Posted by: Bagewafa | جولائی 17, 2013

शकील बदायूनी…….प्रकाश पंडित

4987_Shakil-Aur-Unki-Shayari_m

शकील बदायूनी…….प्रकाश पंडित


 

जिगरऔरफ़िराक़के बाद आनेवाली पीढ़ी में शकील बदायूनी एकमात्र शायर हैं जिन्होंने अपनी कला के लिएग़ज़ल का क्षेत्र चुना है और इस प्राचीन किन्तु सुंदर और पूर्ण काव्य-रूपको, जिसमें हमारे अतीत की सर्वोत्तम साहित्यिक तथा सांस्कृतिक सामग्रीसुरक्षित है, केवल अपनाया ही नहीं, उसका जीवन के परिवर्तनशील मूल्यों औरनये विचारों से समन्वय कर उसमें नये रंग भी भरे हैं।

मैं शकीलदिल काहूँ तजुर्मां कि मुहब्बतों का हूँराज़दां
मुझे फ़ख़ है मेरी शायरी मेरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं

कोई ऐ शकीलदेखे ये जुनूं नहीं तो क्या है
कि उसी के हो गए हम जो न हो सका हमारा।

 

फ्रन्टियर-मेल बम्बई से फ़र्राटे भरता दिल्लीकी तरफ़ उड़ा जा रहा है औरलगभग हर छोटे-बड़े स्टेशन पर उसके रुकते ही प्लेटफ़ार्म पर खड़े लोगों कासमूह हड़बड़ाकर फ़र्स्ट-क्लास के डिब्बों की ओर लपकता है और गाड़ी छूटजाने की बौखलाहट के बावजूद शीघ्र ही एक डिब्बे में काली शेरवानी और सफे़दपायजामे में सुसज्जित एक ऐसे व्यक्ति को ढूंढ निकालता है जिसने सिर के बालपीछे को संवार रखे हैं, जिसकी आँखों में बड़ी सुन्दर चमक है और जिसकेहोटों पर सदाबहार मुस्कराहट मानो चिपक कर रह गई है।
लोग बढ़-बढ़कर फूल-पान, मिठाइयाँ और फल उस व्यक्ति को भेंट करते हैं और वहसहर्ष स्वीकार करता जाता है। डिब्बे में बैठे अन्य यात्री आश्चर्य सेएक-दूसरे की ओर देखते हैं कि हे भगवान् ! यह व्यक्ति न तो कोई जाना-मानाराजनैतिक नेता है, न अंतराष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त कोई खिलाड़ी, औरफ़िल्म-अभिनेता तो किसी ओर से हो ही नहीं सकता। फिर इतना प्यार, हर जगहऐसी आवभगत क्यों ? शायद कुछ यात्री यह भी सोचते हों कि संभव है, इसव्यक्ति के कुल-परिवार के लोग देश के हर नगर, हर कस्बे में मौजूद हों औरयह किसी दूर देश की यात्रा को जा रहा हो। लेकिन किसी स्टेशन पर जब कोई उसव्यक्ति को उसके नाम से पुकारता है कि शकीलसाहब !लौटते समय हमारे यहाँ अवश्य आइएगा, या शकीलसाहब !अगर संभव हो तो एक-आध दिन हमारे यहाँ रुक के चले जाइएगा, तो रहस्य खुलताहै कि वह व्यक्ति उर्दू का प्रसिद्ध गज़ल-गो शायरशकीलबदायूनी है जो कहीं समुद्र पार नहीं, देश हीके किसी मुशायरे में शामिल होने जा रहा है; तथा वे लोगशकीलके कुटुम्बी नहीं, उसके श्रद्धालु हैं।

शकीलकी ऐसी लोकप्रियता के कारण कुछ मित्रों नेतरह-तरह के लतीफ़े भी घड़ रहे हैं। उनका कहना है किशकीलपहले से हर शहर में अपने जानने वालों को पत्रलिख देता है कि मैं अमुक शहर के मुशायरे में शरीक होने अमुक दिन अमुकगाड़ी से आपके शहर से गुज़रूँगा। आपसे मिले काफ़ी समय हो चुका है। आप कोकष्ट तो होगा लेकिन मेरी प्रसन्नता के लिए यदि आप स्टेशन पर पधार सकें तोअत्यन्त आभारी हूँगा। इत्यादि।
लतीफ़ा न होकर यदि यह वास्तविकता भी हो, तब भी इस बात से इन्कार नहीं कियाजा सकता कि शकीलको पर्याप्त सर्वप्रियता प्राप्तहै। और उसकी सर्वप्रियता का भेद निहित है उसके बेपनाह तरन्नुम में, शेरोंकी बेपनाह चुस्ती में और अनुभूति की बेपनाह तीव्रता में। मैंने उसे कई ऐसेमुशायरों में भी दाद पाते देखा है, जहाँ श्रोतागण मानो शपथ लेकर आते हैंकि किसी शायर को भी हूटकिए बिना न छोड़ेंगे। लेकिनइसी संबंध में मैं यह कहने का दुःसाहस भी करूँगा कि इस प्रकार कीसर्वप्रियता चूँकि उसे अपनी शायरी के प्रारंभिक काल में ही प्राप्त हो गईथी, अतएव वाह’ ‘वाहऔरसुब्हान अल्लाके निरंतर शोर ने एक समय तक उसे जीवनके कई महत्त्वपूर्ण मूल्यों के बारे में सोचने का अवसर न दिया और उसकीशायरी परम्परागत ग़ज़ल तक ही सीमित रही। उसके समकालीन शायर अपनी शायरी मेंनई और प्रगतिशील उद्भावनायें समोते चले गये और वहप्रेममें ही उलझा रहा।

लेकिन, जैसी कि कुछ समालोचकों ने भूल की है, मैंशकीलकी शायरी को एकदम परम्परागत शायरी कहकरनज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। मेरा दावा है कि उन समाचोलकों नेशकीलको पूर्ण रूप से और क्रमानुसार नहीं पढ़ा।साथ-ही-साथ वे समालोचना के इस मूल सिद्धांत को भूल गए कि हर कलाकार की कलाका विश्लेषण उस कलाकार के पैरों पर खड़े होकर करना चाहिए। देखना चाहिए किजो माँग हम कलाकार से कर रहे हैं, कलाकार का जीवन और उसकी परिस्थितियों नेउसे ऐसा अवसर दिया भी या नहीं कि वह हमारी माँग पूरी कर सकता। और जब उसेअवसर मिला तब उसने हमें क्या दिया ?
स्वयं शकीलबदायूनी के कथनानुसार उसकी काव्यात्मकक्षमताओं को चार विभागों या चार स्थानों के जलवायु में विभाजित किया जासकता है-बदायूँ, अलीगढ़ दिल्ली और बम्बई।
मेरे पूछने पर उसने बताया कि बचपन1 का ज़माना पार करने के बाद जब उसका बोधजगा तो बदायूँ शहर में घर-घर
—————
1.
शकील अहमद शकीलबदायूनी का जन्म 3 अगस्त, 1916 ई.को बदायूँ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। स्वर्गवासी पिता का नाम मौलाना जमीलअहमद सोख्ता क़ादरी था, जिन्होंने बड़े लाड़-प्य़ार से बेटे को घर पर अरबी, फ़ारसी, उर्दू और हिन्दी की प्रारंभिक शिक्षा दिलवाई।

मज़हबी (इस्लाम-धर्म सम्बन्धी) और अदबी (साहित्यिक) चर्चा थी। बदायूँ केलगभग सब शायर ग़ज़लें कहते थे और उनपर शायरी के लखनऊ-स्कूल का गहरा प्रभावथा। साहित्य-जीवन के लिएका अभाव था औरसाहित्य-साहित्य के लिएका आधिपत्य। अतएव ऐसेसाहित्यिक वातावपण और नाते के चचा हज़रत मौलाना ज़िया-उल-क़ादिरी बदायूनी [जो एक माने हुए नाअ़त-गो (हज़रत मोहम्मद की प्रशंसा में शेर लिखने वाले)शायर थे] के प्रशिक्षण का रंग उसकी काव्य-अभिरुचि पर पड़ा, जो बदायूँ कीसाहित्यिक बैठकों में विभिन्न शायरों के शेर सुन-सुनकर पैदा हो गई थी1
अलीगढ़ के बारे में उसने बताया कि 1936 ई. में अलीगढ़ विश्वविद्यालय मेंप्रविष्ट होने तक वह बदायूँ के आसपास के कई मुशायरों में शरीक हो चुका था।अलीगढ़ आया तो वहाँ सैद्धान्तिक रूप से शायरों के दो दल मिले। प्रगतिशीलशायर और ग़ज़लगो शायर। एक ओर मजाज़’, ‘जज़्बी’, जांनिसार अख़्तर’, मसऊद अख़्तर मजालआदि के नग़्मे गूँज रहे थे तोदूसरी ओर राज़मुरादाबादी ऐसे ग़ज़लग शायरों ने, जोजिगरमुरादाबादी से बेतरह प्रभावित थे, अपने झन्डेगाड़ रखे थे, ‘राज़साहब जिगरमुरादाबादी के शिष्य भी थे अतएव अपने परम मित्रशकील
—————–
1.
मेरी शायरी का फ़न (कला) मारूसी (पैतृक) नहीं हैक्योंकि न मेरे वालिद शायर थे न दादा। हाँ, मेरी सातवीं पुश्त में जो मेरेजद्दे-अमजद (पूर्वज) थे उनके बारे में किताबों में पढ़ा है कि वो शायर थेऔर उनका नाम ख़लीफ़ा मोहम्मद वासिल था। मुमकिन है वही ज़ौक़ (अभिरुचि) सातपुश्तों की छलांग लगाकर मेरे हिस्से में आया हो-

शकील

 

बदायूनी को भी उन्होंनेजिगरसाहब से मिलाया और फिरजिगरसाहब की कृपा दृष्टि से स्वयंशकीलके कथनानुसार मेरी शायरी पर यौवनआता गया। उसी ज़माने में स्वर्गीय मौलाना अहसनमारहर्वी उर्दू के लेक्चरर थे, और यू.पी. के विभिन्न कालेजों, विशेषकरसेंट जोन्स कालेज, आगरा, में इन्टर-वर्सिटीइनामीमुशायरे हुआ करते थे। अहसनसाहब मुझे औरराज़को अपने साथ वहाँ ले जाया करते थे और हम दोनोंमुशायरों के लिए धमाकासिद्ध होते थे। इनाम हमेंमिलता था और विजय अलीगढ़ विश्वविद्यालय की होती थी। इन सिलसिलों नेग़ज़लगोई के क्षेत्र में मेरे पाँव और भी दृढ़ता से जमा दिए। चूँकिमस्तिष्क को राजनीति से कोई लगाव ही न था इसलिए प्रगतिशील, आन्दोलन, सामाजिक बोध और सामाजिक ज़िम्मेदारियों पर क्रेंद्रित करने की बजाय मैंनेअपनी शायरी को प्रेम तथा प्रेम सम्बन्धी मनोविश्लेषण पर क्रेंद्रित करदिया।’’

अलीगढ़ से बी.ए. करने के बाद राज्य के सप्लाई-विभाग में नौकर होकर 1942 से 46 ई. तक वह दिल्ली में रहा आधुनिक उर्दू शायरी के इतिहास में यह काल तीनप्रकार से उल्लेखनीय हैं। इस काल में कुछ संकीर्णतावादी आलोचकों ने यह बहसउठाई कि काव्य के एक रूप के तौर पर ग़ज़ल को बाक़ी रहना चाहिए या नहीं ? उन्होंने ग़ज़ल की विषय-वस्तु को परम्परागत शायरी से सम्बधित कर उसे अफ़ीमसे उपमा दी और गज़लगो शायरों पर प्रतिक्रियावादी होने का आरोप लगाया। इसकेअतिरिक्त न. म. राशिद’, ‘मीराजीऔर डाक्टर तासीर ने अंग्रेज़ी साहित्य सेप्रभावित होकर उर्दू शायरी में फ्री-वर्सऔरब्लैंक-वर्सके नए-नए प्रयोग करने शुरु किए। तीसरीघटना या दुर्घटना यह हुई कि जिगरसाहब मुरादाबादी सेआसाधारण-रूप से प्रभावित होकर अधिकतर नौजवान ग़ज़लगो शायरजिगरसाहब की उद्भावना के अनुमोदन मेंशेर कहने लगे। यहाँ तक कि कुछ शायरों ने हुलिए और वस्त्रों मेंभी उनकी नक़ल शुरू कर दी। सिर पर बड़े-बड़े बाल। खोए-खोए ढंग मेंगुफ़्तगूँ और उनके तरन्नुम (गाकर कविता पाठ करना) की नक़ल आम होने लगी।प्रयोगवादी शायरी तो ख़ैर शकीलके स्वभाव ही केप्रतिकूल थी, राजनीति से विशेष दिलचस्पी न होने के कारण वह नज़्मगोई की ओरभी प्रवृत्त न हो सका। रह गया जिगरसाहब का अनुकरण, तो उसके सम्बन्ध में एक स्थान पर वह लिखता है कि ‘‘मेरा दिल जिगर-छापशायर बननेको बिल्कुल तैयार न था। शायद इसीलिए मैं पुकारता था :

जो नुक़ूश-खुर्दा-ए-पा1 न हो उसी रहगुज़रकी2 तलाश है !

 

इसके अतिरिक्त वह ग़ज़ल के पक्षपातियों की इसधारण से सहमत था कि ग़ज़लमें भी सामाजिक बोध और नए मूल्यों की गुंजाइश पैदा करना संभव है-जिसकाप्रत्यक्ष प्रमाण उस समय मजाज़’ ‘फ़ैज’, अहमद नदीम क़ासमी इत्यादि प्रगतिशाली शायर देरहे थे। शकीलने भी अपनी शायरी में नये मूल्यों कोसमोने का प्रयत्न किया, लेकिन प्रेम और प्रेम-सम्बन्धी मनोविश्लेषण केमुक़ाबले में उनका अंश काफ़ी कम रहा। क्योंकि उसका विश्वास था (और उसकाकहना है कि यह विश्वास आज भी उसी तरह दृढ़ है) कि ‘‘प्रेम, सौंदर्य और शिष्टता भी जीवन केमहत्त्वपू्र्ण अंग हैं। इनके बिना पूर्ण मानव नहीं बना जा सकता। और यदि
—————
1.
पद चिह्नों से परिचित (रौंदी हुई) 2.मार्ग की
हम स्वयं मानव नहीं बन सकते तो दूसरों को मानवता का उपदेश कैसे दे सकतेहैं।’’
दिल्ली में अपने निवास-काल में शकीलने भारत केलगभग सभी मुख्य शहरों में मुशायरे पढ़े और उसे अनुभव हुआ कि मुशायरों मेंया विशेष महफ़िलों में केवल शायरी की दाद नहीं मिलती बल्कि कई चीज़ों केसम्मिश्रण पर दाद दी जाती है, जिनमें शायर की ख्याति, व्यक्तित्व, तरन्नुम, भाषा की चाशनी और आसान शेर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दूसरेशब्दों में, मुशायरे भाषा की उन्नति और शायर की लोकप्रियता का साधन तो बनासकते हैं, लेकिन साहित्य के स्तर को ऊंचा करने में सहायता नहीं देते। इसअनुभव के प्रकाश में, वह कहता है कि ‘‘मैंने, जहां तकसंभव हो सका। अपनी शायरी को इस राह पर लाने की कोशिश की कि स्तर भी क़ायमरहे और सुनने वाले भी निराश न हों। कलाकार यदि प्रसिद्ध हो तभी उसकी आवाज़में असर पैदा होता है और यह भी होता है कि कलाकार की आवाज़ जनता को अपनीओर आकृष्ट करे। उसी प्रकार एक शायर यदि जनता में मान्य है तो उस शायर परयह ज़िम्मेदारी आती है कि वह अपने प्रभाव से जनता का स्तर ऊँचा करे, न किउसको अधस्थल की ओर ले जाए। जो हो, मुझे और मेरी ग़जलों को जिनती मान्यतामिलती गई, मैं उतना ही चौकन्ना होता गया।’’

