Posted by: Bagewafa | جون 22, 2012

गजल की महफिल को सूना कर गये मेहदी हसन–अंदलीब अख्तर

गजल की महफिल को सूना कर गये मेहदी हसन–अंदलीब अख्तर

नई दिल्ली।

मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफिल में लेकिन हम न होंगे।

बर्रेसगीर के मायानाज गुलूकार मेहदी हसन जो अपने दिल को छू लेने वाले नगमों की बदौलत करोड़ों दिल की धड़कन बन गये थे आज भले ही इस दुनिया में न हो लेकिन उनकी आवाज का जादू हमेशा जिन्दा रहेगा और आने वाली नस्ले भी उनके दर्द भरे नगमों से लुत्फ अंदोज होती रहेंगी। उनकी मौत ने सिर्फ उनका जस्द-ए-खाकी हमसे छीना है। उनकी लाजवाब आवाज हमेशा जिन्दा रहेगी।

जिन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं,

मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा।

मेहदी हसन गजल के शहंशाह थे और उन्होंने गजल गायकी को एक नयी पहचान दी और इस वक्त किसी में इतनी ताकत नहीं है कि वह गजल गायकी में इतना कुछ इजाफा कर सके जो उन्होंने किया है। मेहदी हसन की गजल गायकी में न सिर्फ रागों के सही इस्तेमाल का हुनर था बल्कि खास अंदाज में लफ्जों की अदायगी के जरिए सुनने वालों तक गजल की रूह पहुंचाने की कोशिश भी दिखाई देती है। उनकी आवाज की धमक और गहराई गजल को रूहानी मरतबा अदा करती है। किस उतार चढ़ाव में कहने से बात का असर होगा इसका उन्हें गहरा शऊर था। वह धू्रपद और ख्याल के साथ जिस ढंग से राजस्थानी और पंजाबी लोक धुनों को बिलकुल फितरी अंदाज में मिलाने का हुनर रखते थे। इससे हर बार गजले अलग रंग के साथ उभरती थीं। अपनी मेहनत और मुसलसल रियाज से वह गजल गायकी को इतनी बुलंदी तक ले गये जहां पहुंचना आज भी बहुत सारे गुलूकारों के लिए एक चैलेंज है। फैज अहमद फैज, नासिर काजमी और अहमद फराज वगैरह की बेपनाह अवामी मकबूलियत की एक बड़ी वजह मेहदी हसन भी थे। फैज अहमद फैज जहां जाते लोग उनसे फरमाइश करते कि मेहदी हसन की गजल सुनाइए और फैज मुस्कुराते हुए कहते ‘जी मैं मेहदी हसन की ही गजल पढ़ रहा हूं’।

शहंशाहे गजल मेहदी हसन लम्बी बीमारी के बाद तेरह जून की दोपहर कराची के आगा खान अस्पताल में इंतकाल कर गये। उनकी उम्र पच्चासी बरस थी। वो फालिज के मर्ज में मुब्तला थे और पिछले कई बरसों से वह सीने और फेफड़ों के मुख्तलिफ मर्ज में भी मुब्तला चले आ रहे थे। तेरह जून की सुबह साढ़े नौ बजे के करीब उनकी तबियत अचानक बिगड़ना शुरू हुई और बारह बजकर पन्द्रह मिनट पर उनका इंतकाल हो गया। मेहदी हसन को पन्द्रह दिन पहले अस्पताल में दोबारा दाखिल किया गया था और पांच दिन पहले उनकी तबियत में बेहतरी आई जिसके बाद घर वालों से बात भी की थी। अस्सी की दहाई में बीमारी की वजह से मेहदी हसन ने गुलूकारी का सिलसिला तर्क कर दिया था। लेकिन सेहत बहाल होने के बाद उन्होंने लता मंगेशकर के साथ ‘तेरा मिलना…’ गाया। जो अक्टूबर दो हजार दस में सरहदें एलबम में जारी किया गया। समझा जाता है कि यह उनका आखिरी नगमा था। मेहदी हसन के इंतकाल के साथ गजल गायकी का सुनहरी दौर खत्म हो गया। पिछले महीने राजस्थान के वजीर-ए-आला अशोक गहलोत ने फारेन मिनिस्टर एस.एम. कृष्णा से दरख्वास्त की थी कि मेहदी हसन और उनके घर वालों को हिन्दुस्तान आने के लिए वीजा दिया जाए। राजस्थान सरकार ने उनका इलाज सरकारी खर्च पर करने की पेशकश भी की थी। वजीर-ए-आजम मनमोहन सिंह ने मेहदी हसन के इंतकाल पर गहरे रंज व गम का इजहार किया है। वजीर-ए-आजम ने कहा है कि नामवर गजल नवाज अपने दिल को छू लेने वाली नगमों की बदौलत बर्रेसगीर के करोड़ों दिल की धड़कन बन गये थे। उन्होंने अपनी आवाज के जरिए सूफियाना कलाम को एक नई जहत बख्शी। राग ध्रुपद के जरिए उन्होंने गजल गायकी को एक बुलंद मकाम दिया। वजीर-ए-आजम ने मेहदी हसन के सोगवार कुन्बे के तयीं इजहारे ताजियत पेश किया है और दुआ की थी खुदा उनके वारिसों को सब्र जमील अदा फरमाये।

