Posted by: Bagewafa | جون 24, 2013

मोदी, आडवाणी और संघ का एजेण्डा -राम पुनियानी

मोदी, आडवाणी और संघ का एजेण्डाराम पुनियानी

 

मोदी जैसे फासिस्ट व्यक्ति और आरएसएस जैसे घोर साम्प्रदायिक संगठन का प्रजातांत्रिक तरीकों से कड़ा विरोध किया जाना जरूरी है।
राम पुनियानी

सन् 2014 के आमचुनाव के लिए भाजपा की चुनाव प्रचार समिति केअध्यक्ष पद पर नरेन्द्र मोदी के मनोनयन ;जून 2013 ने प्याले में उठने वालेतूफान से कुछ बड़ा तूफान बरपा कर दिया है। यह दिलचस्प है कि पहली बार इस तरहके पद पर मनोनयन ने इतना हंगामा और विवाद खड़ा किया है। इसके लिए मोदी कीप्रचार मशीनरी काफी हद तक जिम्मेदार है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानोमोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया हो।  हां, यह अवश्य हो सकता है कि प्रचार प्रमुख के रूप में मोदी की नियुक्ति, उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने की ओर पहला कदम हो। मोदी केमनोनयन का सबसे कड़ा विरोध लालकृष्ण आडवाणी ने किया, जो कि मोदी के राजनैतिकआका माने जाते हैं और जिन्होंने मोदी को आगे बढ़ाने और उनका बचाव करने मेंमहत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि मोदी आज भाजपा और गुजरात में इतने शक्तिशालीहोकर उभरे हैं तो उसका काफी कुछ श्रेय आडवाणी और उनकी राजनीति को जाता है।आडवाणी ने ही मुख्यमंत्री बतौर मोदी का नाम प्रस्तावित किया था। गुजरात मेंभाजपा के गिरते  ग्राफ को मोदी ने सम्हाला। इसमें सन् 2002 के कत्लेआम नेउनकी कितनी मदद कीए यह चिंतन का विषय है।
गुजरात हिंसा में मोदी कीस्पष्ट भूमिका के चलते, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मोदी कोमुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे। परन्तु आडवाणी ने मोदी की कुर्सी बचाली। मोदी को बढ़ावा देने में भी आडवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। आडवाणी केमोदी प्रेम के पीछे कोई व्यक्तिगत कारण नहीं था। इसका कारण यह था कि दोनोंस्वयंसेवकों के राजनैतिक एजेण्डे एक थे। मोदी और आडवाणी, दोनों ने मिलकरदेश की धमनियों में साम्प्रदायिकता का जहर प्रवाहित करने के लिए हर संभवकाम किया। ये दोनों स्वयंसेवक, आरएसएस के हिन्दू राष्ट्र के वफादार सिपाहीहैं।
भाजपा को 1984 में लोकसभा में दो सीटें मिलीं थीं। वहां से आडवाणीबाबरी ध्वंस के बाद हुए चुनाव में पार्टी की सदस्य संख्या को 161 तक लेगए। सन् 1999 के चुनाव मेंए साम्प्रदायिक धु्रवीकरण में और वृद्धि के चलते, भाजपा को इतिहास में सबसे ज्यादा.182.लोकसभा सीटें प्राप्त हुईं। आडवाणीकी साम्प्रदायिक राजनीति ने भाजपा को पहले प्रमुख विपक्षी दल का दर्जादिलाया और तत्पश्चात केन्द्र में सत्ता। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीएगठबंधन ने लगभग 6 साल तक दिल्ली में गद्दी सम्हाली। आडवाणी, राजनीति केअत्यंत चतुर खिलाड़ी हैं। वे जानते थे कि उनकी विघटनकारी राजनीति के चलते, अन्य राजनैतिक दल भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। इसलिए उन्होंनेप्रधानमंत्री पद के लिए अपने साथी स्वयंसेवक, अटल बिहारी वाजपेयी का नामआगे बढ़ाया। वाजपेयी का एजेण्डा भी हिन्दू राष्ट्र ही था परन्तु फर्क सिर्फयह था कि उनकी छवि एक मध्यमार्गी, नर्म नेता की थी।
वाजपेयी केप्रधानमंत्रित्व काल के बाद आडवाणी में भी प्रधानमंत्री बनने कीमहत्वाकांक्षा जागी और इसे पूरा करने के लिए उन्होंने भी अपनी छवि कोमध्यमार्गीय कलेवर देने की कोशिश शुरू की। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के इसअघोषित नेता ने पाकिस्तान की संविधान सभा में 11 अगस्त 1947 को मोहम्मद अलीजिन्ना द्वारा दिए गए भाषण को उद्धृत करते हुए जिन्ना को धर्मनिरपेक्षनेता घोषित कर दिया। केवल एक भाषण के आधार पर जिन्ना का आंकलन करना निश्चितरूप से अनुचित है। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि जिन्ना, मुस्लिम लीग केमुखिया थे और उन्होंने ही द्विराष्ट्र सिद्धांत को मजबूती दी थी।द्विराष्ट्र सिद्धांत से उद्भूत साम्प्रदायिक विचारधारा, हिन्दू औरमुस्लिम, दोनों समुदायों के साम्प्रदायिक तत्वों को प्रिय थी। जिन्ना कोधर्मनिरपेक्ष बताकर आडवाणी शायद कुछ ज्यादा ही बोल गए। क्योंकि तब तक संघपरिवार ने हिन्दुओं को ष्जिन्ना और मुसलमानों से नफरत करो के आधार परधु्रवीकृत कर लिया था। ऐसे में आडवाणी के इस बयान को संघ पचा नहीं सका औरउन्हें पद से हटा दिया गया। आडवाणी की बढ़ती उम्र के कारण भी आरएसएस उन्हेंहटाना चाहता था परन्तु किसी नए, विश्वसनीय चेहरे के अभाव में, सन् 2009 केआम चुनाव में आडवाणी को एक बार फिर पुनर्जीवन मिल गया।
भाजपा की कमानमोदी के हाथों में सौंपने के लिए आरएसएस बहुत इच्छुक नहीं था क्योकि संघव्यक्तियों की बजाए संगठन की प्रधानता चाहता है। जहां तक मोदी का सवाल है, वे संगटन पर हावी हो जाते हैं। परन्तु मोदी के मामले में आरएसएस, अन्ततः, शायद इसलिए राजी हो गया क्योंकि मोदी ने अत्यंत कुशलतापूर्वक गढ़े गए प्रचारअभियान और गुजरात कत्लेआम की सहायता से, गुजरात में जबरदस्त साम्प्रदायिकधु्रवीकरण करने में सफलता पाई थी। आरएसएस की राजनीति, मूलतः, धार्मिक पहचानके भेस में पूर्ण एकाधिकारवाद की राजनीति है। यह एक तरह की फासीवादीराजनीति है। फासीवादी राजनीति के लिए जरूरी होता है एक करिश्माई जननेता।मोदी इस तरह के नेता हैं और इस राजनैतिक मजबूरी के चलते, मोदी के बारे मेंअपनी आपत्तियों को दरकिनार कर, आरएसएस ने उनके कद में हो रही अनियंत्रितवृद्धि को स्वीकार कर लिया।
इस राजनैतिक प्रहसन के चलते, मोदी कीविघटनकारी छवि के कारणए एनडीए के गठबंधन के साथी भाजपा से दूर जा रहे हैं।इन दलों को अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक को ध्यान में रखना है और इसलिए वेमोदी के नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर सकते। एनडीए से पहले ही कई दल बाहर जाचुके हैं और मोदी युग के उदय के बाद कई और दल एनडीए का साथ छोड़ सकते हैं।सम्भावना तो यही है कि अन्ततः भाजपा के साथ केवल हिन्दुत्ववादी शिवसेना औरसाम्प्रदायिक अकाली दल रह जाएंगे। आडवाणी ने विद्रोह का झण्डा उठाया अवश्यपरन्तु आरएसएस प्रमुख के एक फोन ने उनके तेवर ठंडे कर दिए। आरएसएस द्वाराप्रशिक्षित स्वयंसेवक, नागपुर से आए निर्देशों का किसी भी स्थिति मेंउल्लंघन नहीं कर सकते। इसके कई कारण हैं। पहला यह कि स्वयंसेवकों को यहसिखाया जाता है कि मूलतः उनकी वफादारी संघ और हिन्दू राष्ट्र के प्रति है।हम सबको याद है कि जब 1977 में आपातकाल कीसमाप्ति के बादए भाजपा के पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ का विलय जनता पार्टीमें हो गया था, तब जनता पार्टी के अन्य घटक दलों ने जनसंघ के सदस्यों सेआरएसएस से उनके संबंध तोड़ने को कहा था। जनसंघ ने जनता पार्टी को तोड़नाबेहतर समझा बजाए आरएसएस से संबंध तोड़ने के। अटल बिहारी वाजपेयी, जो कितथाकथित मध्यममार्गी और नरम नेता बताये जाते हैं ने भी अमेरिका के स्टेटनआईलैण्ड में अनिवासी भारतीयों की एक सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि वेस्वयंसेवक पहले हैं, प्रधानमंत्री बाद में।
विचारधारात्मककारकों के अलावा, चुनावी कारक भी आरएसएस के वर्चस्व के पीछे हैं। भाजपा कीमुख्य शक्ति हैं आरएसएस के स्वयंसेवक, जो भाजपा के उम्मीदवारों को चुनावजितवाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। भाजपा के कार्यकलापों पर आरएसएसए संगठनमंत्रियों द्वारा कड़ा नियंत्रण रखता है। ये संगठन मंत्री, भाजपा में, आरएसएस के प्रतिनिधि होते हैं। राम मंदिर मुद्दे के जोर पकड़ने, आडवाणी कीविघटनकारी रथयात्रा, उसके बाद हुई हिंसा और साम्प्रदायिक धु्रवीकरण और इनसब से हिन्दुत्व की राजनीति को हुए लाभ से आरएसएस काफी प्रसन्न था। अबस्थिति यह हो गई है कि भाजपा की ताकत में दिन ब दिन गिरावट आ रही है औरक्षेत्रीय पार्टियां मजबूत होती जा रही हैं। इन क्षेत्रीय पार्टियों कोमुख्यतः केवल क्षेत्रीय मुद्दों से मतलब रहता है और इसलिए चुनाव के बाद वेकिस करवट बैंठेंगी, यह कहना बहुत मुश्किल  है।
इस पूरे घटनाक्रम सेमुख्यतः दो चीजें साफ होती हैं। पहली यह कि मोदी, समाज को धु्रवीकृत करनेमें काफी हद तक सफल रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि मोदी स्वभाव से तानाशाहहैं और जब वे सत्ता में आते हैं तो सारी शक्तियां स्वयं में केन्द्रित करलेते हैं। उनके इस तानाशाहीपूर्ण चरित्र को उनका शक्तिशाली होना बताया जारहा है। गुजरात की अन्य पार्टियों के नेता तो मोदी के इस आंकलन से सहमत हैंही कई पूर्व भाजपा नेताओं को भी मोदी ने हाशिए पर पटक दिया है। उनकी कोईपूछ परख नहीं हैं। मोदी को सत्ता से बाहर रखने में क्षेत्रीय पार्टियां किसहद तक आवश्यक भूमिका निभाएंगी, यह कहना मुश्किल है। इन पार्टियों कीसिद्धान्तो और मूल्यों में कोई खास श्रृद्धा नहीं है।
जब सन् 1996 मेंभाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी तब कोई दूसरी पार्टी उसके साथ गठबंधनकरने को तैयार नहीं थी। परन्तु कुछ ही साल बाद, कई दल सत्ता के लोभ मेंभाजपा के आसपास मंडराने लगे थे। संघ.भाजपा.मोदी इसी ऐतिहासिक अनुभव के आधारपर आश्वस्त होंगे कि समय आने पर उन्हें दूसरी पार्टियों का समर्थन मिलजायेगा। यह अपेक्षाकृत कठिन है क्योंकि उस समय वाजपेयी की उपस्थिति केकारणए अन्य पार्टियों के लिए स्वयं को धोखे में रखना आसान था। वे सत्ता मेंअपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करते हुए यह दावा भी कर सकती थीं कि उन्होंनेअपने सिद्धांतो से कोई समझौता नहीं किया है।
आजधर्मनिरपेक्ष आन्दोलन के सामने बहुत कठिन चुनौती है। समाज में धार्मिकअल्पसंख्यकों के विरूद्ध पूर्वाग्रह जड़ पकड़ चुके हैं और अल्पसंख्यकों कीहालत दिन ब दिन द्वितीय श्रेणी के नागरिकों जैसी होती जा रही है।मोदीके सत्ता में आने के अभी तो कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं परन्तु यह साफ हैकि संघ और भाजपाए सत्ता में आने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। हमने पहले भीदेखा है कि साम्प्रदायिक हिंसा से साम्प्रदायिक संगठनों को ताकत मिलती है।साम्प्रदायिक संगठन यह बात अच्छी तरह से समझते हैं। यह सब देश के लिए बहुतखतरनाक है। धार्मिक हिंसा के कारण साम्प्रदायिक ताकतों की जमींनी स्तर परताकत बढ़ रही है। जहां तक क्षेत्रीय पार्टियों के राष्ट्रव्यापी गठबंधन कासवाल है उसमें सत्ता सुख का उपभोग करने की इच्छा रखने वालों की संख्या इतनीअधिक होगी कि उसका अस्तित्व बहुत दिनों तक बना नहीं रह सकेगा। क्या तीसरेमोर्चें के लिए कोई गुंजाइश है? क्या सभी गैर.भाजपा और गैर.कांग्रेस दल एकसाथ मिलक, तीसरा मोर्चा बना सकते हैं?तीसरा मोर्चा केवल प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और गरीबों की पक्षधरता वाले कार्यक्रमों के आधार पर बनाया जासकता है। एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी होगा कि तीसरे मोर्चे का नेतृत्व कौनकरे? मोदी जैसे फासिस्ट व्यक्ति और आरएसएस जैसे घोर साम्प्रदायिक संगठन का प्रजातांत्रिक तरीकों से कड़ा विरोध किया जाना जरूरी है।
राम पुनियानी

 

 

Courtesy:http://loksangharsha.blogspot.com/2013/06/blog-post_8630.html

 

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