Posted by: Bagewafa | نومبر 4, 2012

एक जमीन पर तीन उर्दू शायर की तीन गजलें–गालिब…दाग….अमीर मीनाई

एक जमीन पर तीन उर्दू शायर की तीन गजलें–गालिब…दाग….अमीर मीनाई

 

विसाल-ए-यार होता***** ग़ालिब

ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल -ए-यार होता

अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता

 

तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जाना

कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता

 

तेरी नाज़ुकी  से जाना कि बंधा था अ़हद  बोदा

कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार  होता

 

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को

ये ख़लिश  कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

 

ये कहां की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह

कोई चारासाज़  होता, कोई ग़मगुसार  होता

 

रग-ए-संग से टपकता वो लहू कि फिर न थमता

जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता

ग़म अगर्चे जां-गुसिल  है, पर  कहां बचे कि दिल है

ग़म-ए-इश्क़ गर न होता, ग़म-ए-रोज़गार होता

 

कहूँ किससे मैं कि क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है

मुझे क्या बुरा था मरना? अगर एक बार होता

 

हुए मर के हम जो रुस्वा, हुए क्यों न ग़र्क़ -ए-दरिया

न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता

 

उसे कौन देख सकता, कि यग़ाना  है वो यकता

जो दुई  की बू भी होती तो कहीं दो चार होता

 

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान "ग़ालिब”!

तुझे हम वली समझते, जो न बादाख़्वार होता

अजब अपना हाल होता…दाग दहेल्वी

ये ना थी हमारी किस्मत की विसाले यार होता,
अगर और जीते रहते, यही इंतज़ार होता

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निछार होता

कोई फ़ितना था क़यामत ना फिर आशकार होता
तेरे दिल पे काश ज़ालिम मुझे इख़्तियार होता

जो तुम्हारी तरह तुम से कोई झूठे वादे करता
तुम्हीं मुन्सिफ़ी से कह दो तुम्हे ऐतबार होता

ग़म-ए-इश्क़ में मज़ा था जो उसे समझ के खाते
ये वो ज़हर है के आखिर मै-ए-ख़ुशगवार होता

ना मज़ा है दुश्मनी में ना ही लुत्फ़ दोस्ती में
कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता

ये मज़ा था दिल्लगी का के बराबर आग लगती
ना तुझे क़रार होता ना मुझे क़रार होता

तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
अगर अपनी ज़िंदगी का हमें ऐतबार होता

ये वो दर्द-ए-दिल नहीं है के हो चारासाज़ कोई
अगर एक बार मिटता तो हज़ार बार होता

गए होश तेरे ज़ाहिद जो वो चश्म-ए-मस्त देखी
मुझे क्या उलट ना देता जो ना बादाख़्वार होता

मुझे मानते सब ऐसा के उदूं भी सजदा करते
दर-ए-यार काबा बनता जो मेरा मज़ार होता

तुम्हे नाज़ हो ना क्योंकर के लिया है “दाग़” का दिल
ये रक़म ना हाथ लगती ना ये इफ़्तिख़ार होता

वो सितम-शि’आर होता……..’अमीर’ मिनाई

 

मिरे बस में या तो यारब ! वो सितम-शि’आर होता

ये न था तो काश दिल पर मुझे इख़्तियार होता !

 

पस-ए-मर्ग काश यूँ ही मुझे वस्ल-ए-यार होता

वो सर-ए- मज़ार होता ,मैं तह-ए-मज़ार होता !

 

तिरा मयक़दा सलामत ,तिरे खु़म की ख़ैर साक़ी !

मिरा नश्शा क्यूँ उतरता मुझे क्यूँ ख़ुमार होता ?

 

मिरे इत्तिक़ा का बाइस तो है मेरी ना-तवानी

जो मैं तौबा तोड़ सकता तो शराब-ख़्वार होता !

 

मैं हूँ ना-मुराद ऐसा कि बिलक के यास रोती

कहीं पा के आसरा कुछ जो उम्मीदवार होता

 

नहीं पूछता है मुझको कोई फूल इस चमन में

दिल-ए-दाग़दार होता तो गले का हार होता

 

वो मज़ा दिया तड़प ने कि यह आरज़ू है यारब !

मिरे दोनो पहलुओं में दिल-ए-बेक़रार होता

 

दम-ए-नाज़ भी जो वो बुत मुझे आ के मुँह दिखा दे

तो ख़ुदा के मुँह से इतना न मैं शर्मसार होता

 

जो निगाह की थी ज़ालिम तो फिर आँख क्यों चुरायी?

वो ही तीर क्यों न मारा जो जिगर के पार होता

 

मैं ज़बां से तुमको सच्चा कहो लाख बार कह दूँ

उसे क्या करूँ कि दिल को नहीं ऐतिबार होता

 

मिरी ख़ाक भी लहद में न रही ’अमीर’ बाक़ी

उन्हें मरने ही का अब तक नहीं ऐतिबार होता !

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Responses

  1. اسلام علیکم ، آج باغ وفا سے گذر ہوا اور یہاں کی بہار و لالہ و زار دیکھ کر قلب کو بڑی تقویت حاصل ہوئی۔ سب سے پہلے یہ تین غزلیں ہمارے ساتھی بلاگر محمد وارث کے بلاگ صریر خانہ وارث میں دیکھنے ملی تھی اور ان کے ہی حوالے سے ہم نے اپنے بلاگ اردو شاعری پر بھی شائع کی تھی ۔ آج کافی دنوں کے بد ان غزلیات کو ہندی میں پڑھ کر کافی خوشی ہوئی۔
    اللہ اس باغ وفا کی بہار کو یونہی قائم و دائم رکھیں۔


زمرے

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