Posted by: Bagewafa | جنوری 1, 2013

सारा शहर ग़रीब का है…… गौहर अमरोहवी گوہر امروہوی …… سارا شہر غریب کا ہے

Gareeb ka hai

सारा शहर ग़रीब का है…… गौहर अमरोहवी

 

जो उन के हाथ में दामन मेरे रक़ीब का है
किसी से क्या कहूं लिखा मेरे नसीब का है

 

उमर भर तै नहीं हो पाया वापसी का सफ़र
यूँ देखने में तो एक  फ़ासिला जरीब का है

 

हमेशा दूर वो महफ़िल में मुझसे बैठा है
वो जिस से दिल का रिश्ता बहुत क़रीब का है

 

बस एक घर के बनाने की जगह मिल ना सकी
सड़क पे सोने को सारा शहर ग़रीब का है

 

मुसाफ़िरों की तरह फिरता हूँ देस बदीस
ये फ़ैसला मेरा नहीं मेरे नसीब का है

 

वो जिसके इशक़ मैन बीमार पड़ा है गौहर
सामने घर मेरे पड़ता इसी तबीब का है।

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زمرے

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