Posted by: Bagewafa | مارچ 11, 2012

इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने की ओछी हरकत—एल.एस.हरदेनिया

 इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने की ओछी हरकतएल.एस.हरदेनिया

संघ परिवार और उसके नेता महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की निंदा करने का कोई अवसर नहीं चूकते हैं। आज देश में जितनी भी समस्यायें हैं, संघ परिवार उन सभी के लिए महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू को दोषी बताता है। भारत के विभाजन के लिए गांधी व नेहरू उत्तरदायी हैं, कश्मीर की समस्या नेहरू की देन है, गांधी व नेहरू ने इस देश पर छद्म धर्मनिरपेक्षता थोपी, मुसलमानों के तुष्टीकरण की परंपरा गांधी व नेहरू ने प्रारंभ की जिसका अभिशाप हमारे देश को आज भी भुगतना पड़ रहा है।

इसी तरह के आरोपों की एक लंबी सूची में एक और आरोप अभी हाल में इंदौर में जोड़ दिया गया। इंदौर में छात्रों का एक सम्मेलन आयोजित था। इस आयोजन में लगभग 10 हजार छात्र-छात्राएं शामिल थीं। उन्हें संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक श्री सुदर्शन ने कहा कि भारत गांधी के प्रयासों से आजाद नहीं हुआ। दरअसल भारत को आजाद कराने का संपूर्ण श्रेय सुभाषचन्द बोस को जाता है। उन्होंने अपने संबोधन में यह भी कहा कि यदि गांधीजी ने नेहरू जी के स्थान पर सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया होता तो देश की तस्वीर कुछ और ही होती। उन्होंने कश्मीर की समस्या के लिए भी पंडित नेहरू को दोषी ठहराया।

यहां हम सर्वप्रथम इस टिप्पणी पर विचार करेंगे कि भारत को आजादी दिलाने का श्रेय किसे जाता है। सच तो यह है कि भारत को आजाद कराने का श्रेय किसी एक व्यक्ति या एक संस्था को नहीं दिया जा सकता। 1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद आजादी की लड़ाई की रणनीति बनाने वाले व्यक्ति एक से ज्यादा वैचारिक खेमों में बंटे हुए थे। कांग्रेस के आरंभिक समय में ये खेमें नरम दल और गरम दल के नाम से जाने जाते थे। फिर कांग्रेस एक खेमे में यह विचार भी आया कि कानूनी तरीके से अर्थात बातचीत से अधिकार मांगे जाएं। दूसरा वर्ग जिसका नेतृत्व गांधीजी के हाथ में था, आंदोलन की रणनीति का समर्थक था। परन्तु गांधीजी की शर्त यह थी कि आंदोलन पूरी तरह से अहिंसक होना चाहिए। इसी के साथ – साथ एक और धारा सामने आई। यह धारा क्रांतिकारियों की थी। इस धारा ने भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद आदि महान क्रांतिकारियों को जन्म दिया। इनमें से अनेक क्रांतिकारी रूस की कम्यूनिस्ट क्रांति से प्रभावित थे। भगत सिंह उन क्रांतिकारियों में से थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की थी कि ”मैं नास्तिक हूं।” जहां एक ओर गांधी जी हिंसा के घोर विरोधी थे वहीं भगत सिंह के समान क्रांतिकारियों को हिंसा से कतई परहेज नहीं था। इस तरह का वैचारिक मतभेद कांग्रेस के भीतर भी चलता रहा। सन् 1939 में त्रिपुरी कांग्रेस में इस मतभेद के चलते कांग्रेस दो फांकों में बंट गई। एक हिस्से का नेतृत्व सुभाष चन्द बोस कर रहे थे वहीं दूसरे हिस्से का नेतृत्व महात्मा गांधी के हाथों में था। त्रिपुरी कांग्रेस में कांग्रेस अध्यक्ष (उस समय कांग्रेस अध्यक्ष को राष्ट्रपति कहते थे) का चुनाव हुआ। चुनाव में सुभाष चन्द बोस की जीत हुई और गांधी जी के उम्मीवार पट्टाभि सीतारमैय्या की हार हुई। चुनाव का नतीजा आने के बाद गांधीजी ने स्वीकारा कि ”पट्टाभि की हार मेरी हार है।” इस तरह कांग्रेस में गहरा विभाजन हो गया। गांधीजी के समर्थकों ने सुभाष चन्द बोस पर यह दबाव बनाया कि वे उन व्यक्तियों को अपनी कार्यसमिति में शामिल करें जिनकी सिफारिश गांधी जी ने की थी। सुभाष बाबू इसके लिए तैयार नहीं हुए और अंतत: उन्होंने राष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दिया। उसके बाद अंग्रेजों के खिलाफ अपने ढ़ंग से आजादी की जंग लड़ने के लिए उन्होंने देश ही छोड़ दिया। बाद में उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया। आजाद हिन्द फौज में ब्रिटेन की भारतीय सेना के अनेक अफसर व जवान शामिल हुए। उस समय द्वितीय विश्वयुध्द प्रारंभ हो चुका था। एक तरफ हिटलर व मुसोलोनी के समान तानाशाह थे तो दूसरी तरफ ब्रिटेन सहित कई प्रजातांत्रिक देश थे। युध्द के दौरान ”भारत छोड़ो आंदोलन” छेड़ दिया गया। युध्द की समाप्ति के बाद 1946 में ब्रिटिश नौसेना के भारतीय नौसेनिकों ने विद्रोह कर दिया।

यहां यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि गंभीर वैचारिक मतभेदों के बाद भी सुभाष चन्द बोस महात्मा गांधी का सम्मान करते रहे। उन्होंने ही बापू को राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित करना प्रारंभ किया। द्वितीय विश्व युध्द में ब्रिटेन की हालत खस्ता हो गई थी। उसे भारत पर कब्जा बनाए रखने रखना मँहगा सौदा लगने लगा। इसके अतिरिक्त अन्य कई कारणों के चलते अंग्रेज भारत छोड़ने पर मजबूर हुए। इसलिए किसी एक व्यक्ति या कारक को भारत की आजादी का श्रेय नहीं दिया जा सकता। संघ सुप्रीमो को स्कूली बच्चों के सामने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश नहीं करना चाहिए ।

फिर सरसंघ चालक को यह भी स्मरण रखना चाहिए कि काफी हद तक वह गांधी की विचारधारा और उनके द्वारा अपने अनुयायियों को दिया गया प्रशिक्षण ही है जिसने भारतीय प्रजातंत्र का संचालन करने के लिए एक फौज तैयार हुई। इसके साथ ही भारत में प्रजातांत्रिक परंपराओं को स्थापित व विकसित करने में जवाहरलाल नेहरू की निर्णायक भूमिका रही है। जिस मजबूर नींव पर भारतीय प्रजातंत्र की आलीशान इमारत जवाहर लाल नेहरू ने खड़ी की उसी के कारण आज भी हमारे देश में प्रजातंत्र कायम है। यदि यह प्रशिक्षण नहीं होता और यह गौरवशाली परंपरा नहीं डाली जाती तो संभवत: हमारे देश का भी वही हाल होता जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अनेक उन एशियाई और अफ्रीकी देशों का हुआ जो द्वितीय विश्वयुध्द के बाद आजाद हुए थे। इन सभी देशों में प्रारंभ में प्रजातंत्र की स्थापना हुई परन्तु बाद में अनेक देशों की सत्ता पर तानाशाहों ने कब्जा कर लिया। यदि भारत आज भी एक ऐसा प्रजातंत्र हैं जहां समय पर चुनाव होते हैं, जहां नागरिकों और मीडिया को पूरी आजादी है तो उसका श्रेय गांधी – नेहरू द्वारा डाली गई इस नींव को जाता है।

इसलिए इस तरह का विवाद उत्पन्न करना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख को शोभा नहीं देता। विशेषकर इसलिए कि इस देश के आजादी के आंदोलन में संघ की कोई भूमिका नहीं रही। इसके ठीक विपरीत इस बात के ज्वलंत प्रमाण मौजूद हैं कि संघ ने अंग्रेजों की मदद की थी और अंग्रेजों ने संघ की भूमिका की प्रशंसा की थी।

Source:

http://humsamvet.org.in/19Jan09/3.html

 

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