Posted by: Bagewafa | اگست 27, 2013

शजर पर है वो इक पत्ता हरा तो-मलिकज़ादा जावेद

शजर पर है वो इक पत्ता हरा तो-मलिकज़ादा जावेद

शजर पर है वो इक पत्ता हरा तो

मुहब्बत का बचा है सिलसिला तो

 

घमंडी हैं दिये सारे पुराने

चली है दश्त में ताज़ा हवा तो

 

मज़म्मत की फ़क़त आंखों से सबने

ज़बां से अपनी कोई बोलता तो

 

ज़रा अच्छी तरह ज़ख्मों को सिलना

नसों से ख़ून कल रिसने लगा तो

 

लिखा है उसने क्यों मज़मून मुझ पर

वो मेरे बारे में कुछ जानता तो

 

तअल्लुक़ फिर से हो जायेगा क़ायम

दिया उसने जो अपना वास्ता तो

 

ये किस ख़ित्ते में है चेहरा हमारा

हमें पहचानता इक आइना तो

 

तुझे मिल जाएगी जावेदक़ीमत

अगर बाज़ार में ठहरा रहा तो

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زمرے

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