Posted by: Bagewafa | جنوری 7, 2013

दस में से नौ भारतीय अप्रवासी हैं___एल.एस.हरदेनिया

Apravasi-l.s.hardeniyaदस में से नौ भारतीय अप्रवासी हैं___एल.एस.हरदेनिया

भारत अप्रवासियों का देश है. यहां के मूल निवासी उनके पूर्वज थे, जिन्हें हम आज आदिवासी कहते हैं. इस समय आदिवासी भारत की आबादी का 8 प्रतिशत हैं अर्थात 92 प्रतिशत भारतवासी बाहर से आकर यहां बसे हैं. वे आज से लगभग 10 हज़ार वर्ष पहले उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व से आए थे. औद्योगिक क्रांति के पहले पूरी दुनिया में कृषि मुख्य व्यवसाय था. उस समय भारत कृषकों का स्वर्ग था. यहां कृषि के लिए उपयुक्त वातावरण एवं संसाधन मौजूद थे. इसलिए चारों ओर से लोग भारत में बसने आए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े इतिहासकारों की यह मान्यता है कि आर्य भारत के मूल निवासी हैं और वे बाहर से नहीं आए हैं. अपने इस दृष्टिकोण को सही साबित करने के लिए वे आदिवासियों को वनवासी कहते हैं. उन्हें वनवासी कहकर वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि आर्य ही यहां के मूल निवासी हैं और आज के हिंदू आर्यों की संतान हैं. दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों का मत है कि आर्य मध्य यूरोप से भारत आकर बसे थे. लोकमान्य तिलक का तो यहां तक कहना था कि आर्यों का मूल निवास उत्तरी धु्रव था. यह विवाद लंबे समय से जारी है, परंतु पहली बार इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी राय प्रगट की है. बीती पांच जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा है कि आर्यों के आने के पूर्व जो लोग भारत में निवास करते थे, आज के आदिवासी उन्हीं की संतान हैं.

खंडपीठ ने इतिहास के अनछुए पहलुओं का सहारा लेते हुए यह दावा किया है कि वास्तव में हमारा देश अप्रवासियों का देश है. हमारे देश की 92 प्रतिशत आबादी अप्रवासियों की संतान है और मात्र आठ प्रतिशत भारतीय 10 हज़ार वर्षों से अधिक समय से भारतीय उप महाद्वीप में रह रहे हैं. पिछले हज़ारों सालों में विश्व के अनेक हिस्सों से लोग यहां आए और बस गए.

सर्वोच्च न्यायालय ने यह राय महाराष्ट्र हाईकोर्ट के एक निर्णय को रद्द करते हुए प्रगट की. इस मामले से यह भी ज़ाहिर होता है कि हम आदिवासियों से किस तरह का व्यवहार करते हैं. इस मामले का संबंध एक भील महिला से है, जिसका नाम नंदबाई है. इस महिला को नंगा किया गया, बुरी तरह पीटा गया और फिर गांव में घुमाया गया. इस महिला पर यह आरोप था कि उसके एक उच्च जाति के पुरुष से अवैध संबंध थे. जिन लोगों ने उसके साथ यह व्यवहार किया था, उन्हें ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश, अहमदनगर ने दोषी पाया और सज़ा सुनाई. सज़ा जिन धाराओं के अंतर्गत सुनाई गई, उनमें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम भी शामिल था. जब मामले की अपील हाईकोर्ट में हुई तो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति क़ानून के अंतर्गत दी गई सजा रद्द कर दी गई, यद्यपि अन्य धाराओं के अंतर्गत सुनाई गई सज़ा यथावत रखी गई. उसके बाद यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में आया. सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्तिद्वय मार्कंडेय काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा शामिल थे, ने न स़िर्फ हाईकोर्ट द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति क़ानून के अंतर्गत दी गई सज़ा को रद्द किया जाना ग़लत बताया, वरन्‌ इसके साथ ही भारत के मूल निवासी कौन थे, इस विषय पर अपना मत भी व्यक्त किया. निर्णय में कहा गया है कि आज के आदिवासी ही भारत के मूल निवासियों की संतान हैं. इस तथ्य के बावजूद उनके साथ सदियों से मानवोचित सुलूक नहीं किया जा रहा है. खंडपीठ ने इतिहास के अनछुए पहलुओं का सहारा लेते हुए यह दावा किया है कि वास्तव में हमारा देश अप्रवासियों का देश है. हमारे देश की 92 प्रतिशत आबादी अप्रवासियों की संतान है और मात्र आठ प्रतिशत भारतीय 10 हज़ार वर्षों से अधिक समय से भारतीय उप महाद्वीप में रह रहे हैं. पिछले हज़ारों सालों में विश्व के अनेक हिस्सों से लोग यहां आए और बस गए. इसी कारण हमारे देश में अनेक धर्मों के मानने वाले, अनेक भाषाएं बोलने वाले, अनेक प्रकार के खानपान और वेशभूषा वाले लोग रह रहे हैं. भाषाओं और अन्य प्रतीकों के आधार पर खंडपीठ ने माना कि बाहर से आए अप्रवासियों के आक्रमणों और अन्य कारणों से भारत के उक्त मूल निवासी जंगलों और पहाड़ों में सिमटने पर मजबूर हो गए. भारत के ये मूल निवासी अब मुख्यत: झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं. खंडपीठ ने अपने निर्णय में इस बात पर जोर दिया है कि भारत की नस्लीय, जातीय, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं भाषायी विभिन्नताओं ने हम पर एक गंभीर उत्तरदायित्व डाल दिया है. वह उत्तरदायित्व है विभिन्नताओं के बावजूद देश को एक बनाए रखने का. इस कठिन चुनौती का सामना करने में हमारे संविधान निर्माता काफी सहायक बन पड़े हैं. हमारा संविधान सभी धार्मिक समूहों, विभिन्न भाषा-भाषियों को समान अधिकार देता है और उनके अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है, परंतु सिद्धांत में सभी को बराबरी का दर्जा देना यथेष्ट नहीं है. उन समूहों को, जो पहले से ही अभावों का जीवन जी रहे हैं, विशेष संरक्षण और सहायता की जरूरत है. तभी वे ग़रीबी और असमान सामाजिक परिस्थितियों से ऊपर उठ सकेंगे. इसलिए संविधान में इस तरह के समूहों को विशेष अधिकार दिए गए हैं. इनमें आदिवासी शामिल हैं, जो भारत के मूल निवासियों की संतान हैं. वे सदियों से ग़रीबी और अभाव की ज़िंदगी जी रहे हैं. उनमें से अधिकांश आज भी निरक्षर हैं और कुपोषण एवं अज्ञानता के चलते बीमारियों की गिरफ्त में जल्दी आ जाते हैं. अन्य लोगों की तुलना में उनकी मृत्यु दर भी ज़्यादा है.

इसलिए वे सब, जो इस देश से मोहब्बत करते हैं और जो इसकी बेहतरी चाहते हैं, उनका कर्तव्य है कि वे आदिवासियों के उन्नयन में सहयोग करें. सब मिलकर यह सुनिश्चित करें कि आदिवासी आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से देश के अन्य नागरिकों के स्तर तक पहुंच सकें. हमें यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि वे सदियों से शोषण और अन्य प्रकार की ज़्यादतियों के शिकार रहे हैं. उनके प्रति हमारे रवैये में परिवर्तन आना चाहिए. हमें उनका पूरा आदर और सम्मान करना चाहिए, क्योंकि वे हमारे पूर्वज हैं. हमने आदिवासियों के साथ जो अन्याय किया है, वह हमारे देश के इतिहास का सर्वाधिक शर्मनाक अध्याय है. एक समय था, जब इन आदिवासियों को हम राक्षस या असुर कहते थे. हमने इनकी हत्याएं कीं और जो बचे, उन पर हर संभव अत्याचार किए. हमने उनकी ज़मीनें छीनीं और उन्हें जंगलों में खदेड़ दिया, जहां वे अत्यधिक कठिन परिस्थितियों में जीवनयापन करते हैं. अब हम औद्योगीकरण के नाम पर उनसे जंगल भी छीन रहे हैं और उन्हें अभावों के गर्त में ढकेल रहे हैं.

निर्णय में आदिवासियों के साथ नारकीय व्यवहार के उदाहरण स्वरूप एकलव्य का उल्लेख किया गया है. द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य के साथ क्रूर व्यवहार किया गया. पहले तो द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से इंकार कर दिया, परंतु जब वह द्रोणाचार्य की मूर्ति के सहारे धनुर्विद्या में पारंगत हो गया तो द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा स्वरूप एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया. भोले भाले एकलव्य ने उन्हें अपना अंगूठा गुरु दक्षिणा के रूप में दे दिया. इस तरह द्रोणाचार्य ने एकलव्य को अपंग बना दिया. द्रोणाचार्य ने अंगूठा इसलिए मांगा, क्योंकि उन्हें लगा कि एकलव्य अर्जुन से श्रेष्ठ धनुर्धर बन गया है. निर्णय कहता है कि उस समय से लेकर आज तक हम इन लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार कर रहे हैं.

खंडपीठ द्रोणाचार्य के व्यवहार को शर्मनाक बताते हुए कहती है कि जब द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शिक्षा दी ही नहीं थी तो उन्हें उससे गुरु दक्षिणा मांगने का क्या अधिकार था. उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इतनी ज़्यादतियां सहने के बावजूद आदिवासियों ने अपना उच्च नैतिक स्तर क़ायम रखा है. वे साधारणत: किसी को धोखा नहीं देते, झूठ नहीं बोलते और ऐसे अनैतिक कार्य नहीं करते, जो ग़ैर आदिवासियों में आम हैं. इसके बावजूद वे आज तक ज़्यादतियों के शिकार हैं. यह मामला, जिसमें हर संबंधित व्यक्ति ने आदिवासी विरोधी रवैया अपनाया, इसी तरह के व्यवहार का प्रतीक है. हमें यह रवैया बदलना होगा. यदि हम ऐसा करते हैं तो यह देशहित में होगा.

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