Posted by: Bagewafa | اپریل 12, 2012

मैं हूँ सदियों का तफ़क्कुर — अली सरदार जाफ़री

मैं हूँ सदियों का तफ़क्कुर अली सरदार जाफ़री

मैं हूँ सदियों का तफ़क्कुर मैं हूं क़र्नों क ख़्याल
मैं हूं हमआग़ोश अज़ल से मैं अबद से हमकिनार।

 
मेरे नग़्मे क़ैदे-माहो-साल से आज़ाद हैं
मेरे हाथों में है लाफ़ानी तमन्ना का सितार।

 
नक़्शे-मायूसी में भर देता हूं उम्मीदों का रंग
मैं अ़ता करता हूं शाख़े-आरजूं को बर्गो-बार।

 
चुन लिए हैं बाग़े-इन्सानी से अरमानों के फूल
जो महकते ही रहेंगे मैंने गूँथे हैं वो हार।

 
आ़र्ज़ी  जलवों को दी है ताबिशे-हुस्ने-दवाम।
मेरी नज़रों में है रोशन आदमी की रहगुज़ार।

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