Posted by: Bagewafa | دسمبر 20, 2011

پْیار مت کہیے —مُحمّدعلی وفاप्यार मत कहिये—मुहम्मदअली वफा

پْیار مت کہیے —مُحمّدعلی وفا

مُکرا ہُواوعدے سے ہَے، یار مت کہیے 

گرپاںؤمیں چُبھتا نہِین- خار مت کہیے ۔ 

 

ہردم خداکا ساتھ ہَے، جنگل بیانباں ہو 

 ہم چاہے اکیلے ہی سہی لاچار مت کہیے۔ 

 

لد گئ ہَے پھُولونسے گُلاب کی تہنی 

 حاصل تھا یے زندگِی کا بار مت کہیے ۔ 

 

 ہوتا نہ یے تو جلْتی کْیا دل کی قندِیلیں؟ 

 لاوا ہَے یے تو پْیارکا انگار مت کہیے ۔ 

 

مراسِم نِبھانے تھے تو نِبھاتے رہے وفا 

 کچھ بھی کہو اُسکو مگر پْیار مت کہیے ۔ 

प्यार मत कहिये—मुहम्मदअली वफा

मुकरा हुआ वादेसे है, यार मत कहिये
गर पांवमें चुभता नहीं- खार मत कहिये.

हरदम खुदाका साथ है ,जंगल बयांबां हो
हम चाहे अकेले ही सही लाचार मत कहिये.

 

लद गई है फूलोंसे गुलाबकी तहनी
हासिलथा ये जिंदगीका बार मत कहिये.

होता न ये तो जल्ती क्या दिलकी कंदीलें
लावा है ये तो प्यारका अंगार मत कहिये.

मरासिम निभाने थे तो निभाते रहे वफा
कुछ्भी कहो उसको मगर प्यार मत कहिये.

 

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زمرے

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