Posted by: Bagewafa | مارچ 9, 2012

कविता के नाम पर फूहड़बाजी को कब तक बर्दास्‍त करें? अजित गुप्ता

कविता के नाम पर फूहड़बाजी को कब तक बर्दास्‍त करें? अजित गुप्ता

Written By: AjitGupta – Mar• 09•12

चुनावों की हलचल और होली का हुल्‍लड़ दोनों ही अब सुस्‍ता रहे हैं। चुनावों को लेकर मीडिया ने खूब पिचकारी चलाई। कहीं पिचकारी से ज्‍यादा पानी छूट गया तो कहीं चली ही नहीं। सभी ने अपने-अपने तरीके से समीक्षा भी कर डाली। जिसका जैसा झुकाव वैसी ही समीक्षा। होली के रंगों से सरोबार होते हुए भी ब्‍लाग जगत की सड़के भी कुछ सूनी सी ही लगी। बस इक्‍का-दुक्‍का लोग ही ब्‍लाग जगत पर अपनी पिचकारी चलाते दिखायी दिए। लेकिन अब समय पेड़ों पर नए पत्तों के समान निकल आया है। राजनीति से परे समाज की ओर अब ध्‍यान जाएगा, सभी ब्‍लागर मित्रों का। प्रतिदिन की घटनाओं से मन न जाने कितनी बार उहापोह में जा उलझता है, लेकिन थोड़े से चिंतन के बाद, ऐसे ही होता है, सोचकर चुप सी लग जाती है। लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे हैं जो शाश्‍वत जड़े जमा लेते हैं। वे इतनी उथल-पुथल मचाते हैं कि लिखने पर लेखक को मजबूर कर ही देते हैं। ऐसी ही एक व्‍यथा की ओर आपका ध्‍यान आकर्षित करती हूँ।

होली के त्‍योहार पर होली मिलन एक परम्‍परा बन गयी है। जहाँ पूर्व में घरों पर आने-जाने वालों का तांता लगा रहता था अब मक्‍खी-मच्‍छर भी भिनभिनाते नहीं हैं। रंग और गुलाल से सजी प्‍लेट किसी गाल के लिए तरस जाती है। बड़े जतन से बनायी मिठाई भी स्‍वयं को ही उदरस्‍थ करनी पड़ती है। लेकिन मेरी उहापोह यह नहीं है, मेरा मन उलझ गया है एक होली मिलन समारोह में। एक ऐसे ही होली मिलन समारोह में जाने का संयोग बना। सूचना में लिखा था कि हास्‍य कवि सम्‍मेलन भी है। हमें पता था कि हास्‍य और कवि सम्‍मेलन के नाम पर आज क्‍या परोसा जा रहा है, इसलिए खुशी तो अंश मात्र भी नहीं थी बस चिन्‍ता ही ज्‍यादा थी। पता नहीं कितना झेलना पड़ेगा? समारोह में जाने पर पता लगा कि शहर के ही दो बंदे बुला लिए गये हैं, एक जाना-पहचाना नाम था और एक नयी खरपतवार थी। खरपतवार को भी राष्‍ट्रीय स्‍तर की घास कहकर परिचित कराया गया। हमने सोचा कि हो सकता है कि अभी नया-नया बीज अंकुरित हुआ होगा, शायद कविता के प्रा‍रम्भिक संस्‍कार भी होंगे। लेकिन ताली बजाने के स्‍थान पर हम हाथ मलते ही रह गए। कविता के नाम पर केवल एक ही पंक्ति का बार-बार दोहराव था कि ताली नहीं बज रही है। ताली बजाओ। नहीं बजाओगे तो अगले जन्‍म में बजानी पड़ेगी। दो-चार घिसे-पिटे चुटकुले को कवि सम्‍मेलन का नाम दे दिया गया था जिसमें दो लाइन की भी कविता नहीं थी। उस जाने-पहचाने नाम को मेरी उपस्थिति का भान था, इसलिए काफी समय बाद उसने बोला कि हमारे मध्‍य वे उपस्थित हैं इसलिए कविता की भी बात करनी होगी। मैंने सोचा कि शायद अब दो-चार लाइन कविता की भी बांच दे लेकिन फिर भी नहीं।

खैर यह तो एक छोटा सा आयोजन था, लेकिन कुछ दिनों पूर्व एक विशाल आयोजन हुआ। मंच पर कवियों की बिसात बिछा दी गयी। हम भी मुख्‍य अतिथि के रूप में सामने ही स्‍थापित हो गए। सोचा कि शायद दो चार अच्‍छी कविता सुनने को मिलेगी लेकिन नहीं। बंदों ने कविता के नाम पर वही घिसे-पिटे चुटकले और फब्तियां कसना शुरू कर दिया। एक गया, दूसरा आया फिर तीसरा और चौथा, लेकिन कविता नहीं आयी। बस खाली बादल आते रहे, गड़गड़ाहट होती रही और चकोर एक बूंद के लिए तसरता रहा। आखिर थक हारकर हम आयोजक से क्षमा मांगते हुए उठकर घर आ गए और सोच लिया कि अब कभी ऐसे आयोजनों में नहीं जाएंगे।

आज कविता के लिए चिन्‍ता का विषय है। यदि आपको हँसी-ठिठोली ही करनी है तो उसे लाफ्‍टर मंच कह दीजिए। लेकिन कविता के नाम पर कविता को ही गायब कर देना, यह तो सरासर बेईमानी है। सुबह दूध वाले की घण्‍टी बजे और आप दूध लेने के बाद जब भगोनी में झांके तो वहाँ दूध के स्‍थान पर पानी मिले तो आप क्‍या करेंगे? दूध वाले का गला नहीं पकड़ेंगे? मेरा मन भी हो रहा था कि ऐसे कवियों को कॉलर पकड़कर मंच से खेंच लाऊँ और कहूं कि क्‍या देश के प्रबुद्ध वर्ग को बेवकूफ समझा है जो कविता के नाम पर फूहड़बाजी कर रहे हो। लेकिन पराये मंच पर आप ऐसा नहीं कर सकते। आपको अपने संस्‍कारों का ध्‍यान रखना पड़ता है। लेकिन यदि मेरे मंच पर ऐसा कोई करे तो मैं उसे निश्चित रूप से जमीन दिखा देती। हमारे एक मंच पर शालीन कार्यक्रम चल रहा था, तभी संयोजक ने घोषणा की कि अब एक नृत्‍य प्रस्‍तुति लेकर फलां फलां महिला आ रही हैं। लेकिन जैसे ही म्‍यूजिक बजा और उनके ठुमके लगे, मैं तो धक रह गयी। यह क्‍या हो रहा है, मुन्‍नी बदनाम हुई पर नाचा जा रहा है। मैंने तत्‍काल संयोजक को इशारा किया कि बन्‍द करो। दो क्षण में ही म्‍यूजिक बन्‍द हो गया। नृत्‍यांगना की हिम्‍मत नहीं हुई कि आकर मुझसे पूछे कि क्‍यों बन्‍द करा दिया। लेकिन सारे ही मंच तो अपने नहीं होते।

इसलिए आज आप सभी के सामने यह प्रश्‍न रखती हूँ कि कवि सम्‍मेलनों के नाम पर कविता के स्‍थान पर चुटकुले परोसने को कैसे समाप्‍त किया जाए। इसका विरोध कहाँ किया जाए? मुझे लगता है कि सभी साहित्‍यकारों को इसकी पहल करनी चाहिए। जहाँ भी अपनी जानकारी में कवि सम्‍मेलन हों, वहाँ आयोजकों को एक पत्र प्रेषित करें कि आपके यहाँ कवि सम्‍मेलन होने जा रहा है, हम शुभकामनाएं देते हैं लेकिन आप यह सुनिश्चित करावें कि कविता के नाम पर फूहड़ हास्‍य नहीं परोसा जाएगा। यदि फूहड़ हास्‍य है तो उसे कवि सम्‍मेलन का नाम ना दें। मुझे लगता है कि हम सबको आगे आना चाहिए, आपका क्‍या परामर्श है

 

 सौजन्य:http://sahityakar.com/wordpress/

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