़स्र ए सुलतान फूंक दूं

ऐ ग़म ए दिल क्या करूं,

ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

(मज़ाहिरःदृश्य, सुल्ताने जाबिरः अत्याचारी बादशाह, शबिस्तां: शयनागार, क़स्रे सुल्तान: शाही महल)

सरदार जाफ़री ने इसी बात को बढ़ाकर कुछ इस तरह से बयां किया-

ग़म के सीने में ख़ुशी की आग भरने दो हमें

ख़ूं भरे परचम के नीचे रक्स करने दो हमें

अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। देश के तक़रीबन सभी बड़े नेता सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए थे। जनता सड़कों पर उतर आई और अंग्रेज़ो से सीधा लोहा लेने लगी। बाग़ी यहां-वहां परचम फहराने लगे। जन-नेताओं को जो दुश्वारियां पेश आईं, उन्हें लेकर भी नज़्में लिखी गईं। महात्मा गांधी की ग़िरफ़्तारी देर रात की गई थी, लिहाज़ा शमीम किरहानी लिखते हैं-

कुछ देर ज़रा सो लेने दो

तुम जेल जिसे ले जाते हो

वह दर्द का मारा है देखो

मज़लूम, अहिंसा का हामी

बेबस दुखियारा है देखो

बेचैन सा उसकी आंखों में

पिछले का सितारा है देखो

कुछ देर ज़रा सो लेने दो

लेकिन इस समय आज़ाद हिन्द फ़ौज बनाकर अंग्रेज़ों के नाकों चने चबवाने वाले वीर क्रांतिकारी सुभाषचंद्र बोस ही एक ऐसे नेता थे जो हुक़ूमत के हाथ नही आ सके थे। इन हालात की सच्ची तस्वीर लेकर आए शायर जांनिसार अख़्तर की नज़्म ”अय हमरिहाने काफ़लाये” पर नज़र डालिए-

क्यों न कर लें आज हम खुद रास्ते का फ़ैसला

हमरहाने काफ़ला अय हमरहाने काफ़ला

रहज़नों के हाथ में हम लुट गए तो क्या हुआ

रास्ते में चंद साथी छूट गए तो क्या हुआ

अब भी वह जुरअते हैं अब भी वही हौसला

हमरहाने काफ़ला अय हमरहाने काफ़ला

आंदोलन बढ़ता रहा और क़लम तलवार बनी। जज़्बे आज़ादी के शोले अब आज़ादी की पहली किरण की बाट जोह रहे थे। मगर हालात को इस सुबह के पहले भी कुछ और मंजूर था। वह बंटवारा जिसकी मांग मुस्लिम लीग ज़ोर दे रही थी। शमीम किरहानी ने पाकिस्तान चाहने वालों के लिए एक दरख्वास्त करती हुई नज़्म लिखी पर कोई तज़वीज़ काम न आई। 1946 से बग़ावत और तेज़ हुई। 1947 में आज़ादी देने की ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली बार की घोषणा हुई। साम्राज्यवादी अंग्रेज़ों ने आखिर समग्र राजनीतिक आंदोलन को दो फाड़ करने में कामयाबी पायी। हिन्दुस्तान के वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने ब्रिटेन का आदेश का पालन किया। रेडक्लिफ़ का चुपचाप भारत आगमन हुआ और सदियों पुराना इंसानी रिश्ता सरहदी टुकड़ों में बंट गया। शमीम ने पूछा-

हमको बतलाओ क्या मतलब है पाकिस्तान का

जिस जगह इस वक़्त मुस्लिम हैं, नाजिस है क्या वह जा

(नाजिस-अपवित्र, जा-स्थान)

आज़ादी की बेड़ियां टूटीं। मख़दूम माहिउद्दीन ने लिखा- कहो हिन्दोस्तां की जय, फ़ैज़ ने कहा- बोल की लब आज़ाद हैं तेरे, ज़बां अब तक तेरी है। फ़िराक़ गोरखपुरी ने तहरीर दी-

हमारे सीने में शोले भड़क रहे हैं फ़िराक़

हमारी सांस से रोशन है नग़्मे-आज़ादी

जश्ने-आज़ादी के मौक़े पर सैकड़ों नज़्में लिखी गईं। इसमें दो सौ साल की ग़ुलामी के निज़ाम से लेकर ख़ुशियों तक की कहानी थी। जांनिसार अख़्तर ने नज़्म लिखी ”जश्ने आज़ादी” –

सीने से आधी रात के

फूटी वह सूरज की किरन

बरसे वह तारों के कंवल

वह रक्स में आया गगन

आये मुबारकबाद को

कितने शहीदाने-वतन

आज़ाद है आज़ाद है आज़ाद है अपना वतन

आज़ाद है अपना वतन

(शोध संदर्भः ज़प्तशुदा नज़्में, हिन्दोस्तां हमारा और अन्य) संकलन- शकील अख़्तर

(सौजन्य: कीबोर्ड का सिपाही)

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