Posted by: Bagewafa | مارچ 10, 2012

चरागों की तरह हम—-वसीम मलीक,सुरत

चरागों की तरह हम—-वसीम मलीक,सुरत

 जुगनू की तरह हम है न तारों की तरह हम

जलतें हैं हरएक शाम चरागों की तरह हम

 

हालां के बहुत तेज़ हवाएं भी नहीं थी

शाखों से जुदा हो गये पत्तों की तरह हम

 

बचपन में कीसी बात पे रोये थे इतना

भिगे हुए रहतें हैं किनारों की तरह हम

 

अफसोस ये जीना भी ,जीना कोई जीना है

जिन्दा है मगर मुरदा जमीरों की तरह हम

 

ये घर तो मसावतका मंदिरथा अज़ीज़ो

क्युं लडते हैं आपसमें दरिन्दों की तरह हम

 

जानां तेरे दिदारकी हसरत लिये दिलमें

मुद्दत हुई फिरतें हैं फकीरों की तरह हम

 

चेहरे पे वसीम अपने लगा कर कई चेहरे

जीतेही नहीं,शोबदाबाजों की तरह हम

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