Posted by: Bagewafa | اگست 6, 2012

दिन ढलनेको आया—फेहमिदा रियाज

दिन ढलनेको आया—फेहमिदा रियाज

 

में मुंह अंधेरे निकली थी

और अब

दिन ढलनोको आया

देखो,मेंने कहीं थमकर

सांस भी नहीं ली है

नहीं बैठी हुं समझोते के सायबानो में

पेर लडखराता  है

सुर ठोकरें लगती  है

तो में अपना अहद दोहराती हुं

बारुदका गीत लिखनेका अहद

लेकिन मेरे दोस्तो

में यह भी जानती हुं

क्या यह सुनकर तुम मायूस हो गये

नहीं नहीं मेरे साथी

मूझे सब कुछ सच सच बताने दो

मुझे कुछ् भी नहीं छूपाने दो

सब कूछ पूरा सच

डरो मत पूरा सच बदसूरत नहीं होता

इसमें जो कुछ बदनुमा है

वह तो चांदके दाग के मानिंद है

क्या तुमा पूरा चांद न देखो गे?

 

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