Posted by: Bagewafa | دسمبر 20, 2011

ऐ इश्क़ कहीं ले चल—-अख्तर शिरानी

ऐ इश्क़ कहीं ले चल—-अख्तर शिरानी

 

ऐ इश्क़ कहीं ले चल, इस पाप की बस्ती से,
नफ़रत-गहे-आलम से, लानत-गहे-हस्ती से,
इन नफ़्स-परस्तों से, इस नफ़्स-परस्ती से,
दूर-और कहीं ले चल,
ऐ इश्क़ कहीं ले चल !

हम प्रेम –पुजारी हैं तू प्रेम-कन्हैया है !
तू प्रेम-कन्हैया है, यह प्रेम की नय्या है,
यह प्रेम की नय्या है, तू इसका खिवैया है,
कुछ फ़िक्र नहीं, ले चल,
ऐ इश्क़ कहीं ले चल !

बे-रहम ज़माने को अब छोड़ रहे हैं हम,
बे-दर्द अ़ज़ीज़ों से मुँह मोड़ रहे हैं हम,
जो आस थी वो भी अब तोड़ रहे हैं हम,
बस ताब नहीं, ले चल,
ऐ इश्क़ कहीं ले चल !

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