Posted by: Bagewafa | جنوری 9, 2014

कश्मीर का दर्द… इमरान प्रतापगढ़ी कि ज़ुबानी

कश्मीर का दर्द… इमरान प्रतापगढ़ी कि ज़ुबानी

न बुज़ुर्गों के ख़्वाबों की ताबीर हूं
न मैं जन्नत की अब कोई तस्वीर हूं
जिसको मिल करके सदियों से लूटा गया
मैं वो उजड़ी हुई एक जागीर हूं
हां मैं कश्मीर हूं, हां मैं कश्मीर हूं

मेरे बच्चे बिलखते रहे भूख से
ये हुई है सियासत की इक चूक से
रोटियां मांगने पर मिलीं गोलियां
चुप कराया गया उनको बंदूक से

न कहानी हूं न कोई किस्सा हूं मैं
मेरे भारत तेरा एक हिस्सा हूं मैं

जिसको गाया नही जा सका आज तक
ऐसी इक टीस हूं ऐसी इक पीर हूं
हां मैं कश्मीर हूं, हां मैं कश्मीर हूं

यूं मेरे हौसले आज़माए गए,
मेरी सांसों पे पहरे बिठाए गए
पूरे भारत में कुछ भी कहीं भी हुआ
मेरे मासूम बच्चे उठाए गए

यूं उजड़ मेरे सारे घरौंदे गए
मेरे जज़्बात बूटों से रौंदे गए

जिसका हर लफ़्ज आंसू से लिक्खा गया
ख़ूं में डूबी हुई ऐसी तहरीर हूं
हां मैं कश्मीर हूं, हां मैं कश्मीर हूं

मैं बग़ावत का पैग़ाम बन जाऊंगा,
मैं सुबह हूं मगर शाम बन जाऊंगा
गर सम्भाला गया न मुझे प्यार से
एक दिन मैं वियतनाम बन जाऊंगा

मुझको इक पल सुकूं है न आराम है
मेरे सर पर बग़ावत का इल्ज़ाम है

जो उठाई न जाएगी हर हाथ से
ऐ सियासत मैं इक ऐसी शमशीर हूं
हां मैं कश्मीर हूं, हां मैं कश्मीर हूं


زمرے

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