मेहदी हसन अट्ठारह जुलाई उन्नीस सौ सत्ताइस को राजस्थान (हिन्दुस्तान) जिला जयपुर के गांव लोना में पैदा हुए। उन्नीस सौ सैंतालीस में बीस साल के मेहदी हसन घर वालों के साथ कराची गये और मेहनत मजदूरी के तौर पर साइकिले मरम्मत करने का काम शुरू किया। उन्होंने मैकेनिक के काम में महारत हासिल की और पहले मोटर मैकेनिक और इसके बाद ट्रैक्टर के मैकेनिक बन गये। मेहदी हसन एक मेहनती तालिब इल्म की तरह निजी मसरूफियात और घरेलू जिम्मेदारियों के बावजूद मौसीकी के रियाज से गाफिल नहीं रहे और उन्होंने उम्र के किसी भी हिस्से से रियाज से गुरेज नहीं किया। उनका मौसीकी के मारूफ घराने कलावंत से ताल्लुक था। मौसीकी की इब्तदाई तालीम वालिद अजीम खां और चचा इस्माईल खां से हासिल की। मेहदी हसन ने क्लासिकी मौसीकी में अपने आप को मुतार्रिफ करवाया। जब आठ साल के थे और बचपन से ही गुलूकारी के असरार व रमूज से आशिना थे। मगर इस सफर का बाकायदा आगाज उन्नीस सौ बावन में रेडियो पाकिस्तान के कराची स्टूडियों से हुआ। जब उन्हें वहां ठुमरी गाने का मौका फराहम किया गया और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह पच्चीस हजार से ज्यादा फिल्मी, गैर फिल्मी गीत और गजले गा चुके हैं। उनकी गायकी के सफर की दास्तान कई दाहियों पर मुहीत है। उनकी आवाज बहुत ही मीठी थी जोकि गजल गायकी के लिए बिल्कुल मुनासिब थी। उनकी धुने और मौसीकी शायर के जज्बात की तर्जुमानी करते है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि उन्होंने गजल को और आसान बनाकर उसे आम आदमी के करीब तर पहुंचाया। मेहदी हसन उर्दू शायरी को बहुत अच्छी तरह समझते थे और उनकी गजलों का इंतखाब भी बेहतरीन था। रेडियो पर फैज अहमद फैज की गजल ‘गुलों में रंग भरे बादे नौ बहार चले’ पहली मशहूर गजल थी। फिल्मी गायकी की इब्तेदा फिल्म शिकार से की। मेहदी हसन ने तीन सौ पच्चीस से ज्यादा फिल्मों में बेशुमार मकबूल गाने गाये। उन्होंने तमगा-ए-हुस्ने कारकर्दगी और हिलाले इम्तियाज समेत पाकिस्तान के तमाम नुमाया कौमी सतह के एवार्ड हासिल किये। जिनमें नौ निगार अवार्ड भी शामिल हैं। नेपाल हुकूमत ने सबसे बड़ा सिविलियन एवार्ड गोरखा दक्षिण बाहू दिया। जबकि हिन्दुस्तान ने उन्हें सहगल एवार्ड से नवाजा गया। उन्होंने अमरीका, ब्रिटेन, मिडिल ईस्ट, हिन्दुस्तान, बांग्लादेश, साउथ अफ्रीका और आस्ट्रेलिया वगैरह में अपने फन का जादू जगाया। अदबी हलको में उनकी हैसियत एक गजल गायक के तौर पर मुस्तहकम रही इसी हैसियत में उन्होंने बर्रे सगीर के मुल्कों का कई बार दौरा किया। हिन्दुस्तान में उनके एहतराम का जो आलम था वह लता मंगेशकर के इस खिराजे तहसीन से जाहिर हुआ कि मेहदी हसन के गले में तो भगवान बोलते हैं।

नेपाल के शाह वीरेन्द्र उनके एहतराम मंे उठकर खड़े हो जाते थे और फख्र से बताते थे कि उन्हें मेहदी हसन की कई गजले जबानी याद हैं। पाकिस्तान के सदर अय्यूब, सदर जियाउलहक और सदर परवेज मुशर्रफ भी उनके मद्दाह थे और उन्हें आला तरीन सिविल एजाज से नवाज चुके थे। लेकिन मेहदी हसन के लिए सबसे बड़ा एजाज वह बेपनाह मकबूलियत और मोहब्बत थी जो उन्हें अवाम के दरबार से मिली। हिन्द व पाकिस्तान से बाहर भी जहां-जहां उर्दू बोलने और समझने वाले लोग आबाद हैं मेहदी हसन की तारीफ होती रही और अस्सी की दहाई में उन्होंने अपना बेशतर वक्त यूरोप और अमरीका के दौरों में गुजारा। मेहदी हसन कसीरूल औलाद थे उनके चैदह बच्चे हैं नौ बेटे और पांच बेटी। अपने बेटों आसिफ और कामरान के अलावा उन्होंने पोतों को भी मौसीकी की तालीम दी और आखिरी उम्र में उन्होंने परदादा बनने का एजाज भी हासिल कर लिया और अपने परपोतों के सर पर भी प्यार का हाथ रखा। उनके शार्गिदों में सबसे पहले परवेज मेहदी ने नाम पैदा किया और तमाम उम्र अपने उस्ताद को खिराजे अकीदत पेश करते रहे। बाद में गुलाम अब्बास, सलामत अली, आसिफ जावेद और तलत अजीज जैसे होनहार शार्गिदों ने उनकी तर्जे गायकी को जिन्दा रखा। वह जगजीत सिंह के भी उस्ताद थे मलका-ए-तरन्नुम नूरजहां ने कहा था कि ऐसी आवाज सदियों में एक बार पैदा होती है।

राजस्थान सरकार की दावत पर मेहदी हसन ने दो हजार में राजस्थान का दौरा भी किया था और उस दौरान वह अपने आबाई गांव लोना भी गये थे और अपने मरहूम दादा इमामुद्दीन की कब्र पर फातिहा भी पढ़ी थी। वह इससे पहले भी लोना गांव का दौरा कर चुके थे और गांव के सरकारी स्कूल की इमारत की तामीर में माली मदद भी की थी। लोना गांव के रहने वाले भी मेहदी हसन से बहुत मोहब्बत करते थे और उनकी बीमारी के दौरान उनकी सेहत के लिए मुसलसल दुआएं करते रहे थे।

मेहदी हसन के इंतकाल की खबर मिलते ही उनके आबाई गांव लोना में सोग का माहौल हो गया। राजस्थान में जिला झुनझुनू के इसी गांव में जनम लेने वाले मेहदी हसन का कुन्बा मुल्क की तकसीम के बाद पाकिस्तान चला गया था। लेकिन और लोना और आस पास के लोगों ने अपनी सरजमीन पर पैदा होने वाली उस शख्सियत को कभी फरामोश नहीं किया। और वह आज भी उन्हें अपना समझते हैं। जाहिर है कि मेहदी हसन के इंतकाल की खबर सुनते ही यहां का हर बाशिंदा सदमें में डूब गया है। खासतौर पर शहंशाहे गजल के बचपन के दोस्तों और यहां मुकीम उनके दौर के रिश्तेदारों को उनके इंतकाल की खबर पर यकीन ही नहीं आ रहा था। मेहदी हसन के साथी और पड़ोसी गांव धानूरू के बाशिंदे पेशे से वकील अजीज नबी खां ने कहा पाकिस्तान चले जाने के बावजूद मेहदी हसन साहब हमे कभी नहीं भूले और लोना और आस-पास के इलाके के लोगों को वह हमेशा अपना समझते रहे। उन्होंने कहा कि गजल गो अक्सर व बेशतर फोन पर उनसे कहा करते थे मैं लोना, धनोरी और मंडावा की मिट्टी और नमक को कभी नहीं भूल सकता।

