Posted by: Bagewafa | جون 16, 2013

चला गया अपाहिज़ कौम का वकील—–वसीम अकरम त्यागी

चला गया अपाहिज़ कौम का वकील

Wednesday, 15 May 2013 08:17

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असगर अली इंजीनियर पर विशेष

असगरअली उन बुद्धिजीवियों में से थे जिन्होंने जब आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरीबताया जा रहा था, तो सर्वप्रथम उसका खुलकर विरोध किया था. देश के विभिन्नसमाचार पत्र-पत्रिकाओं में उनका खंडन करते हुए लेख लिखे और कुछ कथित लोगोंद्वारा थोपे जा रहे इस दंश का खंडन किया…

वसीम अकरम त्यागी

मौत एकऐसी सच्चाई है जिससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता. इसका आना हर खास-ओ-आम, आस्तिक हो या नास्तिक सबके लिये तय है. मुनव्वर राणा के शब्दों में कहें तोसब ओढ़ लेंगे मिट्टी की चादर को एक दिन, दुनिया का हर चराग हवा की नजरमें है…

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आज जिसशख्स ने इस मिट्टी की चादर को ओढ़ा है वह सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंडसेक्युलरिज्मके अध्यक्ष और इस्लामिक विषयों के जानकार डॉ. असगर अलीइंजीनियर हैं. वो उस कौम की वकालत कर रहे थे जिसे अमेरिकी पोषित पद्धति केतहत आतंकवादी माना जाता है. जिसे सांप्रदायिक दंगों में झोंका जा रहा थाजिसके खिलाफ दुष्प्रचार करने की मुहिम मीडिया ने छेड़ रखी है.

असगर अलीसाहब उन गिने-चुने बुद्धिजीवियों में से एक थे जो मुस्लिम समुदाय के पक्षमें खड़े हो गये, हालांकि कुछ लोगों को उनसे आपत्ति जरूर थी मगर उन्होंनेउसे नजरअंदाज कर दिया.पिछले महीने ही उन्होंने मुस्लिम टूडेमेंसांप्रदायिक दंगों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण आलेख लिखा था.  उनके इंतकाल कीखबर वाकई सदमा पहुंचाने वाली है. ये सदमा हर उस शख्स को है जिसके दिल मेंसमाज और कौम के लिए दर्द है.  उनकी मौत की खबर पर सुप्रसिद्ध शायर मुनव्वरराना दुःख व्यक्त करते हुए कहते हैं कि असगर अली इंजीनियर साहब देश के उनदानिश्वरों में से थे, जिन्होंने तमाम उम्र मिल्लत और देश की सेवा की है वेदेश के रियल दानिश्वर थे. वे किसी भी तरह की धार्मिक कट्टरता के खिलाफ थे.इतना कहतेकहते उनका गला रुंध सा गया और उनके मुंह से शेर निकला-

हवा उड़ाये लिये जा रही है हर चादर
पुराने लोग सभी इंतकाल करने लगे.

वास्तवमें आज जो हवा चली है उसने उस चादर को उड़ा दिया है जिसके नीचे मुस्लिमतबके की आबरू महफूज थी. जो कभी आतंकवाद तो कभी सांप्रदायिक उन्मादियों केनिशाने पर था, वे उन्हीं की चादर के नीचे आकर अपने आपको महफूज समझते थे.

इसेमुस्लिम समुदाय और दब-कुचले समुदाय का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा जब भीउन्हें कोई सच्चा हमदर्द मिला वह बहुत ही जल्द इस दुनिया को अलविदा कह गया.वह हेमंत करके हो या कोई और. मगर इतना जरूर है वह अपने हिस्से का जो कामइस मुख्तसर सी जिंदगी में कर के गये हैं, वह मील का पत्थर है. उन्होंने वेकाम किये हैं जो बड़े-बड़े मंचों से घोषणा करने वाले मुस्लिम रहनुमा नहींकर पाये.

वर्ष 1940 में जन्मे असगर अली ने विक्रम विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग मेंबीएससी में स्नातक किया. वर्ष 1980 में उन्होंने एक पत्रिका इस्लामिकपरिप्रेक्ष्यका संपादन करना शुरू किया था. अस्स्सी के दशक मे ही असगर अलीने इस्लाम और भारत में सांप्रदायिक हिंसा पर किताबों की पूरी कड़ीप्रकाशित की. उनकी असाधारण सेवा कार्यों के यूएसए इंडियन स्टूडेंट असेंबलीऔर यूएसए इंटरनेशनल स्टूडेंट असेंबली की ओर से 1987 में सम्मानित किया गया.

धार्मिकअमन चैन के लिए उन्हें 1990 में डालमिया अवार्डमिला. डॉ. असगर इंजीनियरको डॉक्टरेट की तीन सम्मानित डिग्रियों से भी नवाजा जा चुका है. 1992 मेंबाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद डॉ. इंजीनियर बेहद आक्रोशित और दुखी हुए.उन्होंने 1993 में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्मके नामसे एक संस्था स्थापित की. इस संस्था के वे अध्यक्ष रहे. धर्मनिरपेक्षपत्र-पत्रिकाओं सहित विभिन्न विषयों पर उनकी करीब 52 किताबें प्रकाशित हुईहैं. देश के प्रतिष्ठित अखबारों और पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित हुए हैं. जोमुख्यतः सांप्रदायिक उन्माद के खिलाफ थे. उन्होंने इंडियन जर्नल ऑफसोसलिज्मऔर एक मासिक पत्रिका, ‘इस्लाम एंड मार्डन एजका भी संपादन किया.

तमामजिंदगी कौम और समाज की खिदमत के लिये वक्फ करने वाले असगर अली इंजीनियर आजहमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा लिखे गये आलेख, किताबें आज हमारेबीच एक सनद की तरह महफूज हैं, जो हमेशा काम आती रहेंगी. उनका बेबाकी से यहकहना कि मुसलमानों पर जहां जुल्म होता है तो वे लड़ते हैं उसका विरोध करतेहैं.हमेशा जुल्म के खिलाफ आवाज उठने वाली ताकत को समबल प्रदान करतेरहेंगे. मगर उस कौम का क्या, जिसकी वह वकालत कर रहे थे जो जिसके लिये वेरात की आखिरी पहर का चराग साबित हो रहे थे वह तो उनके जाने से नेतृत्वहीनसी हो गई है. उसकी भरपाई करना फिलहाल तो मुमकिन नहीं है.

असगर अलीइंजीनियर उन बुद्धिजीवियों में से थे जिन्होंने जब आजमगढ़ को आतंकवाद कीनर्सरी बताया जा रहा था, तो सर्वप्रथम उसका खुलकर विरोध किया था. देश केविभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में उनका खंडन करते हुऐ लेख लिखे और कुछकथित लोगों द्वारा थोपे जा रहे इस दंश का खंडन किया. अगर यह कह दिया जायेतो गलत न होगा कि असगर अली इंजीनियर उस अपाहिज कौम के वकील थे जो जुल्म केखिलाफ आवाज उठाने से डरती है कि कहीं उसे फर्जी मुठभेड़ में मार न दियाजाये, जिसका सांप्रदायिक दंगों में सबसे अधिक नुकसान होता है. जो खाकीआतंकवाद की भेंट चढ़ती है.

असगर अलीइंजीनियर कट्टरता के घोर विरोधी थे. मुसलमान थे, पर उन्होंने अपने धर्मगुरूके खिलाफ खूब लड़ाई लड़ी थी. उस समय सिर्फ सारिकाके संपादक औरसुप्रसिद्ध साहित्यकार कमलेश्वर ने उनका जी जान से साथ दिया था. असगर अलीसांप्रदायिक सदभाव को मन से मानते थे. ऐसी अजीम शख्सियत के इंतकाल परउन्हें राहत साहब के इस शेर के साथ खिराज-ऐ-अकीदत पेश करते हैं-

दिल धड़कने का तसव्वुर ही ख्याली हो गया
एक तेरे जाने से सारा शहर खाली हो गया.

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