Posted by: Bagewafa | اگست 26, 2013

चर्चा में अमर्त्य सेन : क्या भारत रत्न उन्हें खैरात में दिया गया?

 

चर्चा में अमर्त्य सेन : क्या भारत रत्न उन्हें खैरात में दिया गया?

नोबेल पुरस्कार और भारत रत्न पुरस्कार विजेता प्रो अमर्त्य सेन इन दिनों सुर्खियों में हैं। सुर्खियों में रहने की सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्होंने हाल ही में नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ टिप्पणी किया था और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शान में कसीदे पढा था। इसका राजनीतिक असर होना स्वभाविक था। नरेंद्र मोदी को लेकर अंदर और बाहर चौतरफ़ा हमला झेल रही भाजपा प्रो सेन के प्रहार से बिलबिला उठी। उसके कुछ नेताओं ने प्रो सेन से भारत रत्न लौटा देने की मांग तक कर दी, जैसे भारत रत्न का सम्मान तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने उन्हें खैरात अथवा तोहफ़े में दे दी हो।

 

भाजपाइयों के इस आक्रमण के जवाब में प्रो सेन ने भी नहले का जवाब दहले से दे दिया। उन्होंने कहा कि अगर अटल बिहारी वाजपेयी कहें तो वे भारत रत्न का सम्मान लौटाने को तैयार हैं। इधर उनकी नजर में महान सुशासक नीतीश कुमार ने भी भाजपा को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि भाजपा अधियाकावादी हैं। प्रो सेन से भारत रत्न सम्मान वापस मांगा जाना इसी का परिचायक है। उधर शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में प्रो सेन से कहा है कि वह राजनीति में अपनी टांग न अड़ायें।

 

अब बात उस बयान की जिसके कारण प्रो सेन चर्चा में हैं। उनका कहना था कि नीतीश माडल (उनकी नजर में बिहार में सुशासन है और नीतीश कुमार की नीतियों के कारण बिहार आगे बढ रहा है) वर्तमान देश की आवश्यकता है। इसी माडल के जरिए देश वर्तमान आर्थिक चुनौतियों से निजात पा सकता है। मजे की बात यह है कि प्रो सेन का यह बयान उन दिनों आया था जब बिहार में 23 बच्चों की मौत विषाक्त मिड डे मील खाने से हो गयी थी और नीतीश कुमार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर आलोचना के शिकार हो रहे थे।

 

जिस दिन निजी न्यूज चैनल ने प्रो सेन का उक्त साक्षात्कार प्रकाशित किया उसी दिन दो महत्वपूर्ण घटनायें और घटीं। पहली घटना यह कि उसी न्यूज चैनल ने एक सर्वे का परिणाम सार्वजनिक किया। परिणाम में दिखाया गया कि अगर अभी चुनाव हुए तो जदयू को कोई नुकसान नहीं होगा जबकि भाजपा को बहुत नुकसान होगा। सर्वे परिणाम में राजद की स्थिति बेहतर होने की बात कही गयी। उस दिन दूसरी घटना यह घटी कि सीएसओ यानी केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने वित्तीय वर्ष 2012-13 के दौरान देश की आर्थिक स्थिति पर अपनी औपबांधिक रिपोर्ट जारी की। पहली बार बिहार के माथे से सबसे तेज दर से विकास करने वाले राज्य का ताज छीना गया। बिहार का विकास दर 10 फ़ीसदी से कम हुआ। मध्यप्रदेश ने बाजी मार ली। लेकिन बिहार की तमाम मीडिया ने इस खबर को छुपा लिया। इस खबर की जगह यह दिखाया गया कि बिहार का विकास दर देश के विकास दर से तीन गुणा है।

 

जाहिर तौर पर प्रो सेन का नीतीश के पक्ष में इंटरव्यू देना, चैनल का सर्वे और सीएसओ की रिपोर्ट का एक ही दिन पब्लिक डोमेन में आना महज संयोग नहीं कहा जा सकता है। निश्चित तौर पर यह एक साझा प्रयास था नीतीश कुमार की छवि को बेहतर करने का। एक खास बात और। खास बात यह कि इस साझा मुहिम के बाद ही नीतीश ने मशरख में 23 बच्चों की मौत के 9 दिनों के बाद अपना मुंह खोला। जाहिर तौर पर इसे भी महज संयोग नहीं माना जा सकता है।

 

बहरहाल, यह साफ़ हो गया है कि भारत जैसे देश में भारत रत्न का सम्मान भी बिकता है या फ़िर इसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जाता है। आश्चर्य तो तब होता है जब यह सम्मान उस व्यक्ति को दिया जाता है जिसने पूंजीवादी तर्कों के आधार पर गरीबी का आकलन किया और फ़िर समावेशी विकास का मंत्र दिया, जिसके दुष्परिणाम से देश आर्थिक रुप से विपन्न हो चुका है। गरीबी की जो परिभाषा प्रो सेन ने अपने शोध में दी वह पहले ही खारिज किया जा चुका है। इसके बावजूद गरीबी के नये-नये फ़ार्मूले इजाद किए जा रहे हैं। वैसे प्रो सेन की काबलियत उस समय भी जगजाहिर हो गयी थी जब उन्होंने निर्माणाधीन अंतरराष्ट्रीय नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की एक रीडर गोपा सबरवाल को नामित किया था। प्रो सेन की काबलियत का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है। उनकी काबलियत का एक पैमाना यह भी कि बिहार तेजी से विकास कर रहा है।

http://www.apnabihar.org/nawal1.htm

Advertisements

زمرے

%d bloggers like this: