Posted by: Bagewafa | فروری 15, 2012

मैं गीता की शपथ लेता हूं…-राम पुनियानी

मैं गीता की शपथ लेता हूं…-राम पुनियानी

श्रीमद्भगवतगीता, जो भगवद्गीता या सिर्फ गीता के नाम से भी जानी जाती है, इन दिनों चर्चा में है। गीता के सुर्खियों में आने के एक से अधिक कारण हैं। कुछ समय पहले यह खबर आई थी कि रूस की एक अदालत, गीता को प्रतिबंधित करने पर विचार कर रही है। इस मुद्दे पर संसद में जमकर हंगामा हुआ और एक हिन्दू धार्मिक पुस्तक को प्रतिबंधित करने के प्रयास का हमारे सांसदों ने जमकर विरोध किया।

इधर, स्वदेश में, पिछले माह मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने घोषणा की कि “गीता मूलतः भारतीय दर्शन की पुस्तक है, किसी भारतीय धर्म की नहीं“। उच्च न्यायालय ने मध्यप्रदेश शासन के राज्य के स्कूलों में “गीता सार“ पढ़ाने के निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी। अदालत का यह निर्णय कैथोलिक बिशप काउंसिल द्वारा दायर एक याचिका पर आया जिसमें यह मांग की गई थी कि केवल गीता ही नहीं बल्कि सभी धर्मों में निहित नैतिक मूल्यों से स्कूली विद्यार्थियों को परिचित कराया जाना चाहिए। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि चूंकि गीता दार्शनिक ग्रंथ है, धार्मिक नहीं इसलिए राज्य सरकार गीता का पठन-पाठन जारी रख सकती है और स्कूलों में अन्य धर्मों द्वारा प्रतिपादित नैतिक मूल्यों का ज्ञान दिया जाना आवश्यक नहीं है। यह दिलचस्प है कि एक अन्य भाजपा शासित राज्य – कर्नाटक – की सरकार भी स्कूलों में गीता पढ़ाए जाने पर विचार कर रही है। यह निर्णय सुनाते समय शायद माननीय न्यायाधीशगण भूल गए कि जब कोई हिन्दू किसी अदालत में अपना बयान दर्ज करवाता है तो उसे गीता पर हाथ रखकर सच और केवल सच बोलने की शपथ लेनी होती है। क्या तब भी हम कह सकते हैं कि गीता धार्मिक नहीं बल्कि दार्शनिक पुस्तक है?

इस सिलसिले में उच्चतम न्यायालय का एक अन्य निर्णय भी विचारणीय है जिसमें कहा गया था कि “हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति है“। इस मामले में उच्चतम न्यायालय को यह तय करना था कि क्या हिन्दुत्व शब्द का चुनाव प्रचार में इस्तेमाल, आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है क्योंकि हिन्दुत्व जनता को धार्मिक आधार पर विभाजित करता है। सामान्य धर्मशास्त्रीय, समाजशास्त्रीय व राजनैतिक समझ तो यही है कि हिन्दुत्व, हिन्दू धार्मिक पहचान पर आधारित विचारधारा है। उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय ने धार्मिक आधार पर नागरिकों का ध्रुवीकरण करने वालों का काम आसान बना दिया।

मध्यप्रदेश सरकार और अन्य हिन्दुत्ववादी, जो गीता को हमेशा से हिन्दू धार्मिक ग्रंथ बताते आए हैं, उच्च न्यायालय  के निर्णय पर चुप्पी साधे हुए हैं क्योंकि यह उनके राजनैतिक एजेन्डे के अनुकूल है। वे गीता को स्कूलों में इसलिए नहीं पढ़ा रहे हैं क्योंकि वे उसमें निहित दर्शन से प्रभावित हैं बल्कि वे इसलिए ऐसा कर रहे हैं क्योंकि गीता, हिन्दू धार्मिक ग्रंथ है। गीता के संबंध में भ्रम फैलाना इसलिए आसान हो गया है क्योंकि हिन्दू धर्म न तो किसी पैगम्बर द्वारा स्थापित है और न ही वह किसी एक धार्मिक पुस्तक पर आधारित है, जो “प्रकट“ हुई हो। इस स्थिति का लाभ उठाकर तथ्यों को तोडा़-मरोड़ा जा रहा है।

