Posted by: Bagewafa | جون 18, 2013

उग्र हिन्दुत्व और अवसरवादी मोदित्व ….. बजरंग मुनि

उग्र हिन्दुत्व और अवसरवादी मोदित्व—–By बजरंग मुनि 13/06/2013 19:49:00

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भारतीय जनता पार्टी के तीन दशक की राजनीतिक यात्रा में उसके बहिष्कार और विरोध के बावजूद विचारधारा और संगठन के स्तर पर उसकी स्वीकार्यता में लगातार बढ़ोत्तरी ही दर्ज की गई है। अस्सी के दशक के उभार और नब्बे के दशक के विस्तार में भाजपा की बढ़त को रोकने की जितनी भी राजनीतिक कोशिशें हुईं वे सब धराशायी होती चलीं गई। यानी, विपक्ष और विरोधियों के लाख आरोपों के बाद भी भारतीय जनता ने ‘पार्टी’ को एक कट्टरपंथी दल के रूप में नहीं देखा। राम जन्मभूमि आंदोलन या फिर बाबरी विध्वंस के बाद भी नहीं। इसका कारण शायद यह है कि भारतीय जनता पार्टी उग्र हिन्दुत्व की बजाय उदार हिन्दुत्व की पक्षधर थी। यह अटल बिहारी वाजपेयी का उदार हिन्दुत्ववादी चेहरे का ही कमाल था कि देश में पहली बार पांच साल की गैर कांग्रेसी सरकार बनी और सफल रही। लेकिन अब संघ के उग्र हिन्दुत्व और मोदी के अवसरवादी मोदित्व के बीच नापाक गठजोड़ से और किसी को खतरा हो न हो, उदारवादी हिन्दुत्व को जरूर खतरा पैदा हो गया है।

भारतीय जनता पार्टी में भी जहां संघ परिवार उग्रवादी विचारों का प्रतिनिधित्व करता रहा वहीं अटल अडवाणी उदारवादी हिन्दुत्व का सफल नेतृत्व करते रहे। अटल-अडवाणी की जोड़ी के समक्ष संघ परिवार लाख प्रयत्न करने के बाद भी झुक जाता था क्योंकि उदारवादी अटल-अडवाणी झुकने-झुकाने की सीमाओं को अच्छी तरह समझते थे। यह बात अवश्य है कि संघ परिवार ने अटल अडवाणी की जगह किसी अन्य उदारवादी हिन्दू को भाजपा में आगे नहीं बढ़ने दिया और अटल-अडवाणी के अवकाश प्राप्ति की प्रतीक्षा करते रहे। यदि अटल बिहारी बाजपेयी और लाल कृष्ण अडवाणी की तुलना करें तो अटल जी के समक्ष अडवाणी की स्थिति एक पदलोलुप उदारवादी नेता की ही बनती है। इन्होंने बीच में पदलोलुपता के कारण अटल जी को भी कमजोर करने का प्रयास किया तथा कभी-कभी तो उन्होंने पद-प्रतिष्ठा की चाह में संघ परिवार के उग्र हिन्दुत्व से अपनी सीमा से आगे जाकर भी समझौता किया। फिर भी इतना अवश्य है कि अडवाणी जी जीवन भर उदार हिन्दुत्व के पक्षधर रहे। जिन्ना के संबंध में पाकिस्तान में की गई टिप्पणी ने उग्र हिन्दुत्व से बहुत दूर कर दिया किन्तु उन्होंने अपने कहे शब्द वापस नही लिये। अडवाणी जी अपने राजनैतिक जीवन में, इस बात को भूल गये कि उग्रवाद हमेशा व्यवहार ‘इस्तेमाल करो और फेकों’ की बात पर विश्वास करता है।

चाहे हिन्दू उग्रवाद हो या इस्लामिक उग्रवाद या कोई अन्य। उग्रवादी नेतृत्व कभी भावनाओं से काम नहीं करता, मानवीय संवेदनाओं से शून्य होता है और उचित एवं अनुचित की परिभाषा स्वयं बनाता है और तदनुसार ही दूसरे के साथ व्यवहार करता है, चाहे वह व्यवहार कितना भी नकली क्यों न हो। अटल जी के किनारे होते ही उग्रवादी हिन्दुत्व को अडवाणी जी जैसे उदारवादी को किनारे करने में कोई असुविधा नहीं थी। सिर्फ यदि कोई अभाव था तो एक विकल्प के नेतृत्व का, जो नरेन्द्र मोदी ने पूरा कर दिया।

पिछले कई दशकों से राजनीति में भारतीय जनता पार्टी हिन्दुत्व की अकेले पक्षधर रही है। अन्य राजनीतिक दल धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दुत्व से दूरी बना कर रहते रहे। यहां तक कि अन्य राज्यनैतिक दल उदार हिन्दुत्व की तुलना में उग्र इस्लाम का समर्थन तक करते रहे। इस का परिणाम हुआ कि भाजपा राजनीति में कभी भी अलग-थलग नहीं पड़ी।नरेन्द्र मोदी कभी न उग्रवादी विचारों के रहे हैं और न हीं उदारवादी विचारो के। वे अवसरवादी विचारधारा के प्रतीक पुरुष हैं। उनकी गिनती सफल कूटनीतिज्ञ के रूप में की जा सकती है। प्रारम्भ में उन्होंने गुजरात में इस्लामिक उग्रवाद को जिस कुशलता से सबक सिखाया उसके बाद धीरे-धीरे मुसलमानों में अपनी उदारवादी छवि बनाने की कोशिश की, वह उनकी एक अलग छाप स्थापित करती है। नरेन्द्र मोदी ने हिन्दुत्व से आगे बढ़ कर विकास पुरूष सिद्ध होने की सफल छलांग लगाई, वह भी उनके कुशल राजनीतिज्ञ होने की बजाय कुशल कूटनीतिज्ञ होने का प्रमाण है। अपनी सफलता के लिए मोदी ने कभी न संघ की परवाह की और न विश्व हिन्दु-परिषद की तथा इन सबों को अपने पीछे चलने के लिए मजबूर किया। संघ परिवार मोदी से बहुत नाराज था किन्तु उग्र हिन्दुत्व को और बढ़ने के लिए कुशल राजनेता की आवश्यकता थी दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी उग्र हिन्दुत्व के पक्षधर न होते हुए भी राजनैतिक उच्च पद पाने के लिए संघ परिवार के साथ गठजोड़ आवश्यक मानते थे, यही कारण है कि संघ परिवार ने न चाहते हुए भी नरेन्द्र मोदी को अपना राजनैतिक हीरो बना दिया तथा नरेन्द्र मोदी ने न चाहते हुए भी उदारवादी हिन्दुत्व के विचार को तिलांजली दे दी। इस तरह उग्र हिन्दुत्व तथा कूटनीति के नापाक गठबंधन का परिणाम है भारतीय जनता पार्टी की नई राजनीति ।

स्पष्ट है कि भाजपा में अटल-अडवाणी युग समाप्त हो गया है और इनके साथ-साथ ही भाजपा में उदारवादी हिन्दुत्व भी पूरी तरह समाप्त हो गया है। अब भारतीय जनता पार्टी उग्रवादी हिन्दुत्व के मार्ग पर सरपट दौड़ेगी जिसे नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व मिलेगा और संघ परिवार का मार्ग मार्गदर्शन। कहने के लिए भले ही आज भाजपा का उग्रवादी धड़ा यह कहे कि वह आगामी आम चुनाव में कांग्रेस की भ्रष्ट नीतियों को मुद्दा बनाएगी लेकिन स्पष्ट है कि 2014 का आम चुनाव न विकास के मुद्दे पर होगा न महंगाई और भ्रष्टाचार की कोई चर्चा होगी। अगला आम चुनाव उग्र हिन्दुत्व बनाम उदारवाद के मुद्दे पर लड़ा जाएगा। क्योंकि संघ परिवार और नरेन्द्र मोदी के मिलन के बाद इसके अतिरिक्त कोई अन्य सम्भावना नहीं दिखती, खास कर अडवाणी के पतन के बाद तो अब अन्य कोई मार्ग दिखता ही नहीं है।

2014 के चुनावों में उग्र हिन्दुत्व का उदारवाद से जो भयंकर राजनैतिक युद्ध होगा उसकी किसी तरह की भविष्यवाणी करना कठिन है। विश्वयुद्ध के समय भी हिटलर और मुसोलीनी की सफलता-असफलता की भविष्यवाणी करना आसान नही था और न हीं माओत्सेतुंग के समय भविष्यवाणी करना आसान था। वर्तमान समय में भी लगातार परिस्थितियां बदल सकती है। यदि उग्रवादी मुसलमानों ने बहुत आगे आकर मोदी का एकपक्षीय विरोध किया तो ध्रुवीकरण हिन्दू और गैर हिन्दू के बीच भी हो सकता है किन्तु यदि उग्रवादी हिन्दुओं द्वारा ज्यादा उछलकूद की गई तो ध्रुवीकरण उग्रवादी हिन्दुत्व के विरूद्ध भी हो सकता है। इसकी एक झलक उस वक्त मिली जब लालकृष्ण आडवाणी के घर पर उग्रवादी हिन्दुत्व के समर्थक प्रदर्शन करने पहुंच गये। स्पष्ट है कि लालकृष्ण अडवाणी के घर पर उग्रवादी हिन्दुओं के प्रदर्शन को भी सामान्य नागरिकों ने बुरा माना है तथा मोदी समर्थकों द्वारा भाजपा की कार्यकारणी बैठक में शालीनता छोड़कर दबाव बनाना भी बुरा माना गया। यह संभवत: भारत में हिन्दू धर्म का प्रभाव है कि जनता उग्रवाद के पीछे चलने में यकीन नहीं करती है। फिर वह इस्लामिक उग्र विचारधारा हो कि हिन्दू। लेकिन हिन्दूवादी दल के भीतर ही राजनीतिक हालात ऐसे हैं कि लगता है कि संघ परिवार नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व पाकर अपनी सीमायें तोड़ेगा। हिन्दुत्व पर मोदित्व भारी पड़ेगा और उदारवादी धडे को यह कहने का अवसर मिलेगा कि भारतीय राजनैतिक को माओवादी और मोदीवादी विचारों से बचाने की आवश्यकता है।

Source:Visfot.com

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