Posted by: Bagewafa | دسمبر 13, 2012

क्या मोदी का वाइब्रेंट गुजरात वाजपेयी के इंडिया शाइनिंग की राह पर है?तहलका

क्या मोदी का वाइब्रेंट गुजरात वाजपेयी के इंडिया शाइनिंग की राह पर है?तहलका

05/12/2012 07:05:00

 

2004 में इंडिया शाइनिंग का जुमला उछालकर लोकसभा चुनाव में उतरी वाजपेयी सरकार को जनादेश ने सत्ता से बेदखल करके इस जुमले का खोखलापन बताया था. क्या नरेंद्र मोदी के वाइब्रेंट गुजरात के नारे के साथ भी कुछ वैसा ही होने वाला है? हिमांशु शेखर की रिपोर्ट

 

पिछले कुछ सालों में अगर किसी एक विधानसभा चुनाव को बड़ी दिलचस्पी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर देखा जा रहा है तो वह है गुजरात विधानसभा चुनाव. माना जा रहा है कि अगर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरराव मोदी लगातार तीसरा चुनाव जीतकर चौथी बार सत्ता में आते हैं तो फिर वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने की कोशिश करेंगे. देश के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का एक बड़ा वर्ग भी उन्हें प्रधानमंत्री के संभावित और सशक्त उम्मीदवार के तौर पर देखता है. हालांकि, मोदी खुद दिल्ली की राजनीति में आने की संभावनाओं को बार-बार खारिज करते रहे हैं. लेकिन उनकी सक्रियता और खासतौर पर पिछले एक साल में जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व पर हमला करना शुरू कर दिया है उससे संकेत मिलता है कि वे एक बार फिर गांधीनगर में भाजपा की सरकार बनवाकर दिल्ली की ओर कदम बढ़ाना चाहते हैं. उनके दिल्ली के सपने का क्या होगा, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर है कि दिसंबर में दो चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन कैसा रहता है. यह विधानसभा चुनाव कुछ ऐसा बन गया है कि इसके परिणाम के आधार पर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय होने की बात की जा रही है. कहा जा रहा है कि अगर मोदी जीतते हैं और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होते हैं तो एक बार फिर से धर्म के आधार पर चुनावी ध्रुवीकरण होगा.

 

मोदी, भाजपा और खबरिया चैनलों के चुनावी सर्वेक्षण की मानें तो एक बार फिर गुजरात में भाजपा सरकार बनने वाली है. अहमदाबाद और आस-पास के इलाकों में आम लोगों से बातचीत करने से भी लगता है कि मोदी की वापसी को लेकर किसी को कोई संदेह नहीं. लेकिन न सिर्फ मोदी के विरोधी बल्कि लंबे समय तक गुजरात की राजनीति को देखने-समझने और दूर-दराज के इलाकों में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की मानें तो नरेंद्र मोदी की राह उतनी आसान भी नहीं. गुजरात चुनाव में भाजपा का चुनाव प्रचार मोदी पर केंद्रित है. हर तरफ यह बताया जा रहा है कि मोदी राज में राज्य की कितनी तरक्की हुई, कितनी सड़कें बनीं और कितने फ्लाइओवर तैयार किए गए. इन्हीं दावों के आधार पर ‘समृद्ध गुजरात’ और ‘गौरवशाली गुजरात’ जैसे जुमले मोदी सरकार ने उछाले हैं. लेकिन गुजरात को समझने वाले लोगों से बातचीत की जाए और खुद सरकारी दस्तावेजों में ही झांककर देखा जाए तो इन जुमलों के खोखले होने का भी अहसास होता है.

 

कुछ वैसी ही तस्वीर उभरती है जैसी 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के ‘भारत उदय’ जुमले के वक्त थी. उस वक्त भी भाजपा के नेता विकास के लंबे-चौड़े दावे करते घूम रहे थे और कह रहे थे कि हर भारतीय ‘फील गुड’ कर रहा है. कहा जाता है कि ये दोनों जुमले उस समय भाजपा में बेहद प्रभावी रहे प्रमोद महाजन की दिमाग की उपज थे. लेकिन इन जुमलों के खोखलेपन का अहसास उन सभी लोगों को हो रहा था जो देश को सड़कों की चकाचौंध से पार जाकर देखने की क्षमता रखते थे. बाद में जनादेश ने साबित कर दिया कि उसे न तो ‘फील गुड’ हो रहा था और न ही उसकी नजरों में ‘भारत उदय’ जैसी कोई चीज थी. भाजपा उस वक्त केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई तो अब तक वापस आने का रास्ता नहीं तलाश पाई है.

 

दो दशक पहले भी गुजरात की विकास दर 12-13 फीसदी थी. उस वक्त राष्ट्रीय औसत 7 फीसदी था. लेकिन 2011 में गुजरात की विकास दर 11 फीसदी थी और राष्ट्रीय औसत 10 फीसदी

 

अगर सरकारी दस्तावेजों को खंगाला जाए तो पता चलता है कि मानव विकास के तकरीबन सभी मोर्चों पर गुजरात बुरी हालत में है. कुपोषण बढ़ रहा है. आदिवासियों को भरपेट भोजन नहीं मिल रहा है. सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर नहीं हैं. सिंचाई की सुविधा से अब भी प्रदेश के लाखों किसान महरूम हैं. लिंग अनुपात दर के मामले में प्रदेश की बुरी हालत है. लेकिन फिर भी भाजपा और नरेंद्र मोदी ‘समृद्ध गुजरात’ का राग लगातार अलाप रहे हैं. तो क्या यह मतलब निकाला जाए कि उनका यह दावा बिल्कुल खोखला है? अगर सरकारी दस्तावेजों को ही देखें और गुजरात के प्रमुख शहरों में जाएं तो पता चलता है कि गुजरात में समृद्धि सड़कों, फ्लाइओवरों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के मामले में आई है. लंबे समय तक गुजरात में पत्रकारिता करने वाले और अभी गुजरात विश्वविद्यालय के एचके आर्ट्स कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले हेमंत कुमार शाह इस स्थिति को कुछ इस तरह से रखते हैं, ‘विकास को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांट सकते हैं. एक है उद्योग केंद्रित और दूसरा है मानव केंद्रित. जिस तरह का इन्फ्रास्ट्रक्चर मोदी ने गुजरात में विकसित किया है उसे आप पहली श्रेणी में ही रख सकते हैं. यानी सड़कें बनीं, फ्लाइओवर बने और उद्योग स्थापित हुए. लेकिन मानव केंद्रित विकास के पैमानों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कुपोषण आदि के मोर्चों पर मोदी सरकार नाकाम साबित हुई है. मोदी ने विकास की चकाचौंध पैदा की है.’

 

जिस चकाचौंध की बात हेमंत कुमार शाह कर रहे हैं उसके नमूने न सिर्फ गुजरात की सड़कें और फ्लाइओवर हैं बल्कि और भी कई हैं. अहमदाबाद से 30 किलोमीटर की दूरी पर नरेंद्र मोदी सरकार, चीन के शंघाई की तर्ज पर बिल्कुल नया शहर बसा रही है. 886 एकड़ में विकसित किए जा रहे इस शहर का नाम गिफ्ट यानी गुजरात इंटरनेशनल फायनेंस टेक सिटी रखा गया है. इसे खास तौर पर कंपनियों को कामकाजी जगह देने के मकसद से विकसित किया जा रहा है. गुजरात सरकार ने यह काम शंघाई के बड़े हिस्से को डिजाइन करने वाले ईस्ट चाइना आर्किटेक्चरल डिजाइन ऐंड रिसर्च इंस्टीट्यूट को दिया है. इस परियोजना को 2017 तक पूरा किया जाना है. अभी यहां दूसरे चरण का काम चल रहा है.

 

­दूसरी तरफ जब कांग्रेस पार्टी यह घोषणा करती है कि वह सत्ता में आने के बाद गरीब महिलाओं को घर बनाकर देगी तो इसके लिए 38 लाख फॉर्म भरे जाते हैं. यह तथ्य इस बात को रेखांकित करता है कि गुजरात में विकास की आंखों को चुंधियाने वाली चकाचौंध किस तरह से पैदा की गई है.

 

मोदी अक्सर यह दावा करते हैं कि उन्होंने ‘वाइब्रेंट गुजरात’ निवेशक सम्मेलन के जरिए राज्य में भारी निवेश आकर्षित किया है. स्थिति को समझने के लिए जरूरी है कि सम्मेलन से संबंधित आंकड़ों की पड़ताल की जाए. 2011 में आयोजित इस सम्मेलन में 20.83 लाख करोड़ रुपये के 7,936 सहमति पत्रों पर दस्तखत हुए. लेकिन कई रिपोर्टों में यह बात सामने आई है कि इनमें से कुछ सहमति पत्रों पर ही अमल हो पा रहा है. 2005 के सम्मेलन में यह दावा किया गया कि इसमें 1.06 लाख करोड़ रुपये के निवेश के लिए सहमति बनी है. लेकिन सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी बताती है कि इसमें से सिर्फ 23.52 फीसदी यानी 24,998 करोड़ रुपये का निवेश गुजरात में हो पाया. खुद गुजरात सरकार की सामाजिक और आर्थिक समीक्षा कहती है कि 2003 से लेकर अब तक वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में जितने निवेश की घोषणा हुई है उनमें से सिर्फ 6.13 फीसदी पर ही क्रियान्वयन हो पाया है. निवेश को लेकर मोदी के बड़े दावों के बावजूद तथ्य यह है कि गुजरात 2011 में विदेशी निवेश आकर्षित करने के मामले में दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से पीछे रहा.

 

नरेंद्र मोदी और उनका दल भाजपा गुजरात के विकास के दावे करते हुए नहीं अघाते. अगर विकास दर को विकास का एक अहम पैमाना माना जाए तो दो दशक पहले भी गुजरात की विकास दर 12-13 फीसदी थी. उस वक्त राष्ट्रीय औसत 7 फीसदी था. लेकिन 2011 में गुजरात की विकास दर 11 फीसदी थी और राष्ट्रीय औसत 10 फीसदी. इस लिहाज से अगर देखा जाए तो मोदी सरकार गुजरात की पिछली सरकारों की तुलना में प्रदर्शन के लिहाज से कमजोर साबित हो रही है. आंकड़े यह प्रमाणित करते हैं कि गुजरात में विकास नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में ही नहीं शुरू हुआ बल्कि यह प्रदेश हमेशा से दूसरे राज्यों की तुलना में आगे रहा है. मोरारजी देसाई, चिमनभाई पटेल से लेकर माधव सिंह सोलंकी तक के समय में भी गुजरात की विकास दर अच्छी रही है. आठवीं पंचवर्षीय योजना यानी 1992-97 के दौरान गुजरात की विकास दर 12.9 फीसदी थी. जबकि पिछले पांच साल का औसत निकालें तो यह आंकड़ा 11.2 फीसदी का है.

 

इससे भी पीछे चलें तो गुजरात में कारोबारी माहौल पिछले कई सौ सालों से रहा है. 1498 में वास्कोडिगामा को भारत का रास्ता बताने का काम भी एक गुजराती कांजी मालम ने ही किया था. मालम कच्छ के रहने वाले थे और कपास व नील का कारोबार समुद्र के रास्ते से करते थे. उस वक्त तक गुजरात के कारोबारियों ने मलेशिया और इंडोनेशिया के साथ कारोबार करना शुरू कर दिया था. बाद में गुजरात एक ऐसे केंद्र के तौर पर विकसित हुआ जहां से अफ्रीका, अरब और अन्य देशों से आने वाले सामानों को भारत के अन्य हिस्सों में पहुंचाया जाता था.

 

मोदी सरकार पर एक आरोप यह भी लगता है कि उसने आम लोगों की कीमत पर गुजरात में कॉरपोरेट घरानों को कारोबार बढ़ाने का अवसर दिया. दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे और गुजरात परिवर्तन पार्टी(जीपीपी) के अध्यक्ष केशुभाई पटेल कहते हैं कि सरकार ने टाटा को नैनो परियोजना के 22,000 करोड़ रुपये निवेश के बदले 33,000 करोड़ रुपये दे दिए हैं. वे कहते हैं, ‘कंपनी को 20 साल तक बिजली आधी कीमत पर दी जा रही है. पानी बिल्कुल मुफ्त दिया जा रहा है. टाटा को कर के तौर पर भुगतान की जाने वाली रकम को 20 साल तक रखने की सुविधा दी गई है. इसके बाद उससे इस पर 0.1 फीसदी का ब्याज लिया जाएगा. इससे सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ रहा है और अंततः आम आदमी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है.’

 

कॉरपोरेट जगत को तमाम सुविधाएं देने का ही नतीजा है कि रतन टाटा से लेकर अंबानी बंधुओं तक देश के सभी प्रमुख उद्योगपति मोदी की प्रशंसा करते हुए दिखते हैं. इनमें से ज्यादातर मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं. कॉरपोरेट वर्ल्ड के चहेते बने मोदी कभी देश के प्रमुख उद्योगपतियों के निशाने पर थे. लेकिन उन्होंने जिस अंदाज में राजनीति की उसी अंदाज में उद्योग जगत के लोगों को भी अपने पाले में किया. साल 2003 की फरवरी में सीआईआई ने नई दिल्ली में नरेंद्र मोदी के अनुरोध पर उनका एक कार्यक्रम रखा था. इसमें कॉरपोरेट जगत की प्रमुख हस्तियां शामिल हुई थीं. 2002 के दंगों के बाद एचडीएफसी के दीपक पारेख, इन्फोसिस के नारायणमूर्ति, विप्रो के अजीम प्रेमजी जैसे लोगों ने मोदी की खुली आलोचना की थी. 2003 के आयोजन में मोदी के साथ मंच पर जमशेद गोदरेज और राहुल बजाज थे. संचालन सीआईआई के प्रमुख तरुण दास कर रहे थे. गोदरेज ने तो सधे शब्दों में मोदी की आलोचना की. लेकिन राहुल बजाज ने मोदी पर सीधा हमला बोला और 2002 को गुजरात पर एक दाग बताया. जब मोदी की बारी आई तो उन्होंने पलट कर बजाज को जवाब दिया कि अगर आप सच जानना चाहते हैं तो आप और आपके छद्म धर्मनिरपेक्ष दोस्त गुजरात आएं और वहां की जनता इसका जवाब देगी. वे यहीं नहीं रुके बल्कि गोदरेज और बजाज से यह भी पूछ डाला कि जो दूसरे लोग गुजरात की छवि खराब करते हैं, उनके निहित स्वार्थ हैं लेकिन आपका क्या स्वार्थ है.

 

पिछले साल गुजरात में 439 बलात्कार के मामले सामने आए. प्रदेश की 85 फीसदी आदिवासी महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं. 18 से 20 साल के आयु वर्ग में हजार लड़कों पर 601 लड़कियां हैं

 

मोदी ने इस मामले को यहीं खत्म नहीं होने दिया बल्कि सीआईआई में शामिल गुजरात के कारोबारियों को यह समझाया कि गोदरेज, बजाज और सीआईआई ने मोदी का ही अपमान नहीं किया है बल्कि यह गुजरात का अपमान है. इसके बाद अदानी, कैडिला, निरमा समेत गुजरात के प्रमुख 100 औद्योगिक घरानों ने न सिर्फ सीआईआई से अलग होने की धमकी दी बल्कि अपना एक अलग संगठन रिसर्जेंट ग्रुप ऑफ गुजरात भी बना लिया. अब सीआईआई के सामने संकट पैदा हो गया. गुजरात के कारोबारियों के अलग होने का मतलब था कि पश्चिम भारत में सीआईआई खत्म. इधर दिल्ली में मोदी ने यह सुनिश्चित करवाया कि वाजपेयी सरकार के मंत्रियों तक सीआईआई सदस्यों की पहुंच मुश्किल हो जाए. मजबूर होकर सीआईआई को मोदी से लिखित माफी मांगनी पड़ी. इसके तीन महीने बाद सीआईआई ने ज्यूरिख में विश्व आर्थिक मंच के आयोजन के मौके पर मोदी के कहने पर गुजरात के निवेशकों की एक बैठक आयोजित की. जब गोदरेज और बजाज ने मोदी पर हल्ला बोला तो समझा गया कि पारसी कारोबारी मोदी के खिलाफ हैं. क्योंकि पारसी अल्पसंख्यकों में शामिल हैं और यह समुदाय मोदी के साथ सहज नहीं है. अल्पसंख्यक समुदाय के कारोबारियों को अपने पाले में लाने के लिए मोदी ने रतन टाटा से अपने रिश्ते ठीक किए. वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में उन्हें उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों सम्मानित करवाया. गुजरात के एक कारोबारी जो कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ने की कोशिश कर रहे हैं, कहते हैं, ‘मोदी को तानाशाह कहा जा सकता है लेकिन लोगों के बीच उनकी अपील है. वे लोगों को प्रेरित करते हैं. वे सीईओ की तरह काम करते हैं. यही वजह है कि कारोबारी वर्ग उन्हें पसंद करता है. वे यह सुनिश्चित करते हैं कि कारोबारियों को कोई दिक्कत न हो.’

 

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अर्जुन मोढवाडिया भी केशुभाई पटेल की तरह ही मानते हैं कि मोदी ने कॉरपोरेट जगत को आम लोगों पर तरजीह दी. वे कहते हैं, ‘अगर मोदी सही मायने में आम आदमी के हमदर्द होते तो पिछले दस साल में इतनी बड़ी संख्या में गुजरात में लोग आत्महत्या नहीं करते. पिछले दस साल में प्रदेश के 37,248 लोगों ने आत्महत्या की. इस दौरान देश में हुई कुल आत्महत्या में गुजरात की हिस्सेदारी 4.6 फीसदी रही. इनमें किसानों की संख्या 7,062 है. बेरोजगारी और आर्थिक दिक्कतों की वजह से आत्महत्या करने वालों की संख्या इस दौरान 11,681 रही. क्या इसे ही विकास कहते हैं?’ वे मोदी के विकास के मॉडल पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘अगर सही में प्रदेश का विकास हो रहा होता तो गुजरात का कर्ज बढ़ता नहीं जाता. अभी गुजरात पर 1.18 लाख करोड़ रुपये का कर्ज  है. गुजरात में हर बच्चा 19,352 रुपये के कर्ज के बोझ के साथ पैदा होता है. गुजरात पर बढ़ते कर्ज के बोझ की वजह यह है कि सरकार सामाजिक योजनाओं पर पैसे खर्च नहीं कर रही है और सरकारी खजाने का दुरुपयोग कर रही है.’

 

लंबे समय तक संघ के पदाधिकारी रहे और अभी जीपीपी में समन्वय का काम देख रहे वासुदेव पटेल कहते हैं, ‘युवाओं को रोजगार देने का कोई बंदोबस्त मोदी ने नहीं किया. ज्यादातर क्षेत्रों में काम के लिए नियमित की जगह अस्थाई लोगों की नियुक्तियां हो रही हंै. कई क्षेत्रों में मोदी ने सहायक योजना के तहत लोगों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम दर पर सरकारी कार्यों में लगाया है. पटवारी सहायक की नियुक्ति 84 रुपये प्रति दिन पर हुई है. स्कूलों में पढ़ाने के लिए विद्या सहायक की नियुक्ति 123 रुपये प्रति दिन पर हुई है. पुलिस सहायक की नियुक्ति 117 रुपये प्रति दिन पर हुई है. इंजीनियर सहायक की नियुक्ति 150 रुपये प्रति दिन पर हुई है. कॉलेज अध्यापक सहायक की नियुक्ति 233 रुपये प्रति दिन पर हुई है. मिड-डे मील के तहत पहले 225 ग्राम का पैकेट मिलता था. मोदी ने इसे घटाकर 150 ग्राम कर दिया है.’ वे मोदी सरकार पर आगे आरोप लगाते हैं, ‘सरकारी संस्थानों के शुल्क में बढ़ोतरी कर दी गई. भुज मेडिकल कॉलेज अदानी को दे दिया गया. सड़क परियोजनाओं में काफी भ्रष्टाचार है. 40 फीसदी तक पैसा कमीशन के तौर पर जा रहा है. 4.5 लाख किसानों को बिजली का कनेक्शन नहीं मिल पाया है. कल्पसर परियोजना पर कोई प्रगति नहीं हो पाई. इससे सात लाख किसानों को पानी मिल सकता था. बिजली की दिक्कत खत्म हो सकती थी. इस परियोजना की प्राथमिक रिपोर्ट 10 साल पहले तैयार हो गई थी लेकिन उसके बाद इस पर काम ही आगे नहीं बढ़ाया मोदी सरकार ने.’

 

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट बताती है कि अस्थायी ग्रामीण मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में देश के 20 बड़े राज्यों में गुजरात 14 वें स्थान पर है. अस्थायी शहरी मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में गुजरात सातवें स्थान पर है. स्थायी ग्रामीण मजदूरों और स्थायी शहरी मजदूरों को मजदूरी देने के मामले में गुजरात क्रमशः 17वें और 18वें स्थान पर है. इसका मतलब यह है कि गुजरात में मजदूरों की हालत बुरी है. उनकी आमदनी कम होने की वजह से उनकी क्रय शक्ति कम है. अध्ययन बताते हैं कि ऐसे परिवारों में कुपोषण और अशिक्षा जैसी स्थितियां सामान्य होती हैं.

 

सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि शिशु मृत्यु दर के मामले में अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों में गुजरात सातवें स्थान पर है. अब भी यहां प्रति हजार नवजात बच्चों में से 50 काल के गाल में समा रहे हैं. औसत उम्र के मामले में गुजरात आठवें स्थान पर है. मातृ मृत्यु दर के मामले में भी प्रदेश आठवें स्थान पर है. लिंग अनुपात के मामले में भी गुजरात आठवें स्थान पर है और यहां 1,000 पुरुषों की तुलना में 886 महिलाएं ही हैं. गुजरात के शहरी इलाकों में जहां सबसे अधिक विकास की बात मोदी सरकार करती है, वहां यह औसत घटकर 856 पर पहुंच जाता है. चार साल से कम उम्र के बच्चों के आयु वर्ग में यह औसत घटकर 841 पर पहुंच जाता है. पहली से दसवीं कक्षा के बीच पढ़ाई छोड़ने के मामले में गुजरात का औसत 59.11 फीसदी है. यह 56.81 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से थोड़ा ही बुरा है लेकिन इस मामले में 13 राज्यों का प्रदर्शन गुजरात से अच्छा है. घरों में पानी की आपूर्ति के मामले में गुजरात देश के सभी राज्यों में 14 वें स्थान पर है. यहां के 58 फीसदी घरों में ही नल के जरिए पानी पहुंचता है.

 

किसी समाज की तरक्की का एक अहम पैमाना यह भी होता है कि वहां महिलाओं की स्थिति कैसी है. अगर इस पैमाने पर देखा जाए तो मोदी के गुजरात की तरक्की के दावे खोखले दिखते हैं. इस बारे में लिंगानुपात के ऊपर लिखे आंकड़ों से आगे की कहानी इला पाठक बताती हैं. पाठक गुजरात महिला फेडरेशन की अध्यक्ष हैं और गुजरात विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के बाद से लगातार प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में महिलाओं के बीच काम कर रही हैं. ‘पिछले साल गुजरात में 439 बलात्कार के मामले सामने आए. हालांकि, यह संख्या हरियाणा जैसे राज्य के मुकाबले में कम है लेकिन अगर गुजरात देश का नंबर एक राज्य होने का दावा करता है तो फिर इतने बलात्कार राज्य में नहीं होने चाहिए. प्रदेश की 85 फीसदी आदिवासी महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं. मातृ मृत्यु दर 140 से 148 के बीच है. यह चिंता की बात है. बाल विवाह थमने का नाम नहीं ले रहा. 18 से 20 साल के आयु वर्ग में प्रति हजार लड़के पर प्रदेश में सिर्फ 601 लड़कियां हैं.’ वे कहती हैं, ‘प्रदेश में महिलाओं और स्वास्थ्य सेवाओं की बुरी हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर रोज प्रदेश में 17 महिलाएं मर रही हैं. इनमें से ज्यादातर 13-30 साल आयु वर्ग की हैं. मोदी का विकास महिला केंद्रित नहीं है.’

 

गुजरात सरकार की रिपोर्ट बताती है कि 2003 से लेकर अब तक वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में जितने निवेश की घोषणा हुई है उनमें से सिर्फ 6.13 फीसदी परियोजनाओं पर ही क्रियान्वयन हो पाया है

 

ऐसे में स्वाभाविक तौर पर यह सवाल उठता है कि मानव विकास के मोर्चों पर इतना बुरा प्रदर्शन करने वाली मोदी सरकार क्या यह चुनाव हार रही है? गुजरात के कई विधानसभा चुनाव कवर करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘आप अगर लोगों से बातचीत करें तो पता चलेगा कि इस प्रदेश के लोग विकास के नशे में हैं. हां, यह सच है कि मोदी ने काम किया है लेकिन यह काम उस तरह का भी नहीं है जिस तरह से दिखाया जा रहा है. कई मोर्चे हैं जिस पर मोदी सरकार ने वाकई बहुत अच्छा काम किया है लेकिन कई मोर्चे ऐसे हैं जहां अभी काफी कुछ करने की जरूरत है.’ वे कहते हैं, ‘जहां तक चुनाव जीतने की बात है तो शायद मोदी इस बार भी आ जाएं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनमें सिर्फ अच्छाइयां ही हैं.’

 

नरेंद्र मोदी के लिए इस बार का चुनाव जीतना उतना आसान नहीं होने जा रहा जितना बताया जा रहा है. इसकी बड़ी वजह कई तरफ से मोदी को मिल रही चुनौती हैं. केशुभाई पटेल अलग पार्टी बनाकर चुनौती दे रहे हैं तो कांग्रेस भी इस बार मुकाबले में खड़ी दिख रही है. वहीं कई ऐसे समूह भी हैं जो मोदी सरकार की नाकामियों को लोगों के सामने लाने का काम कर रहे हैं. जो लोग गुजरात की राजनीति को समझते हैं उनका मानना है कि अगर मोदी को एक बार फिर गांधीनगर में अपनी सरकार बनानी है तो मध्य गुजरात में भाजपा की हालत सुधारनी होगी. लंबे समय से गुजरात में रिपोर्टिंग कर रहे एबीपी न्यूज के ब्यूरो प्रमुख ब्रजेश कुमार सिंह कहते हैं, ‘मध्य गुजरात में पहले 43 सीटें थीं. परिसीमन के बाद 40 सीटें बची हैं. 2002 में भाजपा ने यहां 38 सीटों पर जीत हासिल की थी और कांग्रेस को पांच सीट मिली थीं. लेकिन 2007 में कांग्रेस ने यहां 22 सीटों पर जीत हासिल की और भाजपा को 20 सीटों का नुकसान हुआ और 18 सीटें उसके पास बचीं. दो सीटें एनसीपी और एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई. उत्तरी गुजरात और सौराष्ट में भाजपा के पास अधिकतम सीटें हैं. इसलिए इन क्षेत्रों में इससे आगे बढ़ने की गुंजाइश अब नहीं है. पार्टी ने सूझबूझ नहीं दिखाई तो इन क्षेत्रों में वह नीचे भी जा सकती है लेकिन अगर मध्य गुजरात को मोदी ने ठीक से साध लिया तो फिर उन्हें सरकार बनाने में बहुत दिक्कत नहीं होगी.’ इस बार गुजरात विधानसभा चुनाव नए परिसीमन के आधार पर हो रहा है. 60 से अधिक सीटों के क्षेत्रों में फेरबदल हुआ है.

 

नरोदा पटिया मामले में पूर्व मंत्री माया कोडनानी को जेल होने से मोदी की सरकार पर एक धब्बा लगा है. इस बारे में गांधीवादी कार्यकर्ता और अहमदाबाद में महिलाओं के बीच काम करने वाली नीता बेन कहती हैं, ‘इससे गुजरात सरकार के बारे में काफी कुछ पता चलता है. लेकिन मोदी इस मामले का भी फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं. वे अब यह कह रहे हैं कि जो भी गलत लोग हैं, मैं उन्हें सजा दिलवा रहा हूं इसलिए मुझे वोट दो. यही कह-कहकर वे अब मुसलमानों का वोट भी अपनी तरफ आकर्षित करना चाह रहे हैं. वे मुसलमानों को 2002 भूलकर आगे बढ़ने की सलाह दे रहे हैं.’

 

गुजरात में मुसलमानों की आबादी करीब दस फीसदी है और इनके 87 समुदाय हैं. अहमदाबाद, कच्छ और भरूच जैसे इलाकों में मुस्लिम आबादी 16-17 फीसदी है. गुजरात के मुसलमानों में कुछ वर्ग ऐसे भी हैं जो मोदी के पक्ष में मतदान करते हैं. यह ऐसा वर्ग है जो कारोबार में है. इनमें बोहरा, अगाखानी और मेमन प्रमुख हैं. बोहरा मोदी का समर्थन इसलिए भी करते हैं कि उनके नेता सैय्यदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन ने हाल ही में मोदी को समर्थन देने की घोषणा की. बाकी के बारे में कहा जाता है कि वे मोदी का विरोध करते हैं. मोदी मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं और इसलिए लगातार उनके आयोजनों में जा रहे हैं. जानकार बताते हैं कि मोदी अपने मिशन प्रधानमंत्री को ध्यान में रखकर यह काम कर रहे हैं. उनकी योजना यह है कि गुजरात चुनाव जीतने के बाद प्रदेश के मुसलमानों को देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजकर यह संदेश दिलवाया जाए कि मोदी राज में मुसलमान बेहद सुरक्षित हैं. गुजरात में मोदी को लेकर संघ और विश्व हिंदू परिषद की नाराजगी की एक वजह यह भी है जो मोदी के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है.

 

 ‘मोदी को पता है कि संघ की अहमियत क्या है. वे खुद संघ की डोर पकड़कर ही आगे बढ़े हैं. यही वजह है कि जब गुजरात संघ ने मोदी का विरोध करने और केशुभाई के समर्थन का फैसला किया तो मोदी इसकी शिकायत सरसंघचालक मोहनराव भागवत से करने नागपुर पहुंचे. लेकिन वहां मोदी को यह साफ-साफ कह दिया गया कि राजनीति को छोड़कर अन्य सभी विषयों पर हम लोग बातचीत कर सकते हैं’ संघ के एक पदाधिकारी कहते हैं,, ‘हिंदुओं के हितैषी होने का मोदी का पाखंड लोग समझ चुके हैं. जितने मंदिर मोदी के राज में टूटे उतने पहले कभी नहीं टूटे. मोदी के राज में जिस तरह से गौहत्या बढ़ी उसने साबित किया कि हिंदुत्व के मसलों को लेकर वे कितने गंभीर हैं. गौचर भूमि लेकर उद्योगपतियों को देने का काम सबसे अधिक मोदी ने किया. अब मुसलमानों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं. मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के लिए गौहत्या के खिलाफ कानून के क्रियान्वयन में ढील दे दी गई. गौ-मांस कारोबार में लगे कारोबारियों को मोदी सरकार ने खुली छूट दे दी. इस वजह से अहमदाबाद और पूरे गुजरात में गायों की चोरी बढ़ी.’

 

संघ के प्रांत प्रचारक रहे लालजी भाई पटेल कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी ने हर जगह से लीडरशीप को खत्म किया. इसके लिए उन्होंने लागवग की पद्धति अपनाई. इसका मतलब यह होता है कि पैसे और पैरवी को आधार बनाकर काम करना. मोदी ने संघ के सभी संगठनों को बर्बाद करने की कोशिश की. संघ के विचारों की बार-बार अवहेलना की. जिस रास्ते बढ़े, उसी रास्ते को बर्बाद करने लगे.’ वे आगे कहते हैं, ‘जितनी गौहत्या नरेंद्र मोदी के समय में गुजरात में हुई उतनी पहले कभी नहीं हुई.’

 

संघ के पदाधिकारियों के मुताबिक आज गुजरात में जिस संघ और उसके सहयोगी संगठनों की कब्र खोदने का काम मोदी कर रहे हैं, कभी उस संघ की डोर पकड़कर मोदी आज इस ऊंचाई तक पहुंचे हैं. संघ कार्यकर्ता के तौर पर काफी छोटी उम्र से संघ के जिस पदाधिकारी के घर नरेंद्र मोदी का आना-जाना रहा है, वे बताते हैं, ‘संघ में मोदी का उभार बहुत निचले स्तर से हुआ है. बचपन में बाल स्वयंसेवक के तौर पर संघ के साथ जुड़ने वाले मोदी अहमदाबाद में संघ कार्यालय के सामने चाय बेचते थे. संघ की अपनी पृष्ठभूमि और चाय बेचने के क्रम में संघ के कुछ पदाधिकारियों से बने संपर्क के आधार पर मोदी संघ कार्यालय में काम करने लगे. यहां मोदी ने खाना बनाने से लेकर पोंछा लगाने तक का काम भी किया. बाद में उन्होंने संघ के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और तरक्की करते गए. 1987 में संघ ने उन्हें सीधे तौर पर राजनीतिक कार्य में लगाया. उन्हें गुजरात में संगठन मंत्री बनाया गया. यानी संघ और भाजपा के बीच सामंजस्य की जिम्मेदारी मोदी को दी गई.’ वे कहते हैं, ‘1991 में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा के संयोजन की जिम्मेदारी नरेंद्र मोदी को दी गई. यह केंद्र में मोदी की पहली जिम्मेदारी थी. बाद में उन्हें पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर का प्रभारी बना दिया गया. जब 2001 में भाजपा दो उपचुनाव और स्थानीय निकायों के चुनाव हार गई तो इसके लिए केशुभाई पटेल को जिम्मेदार ठहराकर नरेंद्र मोदी को 7 अक्टूबर, 2001 को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया.’

 

इस बार के चुनाव में नरेंद्र मोदी को केशुभाई पटेल भी अपनी नई पार्टी जीपीपी के जरिए चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं. उनके साथ मोदी सरकार में गृह मंत्री रहे गोर्धन जडाफिया, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री एके पटेल भी हैं. इनके अलावा भी जीपीपी में कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने कभी-न-कभी गुजरात की राजनीति में अहम भूमिका निभाई है. लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या गुजरात की जनता 84 साल के केशुभाई पटेल में भरोसा दिखाकर उनकी पार्टी को वोट देगी. पीटीआई के लिए अहमदाबाद में काम कर रहे संजीव पांडेय कहते हैं, ‘पटेलों के बीच केशुभाई का प्रभाव तो है लेकिन यह वोट में कितना तब्दील होगा, यह कहना अभी मुश्किल है. गुजरात में भाजपा के उभार के लिए केशुभाई को जिम्मेदार माना जाता है और उनके समय में पटेल बहुल सीटों में से अधिकांश पर भाजपा जीती है. लेकिन भाजपा से अलग होने के बाद पटेल कितना उनके साथ रहते हैं, यह देखना अभी बाकी है.’ ब्रजेश कुमार सिंह कहते हैं, ‘गुजरात में पटेल दो हिस्सों में बंटे हुए हैं. लहुआ और करुआ. इनमें से लहुआ प्रभावी हैं और इनके बीच केशुभाई का प्रभाव है. लेकिन अब तक यह देखा गया है कि ये उसे ही वोट देते हैं जो जीत रहा होता है. ऐसे में कहना मुश्किल है कि ये केशुभाई के उम्मीदवारों के लिए ही वोट करेंगे. क्योंकि ऐसी कम सीटें होंगी जहां इन्हें लगेगा कि केशुभाई के उम्मीदवार जीत हासिल कर सकते हैं.’

 

‘केशुभाई की जनसभाओं में काफी भीड़ उमड़ रही है. अहमदाबाद की सभा में डेढ़ लाख से अधिक लोग थे. सूरत और राजकोट की सभा में भी बड़ी संख्या में लोग आए थे. गांवों में भी उनकी काफी स्वीकृति है. युवाओं की अच्छी-खासी संख्या भी उनकी सभाओं में आ रही है. युवाओं के आकर्षण का एक बड़ा कारण यह भी है कि जीपीपी ने बड़ी संख्या में युवाओं को टिकट दिए हैं’ वासुदेव पटेल दावा करते हैं, ‘भाजपा और कांग्रेस केशुभाई के बारे में कुछ नहीं बोल रही हैं. उन्हें पता है कि अगर वे एक शब्द भी केशुभाई के खिलाफ बोलेंगे तो गुजरात के लोग एक तरफ होकर केशुभाई के लिए वोट करेंगे. क्योंकि लोगों में केशुभाई की काफी प्रतिष्ठा है. उन्होंने प्रदेश के आम लोगों के लिए काफी काम किया है.’

 गुजरात की राजनीति को जानने-समझने वाले लोग यह मानते हैं कि कई चुनावों के बाद इस बार कांग्रेस भी गंभीर दिख रही है और उसे लग रहा है कि वह मोदी को सत्ता से बेदखल कर सकती है. अगर इस बार भी भाजपा गुजरात में जीतती है तो यह प्रदेश विधानसभा में भाजपा की लगातार पांचवी जीत होगी. गुजरात कुछ वैसा ही बन गया है जैसा वाम दलों के लिए कभी पश्चिम बंगाल बन गया था. प्रदेश में ऐसी 58 सीटें हैं जिन्हें भाजपा लगातार चार बार से जीत रही है. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती इसी किले में सेंध लगाने की है. हेमंत कुमार शाह कहते हैं, ‘कांग्रेस इस बार जोर लगा रही है. उसे भी यह महसूस हो रहा है कि कुछ समय पहले तक मोदी के खिलाफ एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं रहने वाले लोग आज मोदी के खिलाफ बात कर रहे हैं और मोदी का मजाक उड़ा रहे हैं. इसलिए अगर जोर लगाया जाए तो बात बन सकती है.’ वे कहते हैं, ‘कांग्रेस इतनी सीटें तो नहीं ला पाएगी कि वह सरकार बना पाए लेकिन कांग्रेस और जीपीपी मोदी को बहुमत से पहले रोक सकते हैं. मुझे लगता है कि गुजरात विधानसभा चुनाव त्रिकोणीय संघर्ष की ओर बढ़ रहा है और किसी को बहुमत नहीं मिलने वाला है.’ हालांकि, अर्जुन मोढवाडिया यह दावा करते हैं कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनेगी. लेकिन जानकारों के मुताबिक खुद कांग्रेस ने जो आंतरिक सर्वेक्षण करवाया है उसमें प्रदेश में कांग्रेस को 182 में से 57 सीटें मिलने की उम्मीद जताई गई है.

 कांग्रेस दो मामलों में कमजोर दिख रही है. पहली बात तो यह कि मोदी सरकार की नाकामियों को वह सही ढंग से नहीं उठा पा रही है और दूसरा टिकट बंटवारे को लेकर कांग्रेस में बगावत का माहौल हकांग्रेस दो मामलों में कमजोर दिख रही है. पहली बात तो यह कि मोदी सरकार की नाकामियों को वह सही ढंग से नहीं उठा पा रही है और दूसरा टिकट बंटवारे को लेकर कांग्रेस में बगावत का माहौल है. इस बारे में कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता मनीष दोषी कहते हैं, ‘कांग्रेस मोदी की आक्रामकता के सामने लोकतांत्रिक मूल्यों को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है. मोदी प्रचार पर अनाप-शनाप पैसा खर्च कर रहे हैं. हम ऐसा नहीं करना चाहते. हम गांव-गांव और छोटी जगहों पर जाकर छोटी सभाओं के जरिए लोगों को समझा रहे हैं कि मोदी ने किस तरह से लोगों को ठगने का काम किया है.’ वे कहते हैं, ‘हम जनता के बीच लगातार काम कर रहे हैं. कांग्रेस ने कई यात्राएं निकाली हैं. हिसाब दो, जवाब दो यात्रा के जरिए भाजपा सरकार से हिसाब मांगा गया. सरदार संदेश यात्रा के जरिए कांग्रेस ने खुद को सरदार वल्लभ भाई पटेल से जोड़ने की कोशिश की. आदिवासी अधिकार यात्रा से आदिवासियों के अधिकारों के मसले को उठाया. किनारो बचाओ यात्रा के जरिए मछली पालन करने वालों के मुद्दों को कांग्रेस ने उठाया.’

 टिकट बंटवारे को लेकर उपजे असंतोष के बारे में अर्जुन मोडवाडिया कहते हैं, ‘हमारे पास हर सीट पर एक से ज्यादा अच्छे उम्मीदवार हैं. इसलिए संघर्ष स्वाभाविक है. लेकिन यह कुछ दिनों की बात है. सब मिलकर लड़ेंगे और चुनाव जीतेंेगे.’ कई संभावित उम्मीदवारों और उनके समर्थकों द्वारा प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में घुसकर प्रदेश के प्रमुख कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाने को मनीष दोषी आंतरिक लोकतंत्र का प्रकटीकरण बताते हैं. वे कहते हैं, ‘आपसे जब मैं बातचीत कर रहा था उसी वक्त बारी-बारी से दो असंतुष्ट नेता अपने समर्थकों के साथ नारेबाजी करते हुए आए. लेकिन आपने देखा कि मैंने उन्हें समझाया. चाय-नाश्ता कराके विदा कर दिया. कांग्रेस में हर किसी की बात सुनी जाती है और इससे पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का पता चलता है. इससे पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा.’

 लेकिन प्रदेश के भावनगर जिले की बोटाद सीट से टिकट मांग रहे मनहर पटेल मानते हैं कि इससे प्रदेश में कांग्रेस की संभावनाओं पर बुरा असर पड़ेगा. वे कहते हैं, ‘पहले चरण में जिन 58 सीटों पर चुनाव होना है उनमें से 15 सीटों पर असंतुष्ट हैं. इनमें जूनागढ़, लिमड़ी, पालितामा, सुरेंद्र नगर खास, दोराजी, केशोड़, तलाला, जामखमारिया प्रमुख हैं. कांग्रेस ने अगर इस पर ध्यान नहीं दिया तो सीटें बढ़ने के बजाय घट सकती हैं और इसका फायदा केशुभाई को मिल सकता है.’ वे कहते हैं, ‘मैं पिछले तीन चुनावों से टिकट मांग रहा हूं. लेकिन मेरी सीट पर राजकोट के सांसद कुंवरजी बावलिया को टिकट दे दिया गया. वे कोली हैं जबकि यहां से अक्सर पटेल ही जीतता है. फिर भी कांग्रेस ने मुझे टिकट नहीं दिया. ऐसे समीकरणों को दरकिनार करके कांग्रेस ने कई सीटों पर टिकट बांटे हैं.’

 

मानव विकास के मामले में नाकामी, केशुभाई की चुनौती, संघ व सहयोगी संगठनों की नाराजगी और कांग्रेस के पूरा जोर लगाने के बावजूद अगर मोदी पूरी तरह से जीत जाते हैं तो फिर इसका क्या मतलब निकाला जाए? क्या यह कि मोदी के विकास के मॉडल को ही गुजरात की जनता पसंद करती है? या फिर मानव विकास का चुनावी राजनीति में कोई महत्व नहीं है? इस बारे में हेमंत कुमार शाह कहते हैं, ‘अगर मोदी फिर से जीतकर आ जाते हैं तो इसका मतलब यह निकला जाना चाहिए कि मोदी ने जिस तरह से विकास की चकाचौंध पैदा की है उससे यहां के लोगों की आंखें चुंधिया गई हैं. लोग मोदी के मायाजाल में फंस गए हैं.’ इस बारे में इला पाठक कहती हैं, ‘मैं गुजरात विरोधी करार दिए जाने के जोखिम के बावजूद यह कहना चाहूंगी कि यहां के लोग हल्की बातों को पसंद करते हैं. मोदी ने जब शशि थरूर की पत्नी के बारे में बयान दिया तो यहां के लोगों ने उसे खूब पसंद किया. जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था. वहीं यहां के लोग ऐसे व्यक्ति को पसंद करते हैं जो उनके अंदर सुरक्षा का भाव पैदा करे. गुजरात के कारोबारी वर्ग को लगता है कि मोदी रहेंगे तो वे सुरक्षित रहेंगे. इसलिए संभव है कि वे इस बार भी जीत जाएं लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं निकाला जाना चाहिए कि वे विकास पुरुष हैं या उनके राज में गुजरात काफी तरक्की कर रहा है.’ 

प्रचार का मोदी स्टाइल

नरेंद्र मोदी के जनसंपर्क का काम अमेरिकी एजेंसी एप्को वर्ल्डवाइड करती है. वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन को सफलतापूर्वक कराने की वजह से इसे अब तक दो अंतरराष्ट्रीय अवार्ड मिल चुके हैं. इस एजेंसी ने मोदी को विकास पुरुष के तौर पर स्थापित करने के लिए जरूरी सारे कदम उठाए. इसी अमेरिकी कंपनी ने बराका ओबामा के पहले चुनाव में उनके प्रचार का काम संभाला था. इसके अलावा और भी दुनिया के कई नेताओं के चुनाव प्रचार का काम यह संभाल चुकी है. चुनाव प्रचार के मामले में मोदी को हाईटेक बनाने के पीछे भी इसी एजेंसी की भूमिका बताई जाती है. 3-डी चुनाव प्रचार का आइडिया भी इसी एजेंसी का था. गूगल प्लस से लेकर तमाम सोशल नेटवर्किंग साइटों पर मोदी को मजबूती देने की रणनीति भी इसी एजेंसी के रणनीतिकारों के दिमाग की उपज मानी जा रही है. हालांकि, इस बार मोदी का 3-डी प्रयोग सफल नहीं रहा है. गूगल प्लस पर अजय देवगन के साथ चैट-शो के दौरान भी कई तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था.

 

गुजरात चुनाव कवर करने वाले कई स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि मोदी के इस बार के प्रयोगों को लेकर जनता में उतना उत्साह नहीं है. वे यह भी बताते हैं कि 2007 में मोदी का मुखौटे का प्रयोग बेहद सफल रहा था. उस वक्त भाजपा के उम्मीदवार भी मोदी मुखौटा पहनकर ही चुनाव प्रचार करते थे. इसके जरिए मोदी ने संदेश दिया था कि चुनाव कोई उम्मीदवार नहीं बल्कि खुद वे लड़ रहे हैं. इसका परिणाम अच्छे चुनावी नतीजों के रूप में सामने आया था. कुछ लोग यह मानते हैं कि प्रचार के नए-नए तरीके तलाशना मोदी की मजबूरी है क्योंकि मुख्यधारा का मीडिया दंगों के बाद से लगातार उनके खिलाफ हमलावर रहा है इसलिए अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्हें नए तौर-तरीकों की जरूरत रही है. मुखौटे जैसे सफल प्रयोग मोदी ने किए भी हैं. भले ही इस बार 3-डी और गूगल प्लस का मोदी का प्रयोग उतना सफल नहीं हुआ हो लेकिन इसी बहाने मोदी दो-तीन दिन तक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मीडिया में छाए रहे. मोदी के इन प्रयोगों को भले ही अपेक्षित सफलता नहीं मिली हो लेकिन नमो टीवी को औसत सफलता जरूर मिली है. इसे गुजरात के लोग भी देख रहे हैं और खास तौर पर गुजरात के बाहर और देश के बाहर रहने वाले लोग इसके जरिए मोदी के भाषणों को सुन पा रहे हैं.

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