Posted by: Bagewafa | جون 18, 2013

मां—-राजा सिरसवी

मां—-राजा सिरसवी

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मौत की आगोश में जब थक के सो जाती है मां

तब कहीं जाकर, सुकूँ थोड़ा सा पा जाती है मां

फ़िक्र में बच्चों की कुछ इस तरह घुल जाती है मां

नौजवान होते हुए बूढी नज़र आती है मां

 

एक ही हसरत को अपने अज्म ओ एस्तेख्लाल से

आंसू से गुस्ल देकर खुद ही दफनाती है मां

ओढती है गुर्बतों का खुद यह बोसीदा कफ़न

चाहतों का पैरहन बच्चोंको पहनाती है मां

 

भूखा रहने ही न देती है यतीमों को कभी

जाने किस-किस से, कहाँ से मांग कर लाती है मां

रूह के रिश्ते की ये गहराइयाँ तो देखिये

चोट लगती है हमारे और चिल्लाती है माँ

 

कब ज़रुरत हो मेरे बच्चे को इतना सोचकर

जागती रहती है आंखे, और सो जाती है मां

हड्डियों का रस पिलाके अपने दिल के चैन को

कितनी रातो में तू खाली पेट सो जाती है मां

 

जाने कितनी बर्फ सी रातो में ऐसा भी हुआ

बच्चा तो छाती पे है, गीले में सो जाती है मां

जब खिलौने को मचलता है कोई ग़ुरबत का फूल

आंसू के साज़ पर बच्चे को बहलाती है मां

 

अपने आँचल से गुलाबी आंसुओ को पोंछ कर

देर तक ग़ुरबत पे अपनी अश्क बरसाती है मां

सामने बच्चोंके खुश रहती है हर एक हाल में

रात को छुप छुप के अश्क बरसाती है मां

 

पहले बच्चोंको खिलाती है सुकून ओ चैन से

बाद में जो कुछ बचा वोह शौक़ से खाती है मां

मांगती भी नहीं अपने लिए अल्लाह से

अपने बच्चोंके लिए दामन को फैलाती है मां

 

जाने अनजाने में हो जाये बच्चे से जो कुसूर

एक अनजानी सजा के दुःख से थर्राती है मां

हर इबादत हर मुहब्बत में निहा है एक गरज़

बे गरज़ बेलौस हर खिदमत को कर जाती है मां

 

अपने बच्चोंकी बेहतर ज़िन्दगी के वास्ते

आंसू के फूल हर मौसम में बरसाती है मां

एक-एक हमले से बच्चे को बचाने के लिए

ढाल बनती है कभी तलवार बन जाती है मां

 

पहले दिल को साफ़ करके खूब अपने खून से

धडकनों पर कलमाए तौहीद लिख जाती है मां

सफा ए हस्ती पे लिखती है वो उसूले ज़िन्दगी

इसलिए एक मकतबे इस्लाम कहलाती हैं मां

 

उसने दुनिया को दिए मासूम रहबर इसलिए

अजमतो में सानिये कुरान कहलाती है मां

 

जब परेशानी में घिर जाते हैं हम परदेस में

आंसुओ को पोछने ख्वाब में आ जाती है मां

ऐसा लगता है के जैसे आ गये फिरदौस में

डाल कर बाहें गले में सर को सहलाती है मां

 

आ गया गर वक़्त मुश्किल अपने दिल के चैन पे

कब्र में होते हुए भी अश्क बरसाती है मां

बाद मर जाने के, फिर बेटे की खिदमत के लिए

भेस बेटी का बदल घर में आजाती है मां

 

दूर हो जाती है सारी उम्र की उस समय थकन

ब्याह करके बेटे का जब घर बहू लाती है मां

फेर लेते हैं नज़र जिस वक़्त बेटे और बहु

अजनबी अपने ही घर में हाय बन जाती है मां

 

अल्लाह-अल्लाह भूल कर एक एक सितम को रात में

पोती पोते से शिकस्ता दिल को बहलाती है मां

बीटा कितना ही बुरा हो पर पड़ोसन के हुज़ूर

रोक कर जज़्बात को, बेटे के गुण गाती है मां

 

शादियां करके जो बच्चे जा बसे परदेस में

ख़त से या तस्वीर से फिर दिल को बहलाती है मां

 

ज़िन्दगी के सफ़र में गर्दिशों की धुप में

जब कोई साया नहीं मिलता तो याद आती है मां

मुफलिसी बच्चे की जिद पे जब उठा लेती है हाथ

जैसे मुजरिम हो कोई, इस तरह शर्माती है मां

 

लौट कर वापस सफ़र से जब भी घर आते हैं हम

डाल कर बाहें गले में सर को सहलाती है मां

देर हो जाती घर आने में जब अक्सर हमें

रेत पर मछली हो जैसे ऐसे घबराती है मां

 

अपने पहलू में लिटा कर, और तोते की तरह

एक-बारह-पांच-चौदह हम को सिखलाती है मां

प्यार कहते हैं किसे, और ममता क्या चीज़ है

कोई उन बच्चोंसे पूछे जिनकी मर जाती है मां

 

साल भर में, या कभी, हफ्ते में जुमेरात को

ज़िन्दगी भर का सिला एक फातेहा पाती है मां

मर्तबा हो मां का ज़ाहिर किस लिए फिरदौस से

अपने बच्चोंके लिए पोशाक मंगवाती है मां

 

घर से जब परदेस जाता है कोई नूरे नज़र

हाथ में कुरान लेकर दर पे आ जाती है मां

देके बच्चे को ज़मानत में रज़ा ए पाक की

पीछे-पीछे सर झुकाके दूर तक आती है मां

 

कांपती आवाज़ से कहती है बेटा अलविदा

सामने जब तक रहे, हाथों को लहराती है मां

याद आता है शबे आशूर का कडियल जवान

जब कभी उलझी हुई जुल्फों को सुलझाती है मां

 

सबसे पहले जान देना फातिमां के लाल पर

रात भर ओ मुहम्मद को ये समझाती है मां

यह बता सकती है हमको बस रुबाबे खस्ता तन

किस तरह बिन दूध के बच्चे को बहलाती है मां

 

शिमर के खंजर से या सूखे गले से पूछिए

मां इधर लब से निकलता है, उधर आती है मां

 

नौजवान बेटा अगर दम तोड़ दे अघोष में

ज़िन्दगी भर सर को दीवारों से टकराती है मां

अपने ग़म को भूल कर रोते हैं जो शब्बीर को

उनके अश्को के लिए जन्नत से आ जाती है माँ

(courtesy :janjwar)

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