Posted by: Bagewafa | جولائی 5, 2013

मोहब्बत—प्रो.देवेंद्र मिश्रा

मोहब्बत—प्रो.देवेंद्र मिश्रा

 

लोग करते हैं ये ख्वाहिश मिले ज़न्नत उनको।
हमें तो सबसे भली अपनी क़ायनात लगे॥

उनको देखा है घुट घुट के दम तोड़ते हुये।
इश्क़ एक ला इलाज़ रोग है इंसा के लिये॥

मोहब्बत,प्रेम,उल्फ़त ,इश्क़ हैं बेकार की बातें।
ग़ुजरती हैं न खाली पेट ग़ुरबत की सियाह रातें॥

पिया मीरा ने प्याला विष का मोहन की मोहब्बत में।
ज़हर माशूक देती आज आशिक़ को अदावत में॥

करूं उम्मीद फिर क्यूं मैं भला सच्ची मोहब्बत की।
तू मीरा बन नहीं सकती मैं मोहन हो नहीं सकता॥

बड़े बेअक्ल हैं वो लोग मरते हैं मोहब्बत में।
या फिर दीवाने बन फिरते भटकते राहे उल्फ़त में॥

इश्क करना ही है तो कर ले रब से ए दोस्त्।
माशूक़ सच्चा है वो पाक मोहब्बत उसकी॥

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