Posted by: Bagewafa | جنوری 11, 2013

हिज्र की शब है और उजाला है …. ख़ुमार बाराबंकवी

 

हिज्र की शब है और उजाला है …. ख़ुमार बाराबंकवी

हिज्रकी शब है और उजाला है

क्या तसव्वुर भी लुटने वाला है

 

ग़म तो है ऐन ज़िन्दगी लेकिन

ग़मगुसारों ने मार डाला है

 

इश्क़ मज़बूर-ओ-नामुराद सही

फिर भी ज़ालिम का बोल-बाला है

 

देख कर बर्क़ की परेशानी

आशियाँ ख़ुद ही फूँक डाला है

 

कितने अश्कों को कितनी आहों को

इक तबस्सुम में उसने ढाला है

 

तेरी बातों को मैंने ऐ वाइज़

एहतरामन हँसी में टाला है

 

मौत आए तो दिन फिरें शायद

ज़िन्दगी ने तो मार डाला है

 

शेर नज़्में शगुफ़्तगी मस्ती

ग़म का जो रूप है निराला है

 

लग़्ज़िशें मुस्कुराई हैं क्या-क्या

होश ने जब मुझे सँभाला है

 

दम अँधेरे में घुट रहा है "ख़ुमार”

और चारों तरफ उजाला है

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زمرے

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