Posted by: Bagewafa | اگست 27, 2013

शीशे के मकां कैसे हैं ….राही मासूम रज़ा

शीशे के मकां कैसे हैं ….राही मासूम रज़ा

 

जिनसे हम छूट गये अब वो जहां कैसे हैं

शाखे गुल कैसे हैं खुश्‍बू के मकां कैसे हैं ।।

 

ऐ सबा तू तो उधर से ही गुज़रती होगी

उस गली में मेरे पैरों के निशां कैसे हैं ।।

 

कहीं शबनम के शगूफ़े कहीं अंगारों के फूल

आके देखो मेरी यादों के जहां कैसे हैं ।।

 

मैं तो पत्‍थर था मुझे फेंक दिया ठीक किया

आज उस शहर में शीशे के मकां कैसे हैं ।।


زمرے

%d bloggers like this: