Posted by: Bagewafa | دسمبر 10, 2011

گھر جانا چاہے—عارِف شیخ( بروڈہ घर जाना चाहिये—आरिफ शेख(बरोडा

گھر جانا چاہے—عارِف شیخ

 

 ہر شخس سوچتا ہَے کے گھر جانا چاہے 

اب تو چڑھی ندی کو اُتر جانا چاہے 

 

ٹھنڈی ہوا ہَے اَور ن بارِشکی کوءی بُند 

ایہ بادلوں تُمھیں تو بِکھر جانا چاہے

 

مرہم بھی پاس میں ہَے مسِہا بھی سامنے 

 اب تو ہمارے ذکھْمکو بھر جانا چاہے

  

مطلب پرسْت لوگ یے دیتیں ہَیں مشورہ 

 رُخ ہو ہواکاجِدھر- اُدھر جانا چاہے

 

ہم اُنکا پْیار پانے میں ناکام ہو گےء 

 اب زنْدگی یہ کہتی ہَے مر جانا چاہِی 

 

یلگار ہو رہی ہَے اندھیروں کی جِس طرف  

‘عارِف’ چِراگ لیکے اُدھر جانا چاہِی 

 

घर जाना चाहिये—आरिफ शेख

 

हर शख्स सोचता है कि घर जाना चाहिये

अब तो चढी नदी को उतर जाना चाहिये

 

ठंडी हवा है और न बारिशकी कोई बुंद

अय बादलों तुम्हें तो बिखर जाना चाहिये

 

मरहम भी पास में है मसिहा भी सामने

अब तो हमारे ज़ख्मको भर जाना चाहिये

 

मतलब परस्त लोग ये देतें है मशवरा

रुख हो हवाका जिधर- उधर जाना चाहिये

 

हमारा उनका प्यार पानेमें नाकाम हो गये

अब जिन्दगी ये कहती है मर जाना चाहिये

 

यलगार हो रही है अंधेरों की जिस तरफ

’आरिफ’ चिराग लेके उधर जाना चाहिये


زمرے

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