Posted by: Bagewafa | جنوری 7, 2012

समाज को बेहतर नहीं बनाते सभी जनांदोलन—–राम पुनियानी

05.01.2012

 

समाज को बेहतर नहीं बनाते सभी जनांदोलन—–राम पुनियानी

 

गत वर्ष, पूरी दुनिया के साथ साथ भारत में भी अन्याय के खिलाफ आमजनों के उठ खड़े होने के कई अलग-अलग प्रसंग सामने आए। अरब देशों में वहां के तानाशाह शासकों के खिलाफ आंदोलन उमड़ा। अमेरिका और कई यूरोपीय देशों में “आक्यूपाई वाल स्ट्रीट“ आंदोलन के जरिए जनता ने बढ़ती सामाजिक-आर्थिक विषमताओं के विरूद्ध अपना आक्रोश प्रगट किया। ये विषमताएं उस आर्थिक मॉडल का नतीजा हैं जिसे पश्चिम ने अपनाया है।

इसी अवधि में, भारत में भी कई आंदोलन हुए। सन् 2011, भारत के इतिहास में एक ऐसे वर्ष के रूप में याद किया जाएगा जिसमें आम आदमी ने व्यवस्था के विरूद्ध अपने आक्रोश का खुलकर इजहार किया। तथाकथित विकास के लिए किसानों की जमीनों का अधिग्रहण एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है और इस मसले को लेकर उड़ीसा में पोस्को सहित कई आंदोलन हुए। जैतापुर और कुंडाकूलम में जनांदोलनों ने परमाणु उर्जा से जुड़े खतरों और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की ज़रूरत की ओर देश का ध्यान खींचा। हाल के दिनों में विकास के नाम पर किसानों को उनकी जमीनों से महरूम करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है।

दुर्भाग्यवश, इन सभी जनांदोलनों को मीडिया ने उतनी अहमियत नहीं दी जितनी कि दी जानी चाहिए थी। यही हाल आयरोम शर्मीला के बरसों पुराने अनशन का हुआ। इस अनशन का लक्ष्य कश्मीर व उत्तर-पूर्व में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम की आड़ में किए जा रहे अत्याचारों से देश को अवगत कराना है।

जिस एक आंदोलन ने पूरे देश में भावनाओं का एक ज्वार सा ला दिया वह था अन्ना हजारे का लोकपाल बिल के समर्थन में अनशन। इसके समानांतर, रामदेव ने काले धन के मुद्दे पर आंदोलन किया। अन्ना हजारे का मुख्य एजेन्डा था उनकी टीम के जनलोकपाल बिल को संसद से जस का तस पारित करवाना। अन्ना हजारे का रवैया ऐसा था मानो केवल वे ही भ्रष्टाचार के विरोधी हों और लोकपाल विधेयक के उनके संस्करण का समर्थन नहीं करने वाला हर व्यक्ति भ्रष्टाचार का समर्थक हो। इस आंदोलन को कई अलग-अलग क्षेत्रों से समर्थन मिला जिनमें श्री श्री रविशंकर जैसे लाईफस्टाइल गुरू भी शामिल थे।

अगर हम आज के भारत को वृहद परिपेक्ष्य में देखें तो हमें समझ में आवेगा कि देश की अधिकांश जनता आर्थिक अन्याय, सामाजिक विषमताओं और मुख्यधारा की राजनीति के हाशिए पर खिसका दिए जाने जैसी समस्याओं से जूझ रही है। अन्ना का आंदोलन केवल भ्रष्टाचार को जनता के सभी दुःखों के लिए जिम्मेदार बताता है और अन्य कारकों को नजरअंदाज करता है।

सभी सामाजिक आंदोलनों का एक विशिष्ट चरित्र होता है। यद्यपि आमजन यह चाहते हैं कि जनांदोलन उनकी वास्तविक समस्याओं के निराकरण में मदद करें परंतु अनेक बार सामाजिक आंदोलन केवल बीमारी के लक्षणों तक सीमित रह जाते हैं: बीमारी की असली जड़ तक पहुंच ही नहीं पाते। अन्ना के आंदोलन का चरित्र भी ऐसा ही था। टीम अन्ना ने बड़े प्रभावी ढंग से एक विशिष्ट समस्या को तो हमारे सामने रखा परंतु उसने अन्य मुद्दों को दरकिनार कर दिया और संसदीय प्रणाली का उपहास बनाया।

जहां अरब देशों के नागरिक अपने देशों में प्रजातंत्र व संसदीय प्रणाली की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहे हैं वहीं अन्ना आंदोलन भारत में एक कुलीनतंत्र की स्थापना का प्रयास कर रहा है। यहां तक कि अन्ना को संसद से ऊपर बताया जा रहा है।

 इसमें कोई संदेह नहीं कि सामाजिक जनांदोलन परिवर्तन के वाहक होते हैं परंतु सभी जनांदोलन समाज को बेहतरी की ओर ले जाते हैं, ऐसा मानना भूल होगी। क्या हम राममंदिर आंदोलन को भुला सकते हैं जिसने भारत में साम्प्रदायिक हिंसा और अल्पसंख्यकों के दानवीकरण के एक नए युग की शुरूआत की? इस सिलसिले में यह महत्वपूर्ण है कि दलितों और अल्पसंख्यकों ने अन्ना आंदोलन से दूरी बनाए रखी क्योंकि उन्हें ऐसा लगता था कि इस आंदोलन से उनके मूल व अधिक महत्वपूर्ण हितों को चोट पहुंच सकती है।

जहां अन्ना आंदोलन को मीडिया ने बहुत अधिक महत्व दिया वहीं पास्को, जैतापुर व कुंडाकुलम आंदोलनों को अपेक्षित प्रचार नहीं मिला। इन आंदोलनों के केन्द्र में जो मुद्दे हैं वे समाज के वंचित वर्ग के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस वर्ग के हित, हमारे पूरे समाज की बेहतरी से जुड़े हुए हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि ये सभी आंदोलन हमारे प्रजातंत्र के फलने-फूलने और जड़ें पकड़ने का सुबूत हैं। कुछ मामलों में निहित स्वार्थी तत्वों ने आंदोलनों को गलत दिशा में मोड़ने का प्रयास भले ही किया हो परंतु इन आंदोलनों ने जिन मुद्दों को उछाला है उनके महत्व से कोई इंकार  नहीं कर सकता। इसके साथ ही, यह भी जरूरी है कि सभी आंदोलन, प्रजातांत्रिक सिद्धांतों व मूल्यों पर आधारित हों और जनता के सभी वर्गों को साथ लेकर चलें।

भारत के किसी भी क्षेत्र में जनाक्रोष की अभिव्यक्ति के प्रति हमें संवेदनशील होना चाहिए। ऐसे आंदोलनों का असर हमारी अंतरात्मा पर पड़ना चाहिए। दुर्भाग्यवश, सन् 2011 में हमारा ध्यान केवल अन्ना आंदोलन पर केन्द्रित रहा। हमें अन्य आंदोलनों व विरोध प्रदर्शनों को भी उपयुक्त महत्व देना होगा। इन आंदोलनों को हमारे सहयोग व समर्थन की कहीं अधिक जरूरत है। (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

(Referred by Firozkhan)

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