और 1946 ई. में बम्बई आकर जब उसने फ़िल्म-जगत में प्रवेश किया तो फ़िल्मीगीतों की लोकप्रियता से उसने सीखा कि गूढ़-से-गूढ़ बात भी यदि सरल भाषामें कही जाए तो शायरी के लिए हितकर सिद्ध हो सकती है। बम्बई आकर ‘‘मैंने जो ग़ज़लें कही हैं, उनमें मैंने इन समस्तबातों का ध्यान रखा है और मुझे आशा है कि यदि जीवन ने साथ दिया तो ग़ज़लके लिए अपना एक अलग ढांचा तैयार कर लूँगा।’’
यह है शकीलबदायूनी के जीवन और उसकी शायरी कीपृष्ठभूमि, जिसे शकीलकी शायरी पर बहस करने औरशकीलको यथोचित स्थान न देने वाले अक्सरसमालोचक  नज़र में नहीं रखते। उचित उच्च स्थान न मिलने सेकभी-कभी उसके क़लम से ऐसे शेर भी निकल पड़ते हैं जिनसे पता चलता है कि वेशेर केवल चिढ़कर कहे गए हैं। अन्यथा एक ओर यदि शकीलके यहाँ :

क्या शै1 है मताअ़-ए-ग़मो-राहत2 न समझना
जीना हैतो जीने को हक़ीक़त न समझना

 

और

नई सुबहपर नज़र है मगर आह ये भी डर है
ये सहर3 रफ़्ता-रफ़्ता4 कहीं शाम तक न पहुँचे

 

ऐसे परम्परागत, सूफ़ियाना और नकारात्मक शेरमिलते हैं तो ऐसे शेरों की भीकुछ कम संख्या नहीं जिनमें उसने कर्मशीलता की शाश्वत महानताओं का लोहामानते हुए कहा है :-

मैंज़िन्दा हूं मुझे ऐनाखुदा5 तूफ़ान में ले चल
मेरेज़ौक-अमल की6 मौत है साहिल के पर्दे में

 

1.चीज़ 2.ग़म और खुशी-रूपी पूँजी 3.सुबह 4.शनैःशनैः 5.माँझी 6.कर्म कीअभिरुचि
और

है यही वक़्ते-अ़मल1 जहदे-मुसलसल की2 क़सम
बेसहारों की तरह हाथ न मलते रहना
नग़्मा-ए-इश्क़ न हो एक ही धुन पर क़ायम
वक़्त के साथ ज़रा राग बदलते रहना

 

इसी प्रकार एक ओर यदि वह खुदा के पक्ष में :

मुन्किरे-ज़ात3 बहस मुसल्लम4 लेकिन
यूँ वो कुछ और नुमायां5 नज़र आता है

 

कहता है तो दूसरी ओर

दे सदायें6 दर्रे इन्सां7 ही पे इन्सानशकील
हाए दुनिया में ग़रीबों का खुदा क्यों न रहा

 

कहकर उस शून्य को पाट देता है, जिसे पाट नपाने की उससे शिकायत की जातीहै। लेकिन शिकायतों और विरोधों के बावजूद शकीलयहकहते हुए आगे बढ़ा चला जा रहा है कि :

शेओ अदब की राहमें हूं गामज़न8 ‘शकील
अपने मुख़ालिफ़ीन की9 परवा किये बग़ैर

 

————–
1.
काम करने का समय 2.निरन्तर संघर्ष की 3.नास्तिक 4.युक्तियुक्त 5.स्पष्ट 6.आवाज़ें 7.मनुष्य के दरवाज़े 8.चल रहा हूँ 9.विरोधियों की
जिगरमुरादाबादी ने शायद बिल्कुल ठीक लिखा है कि ‘‘शकीलशायरे-फ़ितरत (स्वाभाविक कवि) है, शायरे-कारीगर नहीं। उसका कलाम सिर्फ़ लफ़्ज़ी तलिस्मबंदियों (शाब्दिकजादूगरियों) का मजमूआ़ (संग्रह) नहीं बल्कि हक़ीक़तन (वास्तव में) उसकाकलाम उसकी ज़िन्दगी का आईनादार (प्रतिरूप) है।’’
ज़िन्दगी जैसी कि उसकी थी या ज़िन्दगी जैसी भी वह पा सका। और इसीलिए सरदारजाफ़री और मजरूहसुलतानपुरी जैसे कट्टर प्रगतिशीलशायर भी इस स्वीकारोक्ति से दामन न बचा सके कि :
‘‘ ‘
शकीलग़ज़ल कहना भी जानतेहैं और गाना भी। मैं अपनी अदबी ज़िन्दगी में शकीलसे दूर रहा हूँ लेकिन उनकी ग़ज़ल से हमेशा कुर्बत (सामीप्य) महसूस की है।यह एक ऐसी लताफ़त (मृदुलता) है जो दिल में उतर जातीहै।

सरदार जाफ़री

 

‘‘एक ग़ज़लगो शायर कीहैसियत से मुझेशकीलके मक्तबे-ख़याल (सिद्धांत-पद्धति) सेइख़तिलाफ़ (विरोध) सही लेकिन मगर ईमान की तो है कि जब भी मैंने उनके मुँहसे अच्छे शेर सुने हैं रश्क (ईर्ष्या या प्रतिस्पर्धा) किए बग़ैर नहीं रहसका।’’
मजरूहसुलतानपुरी
और साहिरलुधियानवी के ख़्याल में तो:-
जिगरऔर फ़िराक़के बाद आनेवाली पीढ़ी में शकीलबदायूनी एकमात्र शायर हैंजिन्होंने अपनी कला के लिए ग़ज़ल का क्षेत्र चुना है और इस प्राचीन किन्तुसुन्दर और पूर्ण काव्य-रूप को, जिसमें हमारे अतीत की सर्वोत्तम साहित्यिकतथा सांस्कृतिक सामग्री सुरक्षित है, केवल अपनाया ही नहीं उसका जीवन केपरिवर्तनशील मूल्यों और नये विचारों से समन्वय कर उसमें नये रंग भी भरेहैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि एक काव्य-रूप के लिहाज़ से ग़ज़ल सीमित भावनाओंकी वाहक है। और फिर यह इतनी मथी जा चुकी है कि अब इसमें अधिक मंथन की बहुतही कम गुंजाइश रह गई है। लेकिन जो लोग इस प्रकार की गुंजाइश निकाल सकतेहैं उन्हें अपने विचारों को ग़ज़ल का पहनावा पहनाने का पूरा-पूरा अधिकारहै। शकीलबदायूनी बड़ी सुरीति से अपने अधिकार कीरक्षा कर रहा है। उसे पढ़ते हुए जहाँ हमें यह अनुभव होता है कि हम आधुनिककाल के किसी शायर को नहीं, किसी उस्ताद को पढ़ रहे हैं, वहाँ इस बात का भीअनुभव होता है कि वह उस्ताद आधुनिक-काल का उस्ताद है।
20
अप्रैल 1970 को इस मशहूर शायर का 54 बरस की बहुत कम उम्र में निधन होगया।

Click the below mentioned link to listen one of his beautiful song composed by him.

https://bagewafa.wordpress.com/2009/08/17/apniazadi-_shaqeel/

Advertisements

زمرے

%d bloggers like this: