Posted by: Bagewafa | دسمبر 20, 2011

मौलाना अबुल कलाम आजाद:आजादी के दीवाने और सांप्रदायिक सद्भाव के सिपाही—-डा. असगर अली इंजीनियर

मौलाना अबुल कलाम आजाद:आजादी के दीवाने और सांप्रदायिक सद्भाव के सिपाही—-डा. असगर अली इंजीनियर

मौलाना अबुल कलाम आजाद एक अनूठी इस्लामिक शख्सियत थे। वे इस्लाम के अनन्य अध्येता, महान देश भक्त और सांप्रदायिक सद्भाव के अथक सिपाही थे। यह खेदजनक है कि देश  के प्रति उनकी सेवाओं को भुला दिया गया है। आज की पीढ़ी के स्कूली व कालेज विद्यार्थियों में से शायद एक प्रतिशत भी उनके या उनकी उपलब्धियों के बारे में कुछ विशेष नहीं जानते होंगे।  

इस पृष्ठभूमि में, शिमला स्थित “इंस्टीट्यूट आफ एडवांस स्टडीज“ की साधारण सभा की हालिया बैठक में संस्थान के अध्यक्ष प्रोफेसर मुंगेकर – जो कि राज्यसभा के सदस्य भी हैं – के इस सुझाव का मैंने स्वागत किया कि अंबेडकर की तरह, मौलाना आजाद पर भी कालेज शिक्षकों के लिए ‘समर स्कूल’ आयोजित किए जाने चाहिए, जिससे शिक्षकों को मौलाना के व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचित करवाया जा सके। सच तो यह है कि मौलाना आजाद के अलावा खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे कई नेताओं पर “समर स्कूलों“ की दरकार है। मौलाना आजाद के बारे में देशवासियों को बताया जाना आवष्यक है। देश  की आजादी  के लिए उनका बलिदान किसी से कम नहीं था। 

नवंबर माह की 11 तारीख को मौलाना आजाद का जन्मदिन पड़ता है और इस साल, भारत सरकार ने मौलाना को उनके जन्मदिन पर याद किया। स्कूलों से कहा गया कि वे मौलाना का जन्मदिन – जो कि शिक्षा दिवस भी कहलाता है – मनाएं। परंतु अधिकांश  शिक्षणिक संस्थाओं में विद्यार्थियों के दीवाली की छुट्टियों के बाद अपने गृह नगरों से न लौटने के कारण यह दिन उतने अच्छे से न मनाया जा सका, जितना कि मनाया जाना था।  

मौलाना के पिता मौलाना खैरूद्दीन कलकत्ता के जाने-माने आलिम थे और उनके शिष्यों की संख्या हजारों में थी। मौलाना खैरूद्दीन ने मक्का की रहने वाली एक अरब महिला से विवाह किया था और मौलाना का जन्म मक्का में हुआ, जहाँ उनके माता-पिता उन दिनों रूके हुए थे। इस तरह, एक अर्थ में, अरबी, मौलाना की मातृभाषा थी और अरबी पर मौलाना का असाधारण अधिकार था। उनका लालन-पालन पारंपरिक इस्लामिक माहौल में हुआ और उनके पिता की इच्छा थी कि वे उनकी ही तरह आलिम बनें। अगर मौलाना ने अपने पिता की बात मान ली होती तो उनके भी हजारों शिष्य होते और वे भी अपने पिता की तरह प्रभावशाली इस्लामिक धार्मिक नेता होते। 

मौलाना, सर सैय्यद अहमद खान के प्रभाव में आ गए और सर सैय्यद के संपूर्ण लेखन को उन्होंने पूरे ध्यान से पढ़ डाला। परंतु वे स्वतंत्र सोच वाले व्यक्ति थे और जल्दी ही उनके सर सैय्यद से मतभेद हो गए।  यद्यपि वे सर सैय्यद के आधुनिक सोच व आधुनिक शिक्षा अपनाने के विचार से सहमत थे तथापि वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि मुसलमानों को अंग्रेज सरकार के प्रति वफादार रहना चाहिए। मौलाना की भारत की आजादी के प्रति संपूर्ण प्रतिबद्धता थी। उन्होंने बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होने का प्रयास भी किया परंतु भूमिगत क्रांतिकारी दलों ने मुस्लिम होने के नाते उन्हें अपने साथ लेने से इंकार कर दिया। 

मौलाना के लिए, देश भक्ति एक इस्लामिक कर्तव्य था। कहा जाता है कि पैगंबर साहब ने फरमाया था कि अपने देश  से प्यार, हमारे ईमान का भाग है और देश  के प्रति प्यार का यह तकाजा था कि देश  को विदेशियों की गुलामी से मुक्त कराया जावे। अतः वे स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। मौलाना आजाद बहुत कम उम्र में काँग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए। वे शायद काँग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष थे। 

गाँधीजी की तरह, मौलाना आजाद की भी यह मान्यता थी कि हिन्दू-मुस्लिम एकता के बगैर, भारत का स्वाधीन होना कठिन है। काँग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में पार्टी का अध्यक्ष चुने जाने के बाद, अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा, “अगर स्वर्ग से कोई देवदूत भी उतर कर मुझसे यह कहे कि अल्लाह ने मेरे लिए भारत की स्वतंत्रता का उपहार भेजा है तब भी मैं उसे तब तक स्वीकार नहीं करूंगा जब तक हिंदुओं और मुसलमानों में एकता स्थापित नहीं हो जाती क्योकि भारत को स्वतंत्रता नहीं मिलने से केवल भारत का नुकसान होगा परंतु यदि हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित नहीं होती तो इससे संपूर्ण मानवता को क्षति पहॅुचेगी“।

ये बहुत गंभीर निहितार्थ वाले शब्द हैं। मौलाना के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता केवल एक नारा नहीं था। वे उसके प्रति गंभीर रूप से प्रतिबद्ध थे और यह प्रतिबद्धता, कुरआन की उनकी गहरी समझ पर आधारित थी। उन्होंने राँची में जेल में रहने के दौरान कुरआन की “तफसीर“ (टीका) लिखी थी। सन् 1920 के दशक  में लिखी गई इस तफसीर ने भारतीय उपमहाद्वीप के तफसीर साहित्य को समृद्ध किया। 

उन्होंने अपनी तफसीर के पहले खंड को “वहदत-ए-दीन“ (धर्मों की एकता) को समर्पित किया है। इस पुस्तक के पहले ख्ंड को उन्हें दो बार लिखना पड़ा क्योंकि उसकी मूल पांडुलिपि को ब्रिटिष पुलिस ने नष्ट कर दिया था। अंततः अपनी राजनैतिक व्यस्तताओं के चलते, वे इस पुस्तक को पूरा न कर सके। उनकी तफसीर से जाहिर होता है कि सभी धर्मों की मूल एकता में उनका दृढ विश्वास था और उन्होंने अपनी असाधारण 

मेधा का इस्तेमाल, इस विचार को पुष्ट करने के लिए किया। उनके लिए विभिन्न धर्मों की एकता, धार्मिक  विश्वास था न कि राजनैतिक नारा या अवसरवाद।

मौलाना महान जननायक थे। वे खिलाफत आंदोलन के पक्के समर्थक थे परंतु कमाल पाशा  के तुर्की में क्रांति के रास्ते खलीफा को अपदस्थ करने और खिलाफत की संस्था को  अनावश्यक करार दे दिए जाने के बाद, मौलाना ने खिलाफत के प्रति अपनी वफादारी को त्यागने में जरा देरी नहीं की। उन्होंने अतातुर्क के आधुनिक सुधारों का स्वागत किया और मुसलमानों को सलाह दी कि वे खिलाफत की संस्था को बचाने का प्रयास छोड़ दें क्योंकि तुर्की नेताओं ने ही उससे किनारा कर लिया था। 

काँग्रेस के सन् 1928 के अधिवेशन में, नेहरू समिति की रपट पर चर्चा के दौरान, मौलाना ने जिन्ना की इस माँग का विरोध किया कि संसद में मुसलमानों को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि प्रजातंत्र में किसी समुदाय को गैर-अनुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा सकता। जहां तक, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का प्रश्न  है उसके लिए संविधान में  विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं, जैसे कि अंततः भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-30 में किए गए। मौलाना एक दूरदृष्टा थे और सस्ती लोकप्रियता की खातिर उन्होंने कुछ नहीं किया।

उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के सन् 1937 में उत्तर प्रदेश  में चुनाव के बाद मुस्लिम लीग को, वायदे के अनुसार, केबिनेट में दो स्थान नहीं देने के निर्णय का भी विरोध किया। नेहरू का कहना था कि चूंकि चुनाव  में लीग की बुरी तरह हार हुई है इसलिए वह मंत्रिमंडल में स्थान पाने के योग्य नहीं है। मौलाना ने नेहरू को पत्र लिखकर यह सलाह दी कि वे लीग द्वारा नामांकित दोनों व्यक्तियों को मंत्री बनाएं क्योंकि ऐसा न करने के दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव होंगे। मौलाना की चेतावनी सही साबित हुई। जिन्ना आगबबूला हो गए और यह कहने लगे कि काँगे्रस सरकार, “हिन्दू सरकार“ है जो मुसलमानों के साथ न्याय नहीं करेगी। 

अगर नेहरू ने मौलाना की सलाह मान ली होती तो शायद देश  का विभाजन रोका जा सकता था। वैसे नेहरू की इस निर्णय के पीछे अलग सोच थी। वे चाहते थे कि मुस्लिम लीग के नेताओं की जगह कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं को सरकार में अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। परंतु मौलाना के विचार अलग थे। किसी भी निर्णय या घटना के दूरगामी प्रभावों को आंकने की मौलाना में अद्भुत क्षमता थी। 

 नेहरू और मौलाना केवल अच्छे दोस्त ही नहीं थे बल्कि वे एक-दूसरे का बहुत सम्मान भी करते थे। नेहरू ने मौलाना की विद्वता और कई भाषाओं पर उनके अधिकार की जमकर प्रशसा की है। मौलाना आजाद सिर्फ इस्लाम ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों का भी गहरा ज्ञान रखते थे। महिला अधिकारों के बारे में उनके विचारों को पढ़कर तो ऐसा लगता है मानो हम 21वीं सदी के किसी व्यक्ति के विचार पढ़ रहे हों। यह सर्वज्ञात है कि मुस्लिम धर्मशास्त्री लैंगिक समानता का समर्थन नहीं करते और चाहते हैं कि महिलाएं घर की चहारदीवारी तक सीमित रहें। मौलाना इसके अपवाद थे। उन्होंने मिस्त्र में अरबी भाषा में प्रकाशित  एक पुस्तक “अल मीरात् अल मुस्लिमां“ अर्थात “वे मुस्लिम महिलाएं जो लैंगिक समानता की हामी हैं“ का अनुवाद किया था।  इस पुस्तक में तत्कालीन मिस्त्र में महिला अधिकारों पर चल रही राष्ट्रव्यापी बहस के प्रमुख मुद्दों को संकलित किया गया था। उन्होंने इस पुस्तक को अनुवाद के लिए इसलिए चुना क्योंकि वे लैंगिक समानता के पक्षधर थे। कुरान की आयत 2.228 के बारे में वे लिखते हैं “यह लैंगिक समानता का, 1300 साल पुराना घोषणापत्र है।

“ 

भारतीय उपमहाद्वीप के केवल दो अन्य धर्मशास्त्री लैंगिक समानता के हामी थे। वे थे मौलाना मुमताज अली खान जो सर सैय्यद अहमद खान के साथी थे और मौलाना उमर अहमद उस्मानी जिनकी हाल में करांची में मौत हुई। दोनों जाने-माने विद्वान थे और लैंगिक समानता के मुद्दे पर वे कोई समझौता करने को तैयार नहीं थे। मौलाना मुमताज अली खान ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक  था “हकूक अल् निस्वान“ (महिलाओं के अधिकार) और मौलाना उमर अहमद उस्मानी ने आठ खंडों में “फिक्-अल्-कुरान“ (कुरान का विधिशास्त्र) लिखा है जिसमें उन्होंने अनेक तर्क देकर यह साबित किया है कि कुरान, लैंगिक समानता की पक्षधर है। 

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने पाकिस्तान के जन्म के बहुत पहले उस घटनाक्रम की भविष्यवाणी की थी जिससे आज का पाकिस्तान गुजर रहा है। मौलाना आजाद का जितना जोर हिन्दू-मुस्लिम एकता पर था उतना ही इस बात पर भी था कि भारत को धार्मिक आधार पर विभाजित नहीं किया जाना चाहिए। जो अपने देश से प्यार करता है वह भला उसे बंटते हुए कैसे देख सकता है? उन्हें यह अच्छी तरह मालूम था कि किसी भी प्रजातंत्र को अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करनी ही पड़ती है और फिर, मुसलमान कोई छोटे-मोटे अल्पसंख्यक नहीं थे। विभाजन के पूर्व वे आबादी का 25 प्रतिशत थे और यदि विभाजन नहीं हुआ होता तो आज वे कुल जनसंख्या का लगभग 33 प्रतिशत होते। 

मौलाना ने स्वतंत्रता के पूर्व कहा था कि आज के मुसलमान यह सोचते हैं कि हिन्दू उनके  दुश्मन  हैं परंतु कल, जब पाकिस्तान बन जाएगा और हिन्दू न होंगे तब मुसलमान ही आपस में क्षेत्रीय, भाषाई और जातीय आधारों पर लड़ाई-झगड़े करेंगे। उन्होंने यह बात साफ-साफ शब्दों में मुस्लिम लीग के एक प्रतिनिधिमंडल से कही थी। आज पाकिस्तान में यही हो रहा है। 

पाकिस्तान में न केवल इस्लाम के अलग-अलग पंथों में विश्वास  करने वालों के बीच खूनी संघर्ष चल रहा है बल्कि वहां धार्मिक कट्टरता में भी तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। निर्दोषों का खून बहना रोजाना की बात हो गई है। सभी धर्मों का इतिहास यह बताता है कि जब भी धर्म और राजनीति का घालमेल होता है तब सत्ता पाना और उसे बचाए रखना, धर्म और धार्मिक मूल्यों से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। सत्ता साध्य बन जाती है और धर्म, साधन। मौलाना इस बात को अच्छी तरह समझते थे इसलिए वे धर्म आधारित राज्य की बजाए धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक राष्ट्र की स्थापना के पक्षधर थे। 

दुर्भाग्यवश , मौलाना की किसी ने नहीं सुनी और वे देश  को बंटने से नहीं रोक सके। शक्तिशाली निहित स्वार्थ, जिनमें शामिल थे उत्तरप्रदेश  और बिहार के बडे़ मुस्लिम जमींदार और मुस्लिम मध्यमवर्ग (जिसे यह डर था कि उसे नौकरियां नहीं मिलेंगी)। और इन लोगों की भरपूर सहायता की अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने जो भारत को एशिया  की महाशक्ति बनते देखना नहीं चाहते थे।

 (लेखक मुंबई स्थित सेंटर फार स्टडी आफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के संयोजक हैं, जाने-माने इस्लामिक विद्वान हैं  और कई दशकों से साम्प्रदायिकता व संकीर्णता के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं।) 

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