यद्यपि “हिन्दू“ शब्द आठवीं सदी में प्रचलन में आया परंतु विभिन्न धार्मिक पंथों का हिन्दू धर्म के झंडे तले आने की प्रक्रिया मौर्यकाल से ही चल रही थी। वेद, उपनिषद, ब्राहम्ण, रामायण, महाभारत आदि कई ऐसे ग्रन्थ हैं जिन्हें अनादि काल से हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता रहा है। फिर हम किस ग्रन्थ को हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ मानें या न मानें? सच तो यह है कि ये सभी पुस्तकें हिन्दू धार्मिक पुस्तकें हैं परंतु पिछले कुछ वर्षों से हिन्दू धर्म को एक इश्वर (भगवान राम), एक ग्रंथ (गीता) व एक पुरोहित वर्ग (आचार्य, संत आदि) का धर्म बनाने का षड़यंत्र चल रहा है। स्पष्टतः, उच्च न्यायालय का यह दावा कि “गीता मूलतः भारतीय दर्शन की पुस्तक है, किसी भारतीय धर्म की नहीं“ अत्यंत अतार्किक प्रतीत होता है।

भगवद्गीता या गीता (इश्वर का गान) सात सौ श्लोकों का ग्रन्थ है जो कि महाकाव्य महाभारत का हिस्सा है। चूंकि इसे महाभारत से लिया गया है इसलिए इसे “स्मृति“ (अर्थात वे पुस्तकें जो प्रकट नहीं हुई हैं और मानव स्मृति पर आधारित हैं)  भी कहा जा सकता है। कुछ हिन्दू पंथ इसे उपनिषद का दर्जा देते हैं। इस अर्थ में वह “श्रुति“ (अर्थात प्रकट हुई पुस्तक) है। गीता को उपनिषदों का सार भी माना जाता है और इसलिए इसे “उपनिषदों का उपनिषद“ भी कहा जाता है। इस पवित्र ग्रंथ में भगवान कृष्ण, अर्जुन को एक क्षत्रिय राजकुमार होने के नाते उनके कर्तव्यों से परिचित करवाते हैं। अर्जुन, महाभारत का युद्ध लड़ने के इच्छुक नहीं थे क्योंकि उन्हें आशंका थी कि उनके हाथों उनके ही परिजन मारे जाएंगे। कृष्ण ने उनसे कहा कि युद्ध करना उनका पवित्र कर्तव्य है। अपने उपदेश में कृष्ण विभिन्न युगों की चर्चा भी करते हैं और इस अर्थ में गीता, हिन्दू धर्मशास्त्र का मर्म भी कही जा सकती है। गीता में कृष्ण, अर्जुन को अपना विराट रूप भी दिखाते हैं। सर्वशक्तिमान इश्वर के अपने असली रूप में वे अर्जुन को आशीर्वाद देते हैं।

गीता में वर्ण व्यवस्था के उदय की भी चर्चा है। वेदों के पुरूषसूक्त में भगवान ब्रम्हा यह बताते हैं कि उन्होंने किस प्रकार विराट पुरूष के विभिन्न अंगों से चारों वर्णों की रचना की। इसी तरह, गीता में भी कृष्ण, अर्जुन से कहते हैं कि वर्णव्यवस्था ईश्वर की बनाई हुई है और चतुर्वणों की रचना, गुण और कर्मों के आधार पर की गई है।

हिन्दू धर्म के उदय की कोई निश्चित तारीख नहीं है। इसका कारण यह है कि इस धर्म की स्थापना किसी पैगम्बर नें नहीं की वरन इसने समय के साथ आकार लिया। परंतु आज यह कहना सच को झुठलाना होगा कि गीता का हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। निःसंदेह, गीता में दर्शन भी है परंतु हर धार्मिक ग्रंथ में दर्शन होता है और मात्र इस कारण से उसे धार्मिक ग्रंथ न मानना अनुचित होगा। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय की समीक्षा आवश्यक है। यह न तो इस देश के हिन्दुओं के विश्वासों के अनुरूप है और न ही हिन्दू धर्म के संबंध में सामान्य समझ के। साम्प्रदायिक तत्व गीता को स्कूली पाठ्यक्रम में न केवल इसलिए शामिल कराना चाहते हैं क्योंकि इसके जरिए वे हिन्दू राष्ट्र के विचार को विद्यार्थियों तक पहुंचा सकेंगे वरन् इसलिए भी क्योंकि गीता, वर्ण व्यवस्था का औचित्य सिद्ध करती है और यह दावा करती है कि वर्ण व्यवस्था का रचियता स्वयं ईश्वर है। (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

(Courtesy:Firozkhan)

 


زمرے

%d bloggers like this: