Posted by: Bagewafa | اپریل 10, 2013

एक दूसरे हीरो की तलाश……एम. जे. अकबर

एक दूसरे हीरो की तलाश……एम. जे. अकबर

हम शुरुवात से काफी दूर निकल आये हैं. 2009 में जब मनमोहन सिंह पुनर्निर्वाचित हुए, तो जो पहला काम उन्होंने किया वह राहुल गांधी को अपनी कुर्सी सौंपने की पेशकश थी. यह घोषणा सार्वजनिक तौर पर प्रेस कांफ्रेस के जरिए की गयी. इस बात को उन्होंने तब से बार-बार दोहराया है. पांच साल बाद राहुल गांधी यह सवाल टाल रहे हैं और प्रधानमंत्री अपनी तीसरी पारी को लेकर दार्शनिक बयान दोहराने लगे हैं.

अब जब हम एक और चुनावी मौसम में दाखिल हो रहे हैं, तो कांग्रेस में संभावित प्रधानमंत्री को लेकर विपरीत बयानबाजी ने विपक्ष की एक महत्वपूर्ण कमजोरी को अप्रासंगिक बना दिया है. दोनों पक्ष अब इसका जबाव स्थितियों पर छोड़ देंगे, न कि इरादों पर. हो सकता है कि टेलीविजन चैनलों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जा रही राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच लड़ाई सिर्फ ख्याली पुलाव बन कर रह जाये.

राहुल गांधी इस बारे में अनिश्चित हैं. मोदी संभावित सहयोगियों के प्रति आश्वस्त नहीं हैं. नीतीश कुमार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा के शीर्ष पर मोदी उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं. अगर वे भाजपा से अलग होना चाहते हैं, तो उनका इस विषय पर अड़ने का कोई मतलब नहीं. ओड़िशा में नवीन पटनायक , पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी या आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी मोदी पर हर हफ्ते बयान नहीं देते.

कांगेस ने राहुल गांधी को लेकर उम्मीद नहीं छोड़ी है, न छोड़ सकती है. लेकिन, उन्होंने एक लंबी अवधि की परियोजना का रूप ले लिया है. उनसे सहानुभूति रखने वाले तर्क देते हैं कि समय उनके साथ है और दस साल बाद भी वे महज 53 साल के होंगे. क्या कांग्रेस को यह आसन्न भविष्य में मुश्किल में डालनेवाला है!

पार्टी ने संभवत: खुद को यह समझा दिया है कि अंतरिम व्यवस्था अस्थायी होगी. उसकी सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि अगले चुनाव में हार के रूप में आनेवाला सबसे बुरा परिणाम भी सर्वश्रेष्ठ स्थिति पैदा कर सकता है- अगर अगली गैर कांग्रेसी सरकार 1989-91 के दौर में बनी वीपी सिंह और चंद्रशेखर सरकारों की तरह बीच में ही लड़खड़ा जाये. इस दौरान राहुल गांधी जो भी करते हैं, उसके सकारात्मक पक्ष को लाभ में बदलने का काम पार्टी के शब्दों के बाजीगरों का है. लेकिन जब इस बाजीगरी का रियलिटी टेलीविजन से मेल होता है, तो समस्या खड़ी होती है.

सीआइआइ सम्मेलन में राहुल गांधी ने भारत को एक मधुमक्खी के छत्ते की तरह पेश किया. उद्योगपतियों की जिस सभा में वे यह बोल रहे थे, उनसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण वे थे, जो सभागार से बाहर टेलीविजन सेटों पर इसका सीधा प्रसारण देख रहे थे. उद्योगपति ऐसे आयोजनों में पहले से तैयार होकर आते है. वे सार्वजनिक तौर पर प्रभावशाली लोगों की प्रशंसा करते हैं. इससे कोई लाभ न मिले, लेकिन नुकसान भी नहीं होता. यह मायने नहीं रखता कि सत्ता पर कौन काबिज है! अगर लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो वे उनका भी गुणगान करेंगे. मोदी बनते हैं तो वे गुजरात के आर्थिक मॉडल को अमेरिका से जायरे तक अपनाने की बात कहेंगे. अगर अगले सीआइआइ सम्मेलन में राहुल बतौर प्रधानमंत्री बोलते हैं, तो अभी जो मोदी के साथ खड़े हैं, वे राहुल के हाथों में भारत को अगले 50 वर्षो तक सुरक्षित पायेंगे.

आम धारणा महत्वपूर्ण होती है. राहुल से सहानुभूति रखनेवाले एक दैनिक समाचार पत्र ने राहुल के सीआइआइ सम्मेलन में दिए भाषण के असर पर लोगों की राय पूछी. 85 फीसदी लोगों ने माना कि राहुल ने अपने नेतृत्व क्षमता पर उठ रहे सवालों पर कुछ नहीं कहा. केवल 10 फीसदी इससे खुश थे. यह संभवत: कुछ अंशों में कांग्रेस के प्रति मध्यवर्ग के गुस्से को दर्शाता है और अगर ऐसा है तो यह दिख रहा है कि राहुल इस बढ़ते गुस्से का जबाव नहीं हैं. वे इसका जबाव कल हो सकते हैं, लेकिन आज नहीं हैं. संभवत: राहुल की सबसे बड़ी दुविधा यह है कि वे राजनीतिक सत्ता में अपने समर्थकों की तुलना में कम रुचि रखते है.

राजनीति में नेतृत्व करना एक कठिन पेशा है. इसके लिए रोजाना 18 घंटे चाहिए. इसमें से अधिकांश समय अजनबी लोगों के प्रति अच्छा व्यवहार करने और उनमें उम्मीद की लौ जगाने की कठिन कला को साधने में बीतता है. बाकी समय, अगर आप सरकार में हैं, तो नीतियों के क्रियान्वयन और विपक्ष में हैं तो वैकल्पिक उपाय सुझाने में बीतता है. राजनीति में ब्यौरों का महत्व है. शॉर्ट कट दुर्घटना को आमंत्रण देना है. आप सड़क के दोनों ओर ड्राइव नहीं कर सकते हैं. अगर आप पिछले 9 वर्षों से सत्ता में हैं, तो आप व्यवस्था की असफलता पर भाषण नहीं दे सकते हैं.

आपको जबाव देना होगा कि आपने व्यवस्था के लिए कुछ क्यों नहीं किया! दिलचस्प है कि गर्दिश के दिनों में भी यह काम कम चुनौतीपूर्ण नहीं होता है. अगर आप गंभीर खिलाड़ी हैं, तो चाहे आप चुनाव जीतें या हारें, आपको इससे जूझना होगा. सीआइआइ सम्मेलन में राहुल के भाषण को टेलीविजन पर वैसे युवा वोटरों ने सुना जिन्होंने काफी उम्मीद के साथ 2009 में मनमोहन सिंह को व्यापक समर्थन दिया था. आज वैसी उम्मीद कहीं नहीं है. राहुल गांधी उस समय उनका स्नेह हासिल करने के लिए अच्छी स्थिति में थे, लेकिन युवा वोटर 2013 में दूसरे हीरो की तलाश कर रहा है.

बाईलाइन

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लेखक द संडे गार्जियनके प्रधान संपादक हैं.
07.04.2013, 16.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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