Posted by: Bagewafa | فروری 5, 2013

प्रो. सरन घई, संस्थापक, विश्व हिंदी संस्थान, कनाडाकी चार कविताएं

प्रो. सरन घई, संस्थापक, विश्व हिंदी संस्थान, कनाडाकी चार कविताएं

 

 

दामिनी

 

तसल्लियों की नींद से जगाकर

सदियों सजी सेज से उठाकर

याद हमें फ़र्ज की कराकर

जाने कहाँ खो गई

दामिनी खफ़ा हो गई

 

पाठ सभ्यता का पढ़ा कर

अलख नैतिकता का जगा कर

मशाल रोशनी की जगमगाकर

गहरी नींद जा के सो गई

!दामिनी जुदा हो गई

 

स्वयं को दु:खों में तपाकर

राह नयी ज्ञान की सुझाकर

समाज को दिशा नई दिखाकर

क्रांति का सामान हो गई

!दामिनी महान हो गई

 

कानून के महत्व को समझाकर

नैतिकता का मार्ग सिखलाकर

सत्य की मशाल को जगाकर

शक्ति की पहचान हो गई

!दामिनी कुर्बान हो गई

 

राह नयी सत्य की सुझाकर

अहसास कर्त्तव्य का जगाकर

विश्व को दिशा नई दिखाकर

जाने किस दिशा में खो गई

!दामिनी वितान हो गई

 

दुनिया केवल पैसे की

 

ऐसे की ना वैसे की, ये दुनिया केवल पैसे की।

ना कीमत है इसे धर्म की,

ना कीमत है इसे कर्म की,

इसको तो परवाह है केवल बिरला, टाटा जैसे की।

ना साधू ना जोगी पुजता,

ना ईश्वर ना अल्ला रुचता,

यहाँ तो केवल जय-जय होती ठन-ठन बजते पैसे की।

समाचार ना लेख सुहाते,

ना गीता ना वेद ही भाते,

यहाँ लोग लिटरेचर पढ़ते फ़िल्मी मैटर जैसे की।

ना सब्जी, ना दाल, ना रोटी,

ना भाती अब बाटी मोटी,

इनको लगती भूख पास्ता, ताको, बर्गर जैसे की।

प्रवचन और उपदेश ना भाएँ,

भजन-कीर्तन से घबराएँ,

ये तो थिरकें डिस्कोथिक में लगी हो मिर्ची जैसे की।

ना माँ-बाप, ना भाई-बहिनें,

ना साड़ी, ना कपड़े-गहने,

अब तो पहनें जींस फटी, पहनें भिखमंगे जैसे की।

अच्छी बातें नहीं सुनेंगे,

जीवन में गुण नहीं गुनेंगे,

पढ़ेंगे कविताएँ फ़िजूल कवि ’सरन घई’ के जैसे की।

कैसा ’सरन’ जमाना होगा

कैसा ’सरन’ जमाना होगा,

जब आयेगा उतर स्वर्ग धरती पर क्या अफ़साना होगा,

कैसा ’सरन’ जमाना होगा।

 

होगी तब मुस्कान हर एक चेहरे पर जैसे पुष्प विहंसते,

भृकुटी न होगी तनी कोई सब लोग मिलेंगे हँसते-हँसते,

बेखटके बिन रोक-टोक तब मिलना और मिलाना होगा,

कैसा ’सरन’ जमाना होगा।

 

इक दूजे के त्योहारों को तब मनायेंगे सब मिलजुल कर,

नाचेंगे-गायेंगे और ठुमके लगायेंगे ताल मिलाकर,

प्यार की सुमधुर तानों का वो बिलकुल नया तराना होगा,

कैसा ’सरन’ जमाना होगा।

 

भेदभाव धर्मों के जग में लेशमात्र भी नहीं रहेंगे,

हरेक जाति के लोग जमा हर जगह दिखाई साथ में देंगे,

साथ-साथ में सब लोगों का रलमिल पीना-खाना होगा,

कैसा ’सरन’ जमाना होगा।

 

भूरे, काले और सफ़ेद मानव-मानव में फ़र्क न होंगे,

जैसे रंग लहू का इकसा, वैसे ही सब लोग बनेंगे,

तन के रंगों से ज्यादा तब मन का रंग सुहाना होगा,

कैसा ’सरन’ जमाना होगा।

 

सारा विश्व एक जुट होगा, नहीं रहेंगी तब सीमाएँ,

सब को होगी छूट, कहीं भी रहें, कहीं भी जाएँ,

राष्ट्र-राष्ट्र का नहीं, विश्व का क़ौमी एक तराना होगा,

कैसा ’सरन’ जमाना होगा।

 

ऐसा सचमुच संभव होगा, देखें और देखते जाएँ,

’सरन’ बनेगा स्वर्ग यहीं, बस थोड़े से बादल हट जाएँ,

कल सुबहा नवसूर्यरश्मी ने लिखा नया फ़साना होगा,

कैसा ’सरन’ जमाना होगा।

 

 

जनवरी

नव वर्ष की नव प्रात: का उपहार जनवरी,

नवयौवना के स्पर्ष का उन्माद जनवरी।

बारहखड़ी के ’अ’ सी है प्रथमाक्ष जनवरी,

रुद्राक्षों में इक मुखी रुद्राक्ष जनवरी।

कोमल सी ठंड, खुश्की का अहसास जनवरी,

षोडषी अंगड़ाई का नि:श्वास जनवरी।

चुभते बिनौले पर गुंथी कपास जनवरी,

व्याकुल हृदय की टीस का आभास जनवरी।

शीतल बयार, चांदनी और प्रियतमा का संग,

होठों के पास होठों को लाती है जनवरी।

ग़र सर्दियों की चुभन दिलाता है दिसंबर,

तो गर्मियों की गूंज सुनाती है जनवरी।

जीवन कभी बसंत कभी मौसमी पतझड़,

ऋतुओं के कितने रूप दिखाती है जनवरी।

लो बीत गया जैसे भी बीता पुराना वर्ष,

स्वागत करो नववर्ष का कहती है जनवरी।

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