ख्याल रहे कि आजादी से पहले लोना मंडावा जागीर में वाके था और मंडावा जयपुर रियासत का हिस्सा था। मेहदी हसन उन्नीस सौ अस्सी में अपने हिन्दुस्तान दौरे के दौरान इन तीनो मकामात पर भी गये थे। उन्होंने उस वक्त अपने दो प्रोग्राम भी पेश किये थे। पहला जयपुर में राजमाता गायत्री देवी के एजाज में और दूसरा मंडावा भीम सिंह जी के एजाज में अपना प्रोग्राम पेश किया था। राजस्थान के वजीर-ए-आला अशोक गहलोत ने गजल के शहंशाह मेहदी हसन के इंतकाल पर ताजियत का इजहार किया है। उन्होंने कहा कि मेहदी हसन की गायकी में मिट्टी की खुशबू थी। गायकी में भी राजस्थान से उनके रिश्ते की झलक आती थी। उनकी जबान में मिठास और अपना पन था। मेहदी हसन के इंतकाल पर हिन्दुस्तानी फिल्म इंडस्ट्री की जानी मानी शख्सियतों ने इंतेहाई गम का इजहार किया है। मुमताज गुलूकारा लता मंगेशकर का कहना है कि उन्हें लगता है कि ईश्वर यानि भगवान मेहदी हसन की आवाज में बोलता था। उनकी गुलूकारी से यह साफ होता था कि उन्हें क्लासिकल मौसीकी में महारत हासिल है और अपनी गजलों को अपने अंदाज में अवाम तक पहुंचाते थे और यह उनकी बड़ी खूबी थी कि वह मुश्किल गजल को आसान बनाकर पेश करते थे। गजल गुलूकार पंकज उधास ने मेहदी हसन के इंतकाल पर अफसोस का इजहार करते हुए कहा कि उन्होंने जब पहली बार मेहदी साहब को सुना तो उन पर जैसे जादू हो गया था। उन दिनों मेहदी साहब की कैसेट्स मुश्किल से मिलती थी लेकिन मैंने बड़ी मुश्किल से उनकी कैसेट्स खरीदी और उन्हें सुना और जब भी मैं उन्हें सुनता था हर बार मुझे उनकी गजल में नई चीज सुनने को मिलती थी। मैं उनका मद्दाह हूं उनकी मौत गुलूकारी के लिए एक बड़ा नुकसान है। बाॅलीवुड के मारूफ अदाकार अनुपम खेर के मुताबिक मेहदी हसन उनके पसंदीदा गुलूकार थे। लता मंगेश्कर का कहना है कि मेहदी हसन मुश्किल गजल को भी आसान बनाकर पेश करते थे मुझे याद है कि मैंने कराची के एक कालेज में गेट फांद करके उनकी गजल सुनी थी। इसी तरह सूफी गुलूकार जिला खान का कहना है कि उन्हें भारतीय होने के नाते इस बात का फख्र है कि हमने सरहद पार करके सिंगर्स को यहां आने का मौका दिया और हम सब ने उनको सुना और लुत्फ अंदोज हुए। मेरे लिए मेहदी हसन तो अजीम हैं ‘वाह क्या आवाज क्या जादू’ डायरेक्टर मधुर भंडारकर का कहना है कि वह मेहदी हसन के लिए दुआ करते हैं कि उनको जन्नत हासिल हो। आपकी गजले हमारे साथ रहेंगी और हम हमेशा आपके शुक्र गुजार रहेंगे आपकी गजलों के लिए। कैलाश खेर ने कहा जिस रोज कराची में हमारा शो था हम उसी दिन वहां पहुंचे सिक्योरिटी की वजह से हम अजीम फनकार मेहदी हसन से नहीं मिल सके। वह हमारे बीच नहीं है लेकिन रूह को ताजगी अता करने वाली उनकी आवाज हमेशा जिन्दा रहेगी। मेहदी हसन के इंतकाल से मौसीकी की दुनिया में एक बड़ा खला पैदा हो गया है उसको पुर करना नामुमकिन है।

(cortesy:Jadeed Markaz 10-16june2012)

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